
देश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह से संवैधानिक और वैध करार दिया है। हालांकि, कोर्ट के इस फैसले से याचिका दायर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को बड़ी निराशा हाथ लगी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले जैसी प्रमुख हस्तियों के साथ इस मामले में याचिकाकर्ता रहे योगेंद्र यादव ने भी कोर्ट के इस रुख पर गहरी मायूसी जताई है।
लेकिन इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने योगेंद्र यादव की इस निराशा पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर योगेंद्र यादव को सीधे तौर पर आड़े हाथों लेते हुए उनके अदालती रुख पर ही सवाल खड़े कर दिए।
“आप एक जख्मी और हारे हुए इंसान की तरह लग रहे हैं मिस्टर यादव”
स्वाति चतुर्वेदी ने एक्स पर योगेंद्र यादव के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा:
“माफ कीजिए मिस्टर यादव, आप एक जख्म खाए हुए इंसान की तरह लग रहे हैं। अगर आपको देश की न्यायपालिका पर भरोसा ही नहीं था, तो आपको इस मामले में अपीलकर्ता बनना ही नहीं चाहिए था। अब जब देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला आ चुका है, तो आप इस तरह का हंगामा मचा रहे हैं। प्लीज, अब बस कीजिए।”
स्वाति चतुर्वेदी ने आगे कहा कि हम सभी भारत के जिम्मेदार नागरिक हैं। इस तरह के बयानों से भारतीय लोकतंत्र में आम लोगों का भरोसा कम करने की कोशिश की जा रही है, जिससे किसी का कोई भला नहीं होने वाला। उन्होंने योगेंद्र यादव की शैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि समझ नहीं आता कि आपको हमेशा हर चीज से क्या दिक्कत होती है, और आप विपक्ष के लिए एक ‘आत्मघाती संकेत’ (Suicidal Signal) की तरह क्यों काम करते नजर आते हैं।
योगेंद्र यादव ने ऐसा क्या कहा, जिस पर मच गया बवाल?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद योगेंद्र यादव ने अदालत न जाने की वजह बताते हुए एक लंबा नोट साझा किया था। उनका मानना था कि इस केस का नतीजा बहुत पहले ही तय हो चुका था, इसलिए उनके मन में फैसले को लेकर कोई उत्सुकता या बेचैनी नहीं थी।
योगेंद्र यादव के मुख्य आरोप और तर्क:
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अगस्त में ही तय हो गई थी दिशा: योगेंद्र यादव के अनुसार, इस पूरे मामले की दिशा पिछले साल अगस्त में ही तय हो गई थी। कोर्ट ने तीन दिनों तक दलीलों को सुनने के बाद संवैधानिक सिद्धांतों की जांच करने के बजाय खुद को एक ‘उपभोक्ता फ़ोरम’ की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जहां सिर्फ शिकायतों के निपटारे और मध्यस्थता पर जोर था।
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बिहार चुनाव और वोटर लिस्ट की कमियां: उन्होंने आरोप लगाया कि कोर्ट ने असल फैसला उसी वक्त ले लिया था जब चुनाव आयोग (ECI) को बिना कोई मुख्य नीति तय किए बिहार चुनाव जल्दबाज़ी में करवाने की इजाजत दे दी गई थी। कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी नहीं कहा कि वह एसआईआर के बाद बनी नई वोटर लिस्ट की बड़ी कमियों को दूर करे।
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अदालती टिप्पणियों पर उठाए सवाल: योगेंद्र यादव ने कहा कि जब अदालत में जजों ने खुले तौर पर यह टिप्पणी की कि किसी को भी एसआईआर की प्रक्रिया में रुकावट डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी, तभी रही-सही शंका भी खत्म हो गई थी। उन्होंने एक जज की उस टिप्पणी को याचिका के ताबूत में आखिरी कील बताया जिसमें कहा गया था कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं।
‘लाखों नागरिक मताधिकार से हुए वंचित’
कानूनी पेचीदगियों को दरकिनार करते हुए योगेंद्र यादव ने अंत में एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि सीधी और कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की सर्वोच्च अदालत ने पहले ही लाखों नागरिकों को उनके सबसे बड़े अधिकार यानी मताधिकार से वंचित करने की मंजूरी दे दी है। उनके मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया से अब तक देश के कम से कम 5.9 करोड़ (59 मिलियन) लोग प्रभावित हो चुके हैं और यह आंकड़ा आने वाले समय में 10 करोड़ (100 million) तक पहुंच सकता है। इसी हताशा के चलते उन्होंने कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए थे, जिस पर अब पत्रकारिता और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
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