
धार्मिक शास्त्रों में पुरुषोत्तम मास यानी अधिकमास का विशेष महत्व बताया गया है। इस पवित्र महीने में आने वाली एकादशी को ‘कमला एकादशी’ या ‘पद्मिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर की जिज्ञासा शांत करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इस परम पुण्यमयी एकादशी के व्रत, महिमा और पौराणिक कथा का विस्तार से वर्णन किया था। यह व्रत मनुष्यों के समस्त पापों को हरने वाला, मनोवांछित फल देने वाला और अंत में मोक्ष (वैकुंठ धाम) प्रदान करने वाला माना गया है।
कमला एकादशी व्रत की पौराणिक कथा: पापाचारी जयशर्मा के उद्धार की कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में अवन्तीपुरी नामक नगरी में शिवशर्मा नाम के एक अत्यंत श्रेष्ठ और सदाचारी ब्राह्मण रहते थे। उनके पांच पुत्र थे, जिनमें से उनका सबसे छोटा पुत्र ‘जयशर्मा’ बेहद पापाचारी और दुष्ट प्रवृत्ति का निकल गया। उसके बुरे कर्मों और कुसंगति से तंग आकर पिता और स्वजनों ने उसे परिवार व समाज से निष्कासित कर दिया।
अपने परिवार से त्यागे जाने के बाद जयशर्मा भटकते हुए बहुत दूर एक सघन वन में चला गया। दर-दर की ठोकरें खाने और अपने कर्मों का फल भुगतने के बाद, एक दिन दैवयोग से वह तीथों के राजा प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) जा पहुंचा। भूख-प्यास से व्याकुल और अत्यंत दीन अवस्था में उसने त्रिवेणी में स्नान किया और भोजन की तलाश में मुनियों के आश्रम ढूंढने लगा।
संयोगवश वह परम प्रतापी हरिमित्र मुनि के उत्तम आश्रम में जा पहुंचा। उस समय पावन पुरुषोत्तम मास चल रहा था और आश्रम में भक्तों की भारी भीड़ जुटी हुई थी। वहां विद्वान ब्राह्मणों के मुख से जयशर्मा ने ‘कमला एकादशी’ के महात्म्य और उसके भोग-मोक्ष प्रदाता होने की महिमा सुनी। मुनियों के उपदेश से जागृत होकर जयशर्मा ने पूर्ण श्रद्धा के साथ सभी भक्तों के संग मिलकर आश्रम पर ही कमला एकादशी का निराहार व्रत और विधिपूर्वक पूजन किया।
आधी रात को प्रकट हुईं साक्षात मां लक्ष्मी, दिया वैभव का वरदान
जब व्रत की रात आधी बीती, तो जयशर्मा के कठिन तप और शुद्ध भाव से प्रसन्न होकर साक्षात धन की देवी भगवती लक्ष्मी वहां प्रकट हो गईं। मां लक्ष्मी ने उससे कहा, “हे ब्राह्मण! देवाधिदेव श्रीहरि विष्णु की आज्ञा से मैं वैकुंठ धाम से यहां आई हूं। तुम्हारे इस कमला एकादशी व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूं, मांगो तुम्हें क्या वरदान चाहिए?”
