
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ और मोक्षदायिनी माना गया है। जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को यह तिथि अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी श्रद्धालु निष्ठापूर्वक एकादशी का व्रत रखता है, उसे मृत्यु के पश्चात बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। यूं तो हर महीने पड़ने वाली एकादशी का अपना महत्व है, लेकिन अधिकमास (मलमास) में आने वाली एकादशी को और भी अधिक दुर्लभ और पुण्यकारी माना जाता है, क्योंकि यह योग तीन साल में केवल एक बार बनता है।
ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत के कड़े नियम तीन दिन पहले यानी दशमी तिथि से ही शुरू हो जाते हैं और द्वादशी तिथि के पारण तक चलते हैं। ऐसे में कई बार भक्तों से अंजाने में कुछ भूल या गलतियां हो जाती हैं, जिससे व्रत खंडित होने या दोष लगने का खतरा रहता है। आचार्य श्री कौशिकजी महाराज के अनुसार, यदि आपसे भी व्रत के दौरान ऐसी गलतियां हुई हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं है; द्वादशी के दिन एक विशेष उपाय करके इस दोष को पूरी तरह नष्ट किया जा सकता है।
इन 4 गलतियों से लगता है एकादशी व्रत में दोष
आचार्य श्री कौशिकजी महाराज के अनुसार, एकादशी तिथि के दिन निम्नलिखित कार्यों को करने से व्रत का पुण्य फल कम हो जाता है और जातक को दोष लगता है:
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शरीर पर तेल लगाना: एकादशी के पावन दिन सिर या शरीर पर तेल लगाना या तेल की मालिश करना पूरी तरह वर्जित है।
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दिन के समय सोना: एकादशी के दिन आलस्य करना और दिन में सोना शास्त्रों के अनुसार निषेध माना गया है। इससे व्रत निष्फल हो सकता है।
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जूठे हाथों से स्पर्श: यदि आपने अनजाने में या बिना हाथ धोए (जूठे हाथों से) भगवान की प्रतिमा, पूजा सामग्री या तुलसी के पौधे को छू लिया है, तो यह बड़ा दोष माना जाता है।
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नियमों की अनदेखी: दशमी से द्वादशी के बीच सात्विकता का पालन न करना।
दोष निवारण के लिए द्वादशी को करें ये अचूक उपाय
यदि एकादशी के दिन ऊपर बताई गई कोई भूल आपसे हो गई है, तो द्वादशी तिथि (अगले दिन सुबह) को यह उपाय अवश्य कर लें, जिससे दोष का तत्काल नाश हो जाता है:
दोष मुक्ति विधि: द्वादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद भगवान श्रीहरि विष्णु को सबसे पहले पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण) से श्रद्धापूर्वक स्नान कराएं। इसके बाद पवित्र गंगाजल में तुलसी की पत्तियां मिलाकर ‘तुलसीदल जल’ तैयार करें और इससे पुनः श्रीहरि को स्नान कराएं। पूजा संपन्न होने के बाद इस पवित्र तुलसी-मिश्रित जल (चरणामृत) की कुछ बूंदें अपने मुख में भी डालें। शास्त्रों के अनुसार, इस उपाय को करने से एकादशी व्रत में लगे सभी प्रकार के अनजाने दोष और पाप तत्काल समाप्त हो जाते हैं।
मां लक्ष्मी और श्रीहरि को प्रसन्न करने के 3 गुप्त उपाय
अधिकमास और ज्येष्ठ मास के इस पावन संयोग में धन की देवी माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कुछ विशेष उपायों का उल्लेख किया गया है:
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तुलसी की जड़ में गन्ने का रस: एकादशी के दिन माता लक्ष्मी को जागृत करने और घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए तुलसी के पौधे की जड़ में थोड़ा सा गन्ने का रस अर्पित करें। इसके साथ ही शिवलिंग पर भी गन्ने का रस चढ़ाना अत्यंत लाभकारी माना गया है, इससे व्यापार और धन की तंगी दूर होती है।
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33 मालपुओं का महादान: चूंकि अधिकमास भगवान पुरुषोत्तम का महीना है, इसलिए इस महीने में 33 दिन के प्रतीक स्वरूप 33 मालपुए बनाएं। इन मालपुओं का पहले भगवान श्रीहरि को उत्तम भोग लगाएं और बाद में इन्हें ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को आदरपूर्वक दान कर दें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी स्थायी रूप से घर में वास करती हैं।
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अन्न और जल का दान: ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में प्यासे को पानी पिलाना और भूखे को अन्न खिलाना सर्वोत्तम कृत्य है। इस दिन मिट्टी के घड़े, शर्बत, फल और अनाज का दान करने से भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
जानिए कौन सी है अधिकमास की दूसरी एकादशी?
अधिकमास के दौरान दो एकादशी तिथियां आती हैं। इस मास की पहली एकादशी (पद्मिनी एकादशी) के बाद दूसरी एकादशी ‘पद्मा एकादशी’ (पद्मिनी और पद्मा दोनों के नाम अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त होते हैं) आती है। यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की परम फलदायी एकादशी है। इस तिथि पर भी व्रत और कल्पवास करने से जातक के सात जन्मों के पाप कट जाते हैं और श्रीहरि की प्रसन्नता हासिल होती है।
पद्मा एकादशी के बाद हिंदू कैलेंडर की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण ‘निर्जला एकादशी’ आएगी। इस साल (2026) निर्जला एकादशी का महापर्व जून महीने के आखिरी हफ्ते (लास्ट वीक) में पड़ेगा, जिसमें बिना पानी पिए पूर्ण निराहार व्रत रखने का विधान है।
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