तब जयशर्मा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे जगत जननी मां लक्ष्मी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे उस परम दुर्लभ व्रत का पूरा रहस्य और ज्ञान बताएं, जिसकी चर्चा यहां साधु-संत कर रहे हैं, जिससे मेरा जीवन धन्य हो जाए।”
मां लक्ष्मी ने मुस्कुराते हुए एकादशी की महिमा बताते हुए कहा:
“इस एकादशी का माहात्म्य सुनने मात्र से मनुष्यों के सभी दुःस्वप्नों और पूर्व जन्म के पापों का नाश हो जाता है। जो उत्तम पुरुष पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर इसके एक या आधे श्लोक का भी पाठ या श्रवण करता है, वह करोड़ों पापों से मुक्त होकर तत्काल मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। जैसे मासों में पुरुषोत्तम मास, पक्षियों में गरुड़ और नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही तिथियों में एकादशी (और पारण की द्वादशी) सर्वोपरि है। जो भक्त सदा नारायण के नाम का कीर्तन और उनकी लीलाओं में लीन रहते हैं, उन्हें श्रीहरि स्वतः प्राप्त हो जाते हैं।”
मां लक्ष्मी से यह परम ज्ञान और अटूट धन-धान्य का वरदान पाकर जयशर्मा पूरी तरह बदल गया। वह असीम धन और ऐश्वर्य से संपन्न होकर वापस अपने पिता के घर लौट आया और उसका पूरा परिवार पुनः हर्षित हो उठा।
शास्त्रों के अनुसार: किस स्थान पर जप करने से मिलता है कितना फल?
शास्त्रों में बताया गया है कि कमला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप अलग-अलग स्थानों पर करने से उसका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है:
| जप का स्थान (Location) | मिलने वाला पुण्य फल (Fruit of Penance) |
| घर पर जप करना | सामान्य (एक गुना) फल मिलता है। |
| नदी के तट/किनारे पर | सामान्य से दूना (दो गुना) फल प्राप्त होता है। |
| गोशाला (Cow Shed) में | सहस्त्रगुणा (1000 गुना) पुण्य मिलता है। |
| शिव क्षेत्र, तीर्थ स्थान या देवालय | अनंत गुना (Infinite) फल की प्राप्ति होती है। |
| भगवान श्रीहरि विष्णु के सम्मुख | परम पद और अक्षय पुण्य मिलता है। |
कमला एकादशी की प्रामाणिक व्रत एवं पूजन विधि
यदि आप भी मां लक्ष्मी की कृपा और भगवान नारायण का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस विधि से व्रत करें:
1.ब्राह्म मुहूर्त में संकल्प:प्रातः काल नियम.
एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व ब्राह्म मुहूर्त में उठकर भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण करें। इसके बाद पवित्र नदी, जलाशय या घर पर ही गंगाजल मिले जल से विधिपूर्वक स्नान करें और हाथ में जल लेकर व्रत का नियम (संकल्प) ग्रहण करें।
2.पंचामृत स्नान और षोडशोपचार पूजा:पूजन विधान.
घर के मंदिर में भगवान जनार्दन (विष्णु जी) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एकादशी के दिन भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से श्रद्धापूर्वक स्नान कराएं। उन्हें पीले वस्त्र, चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
3.भजन-कीर्तन और जागरण:रात्रि काल.
एकादशी का व्रत पूरी तरह निराहार (या फलाहार) रहकर किया जाता है। शाम के समय भगवान के सम्मुख दीप जलाएं और रात्रि में सोएं नहीं। रात के समय वाद्य यंत्रों, मधुर गीतों, नृत्य और विष्णु पुराण के पाठ द्वारा भगवान के सामने जागरण करें।
4.दूध स्नान और ब्राह्मण भोजन:द्वादशी तिथि.
अगले दिन द्वादशी को प्रातः काल पुनः स्नान करें। इस दिन भगवान विष्णु को केवल शुद्ध दूध से स्नान कराएं। इसके बाद देवताओं के स्वामी श्रीहरि से व्रत की पूर्णता के लिए प्रार्थना करें। फिर आदरपूर्वक योग्य ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराएं और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देकर विदा करें। अंत में अपने परिवार के साथ मिलकर व्रत का पारण (भोजन) करें।
व्रत का महाफल: जो मनुष्य इस प्रकार परम शुद्ध भाव से पुरुषोत्तम मास की कमला एकादशी का उत्तम व्रत करता है या श्रद्धापूर्वक इसकी कथा का श्रवण करता है, वह इस लोक में सभी सुखों को भोगकर, पुनरावृत्ति से रहित (यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर) परम पावन वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।
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