‘डील नहीं हुई तो महायुद्ध होगा’… ट्रंप की ईरान को विनाशकारी धमकी, अरब और मुस्लिम देशों के सामने चला ‘अब्राहम अकॉर्ड’ का सबसे बड़ा दांव

पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी भारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच खिंचती शांति वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बेहद आक्रामक और चौंकाने वाला बयान सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप ने दोटूक लहजे में खुली धमकी देते हुए कहा है कि ईरान के साथ या तो एक बड़ी और बेहतर परिणामों वाली ‘ऐतिहासिक डील’ होगी, या फिर कोई भी डील नहीं होगी। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है, तो अमेरिका पूरी ताकत के साथ दोबारा युद्ध के मैदान में उतरेगा। ट्रंप का यह विस्फोटक बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच बैकचैनल शांति वार्ता लगातार लंबी खिंचती जा रही है और कयासों का बाजार गर्म है।

शांति वार्ता के बीच ‘ट्रुथ सोशल’ पर ट्रंप का बड़ा खुलासा

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर मध्य-पूर्व के कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ हुई अपनी बेहद गोपनीय और महत्वपूर्ण बातचीत का ब्यौरा साझा किया है। ट्रंप ने बताया कि उन्होंने खाड़ी देशों के शीर्ष नेताओं, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ इस वैश्विक संकट को सुलझाने के लिए गहन चर्चा की है। ट्रंप ने कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया में विनाशकारी युद्ध दोबारा भड़के, इसलिए सभी के हित में यही है कि एक मजबूत समझौता हो जाए। लेकिन इसके साथ ही ट्रंप ने एक ऐसी शर्त और अपील रख दी है जिसने मुस्लिम देशों को कूटनीतिक धर्मसंकट में डाल दिया है।

ट्रंप का बड़ा दांव: मध्यस्थता कर रहे मुस्लिम देशों से ‘अब्राहम समझौते’ पर हस्ताक्षर की मांग

संकट के समाधान के बीच ट्रंप ने बातचीत में शामिल सभी मध्यस्थ और खाड़ी देशों से अपील की है कि वे इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने वाले ऐतिहासिक ‘अब्राहम अकॉर्ड’ (Abraham Accords) पर हस्ताक्षर करें। ट्रंप ने यहाँ तक दावा कर दिया कि यदि ये सभी बड़े मुस्लिम देश इस समझौते का हिस्सा बनते हैं, तो आगे चलकर खुद ईरान के लिए भी अब्राहम अकॉर्ड पर दस्तखत करना सम्मान की बात होगी। ट्रंप ने इस्लामिक देशों के भीतर इस समझौते को लेकर व्याप्त संकोच और डर को भांपते हुए कहा कि मुमकिन है कि एक या दो देशों के पास इसमें शामिल न होने का कोई खास कारण हो, जिसे अमेरिका स्वीकार भी करेगा; लेकिन बहुसंख्यक देशों को इसके लिए आगे आना ही होगा।

जानिए क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स और मुस्लिम जगत में क्यों है इसका विरोध?

अब्राहम अकॉर्ड्स दरअसल अमेरिका की मध्यस्थता में तैयार किए गए समझौतों की एक रणनीतिक श्रृंखला है, जिसका मुख्य उद्देश्य इजरायल और अरब-इस्लामिक देशों के बीच दशकों पुराने विवाद को खत्म कर उनके राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है। डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान शुरू हुए इस समझौते पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को जैसे देश पहले ही हस्ताक्षर कर चुके हैं, जबकि सूडान ने इस पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दी है।

ट्रंप के मुताबिक, इस समझौते ने हस्ताक्षर करने वाले देशों के लिए एक बड़ा आर्थिक और वित्तीय बूस्टर (Boom) साबित होने का काम किया है। हालांकि, अरब और व्यापक इस्लामिक जगत में अब्राहम अकॉर्ड्स को फिलिस्तीन के मुद्दे और हितों के साथ एक बड़े ‘धोखे’ के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि अधिकांश मुस्लिम देश इससे दूरी बनाकर रखते हैं, क्योंकि इजरायल को मान्यता देने या उसके साथ हाथ मिलाने से उनके घरेलू मोर्चे पर भारी जन-आक्रोश भड़कने का खतरा रहता है।

सऊदी अरब और पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ा कूटनीतिक धर्मसंकट?

ट्रंप की इस खुली अपील और दबाव ने सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे शक्तिशाली मुस्लिम देशों के लिए बड़ी कलीग खड़ी कर दी है। अमेरिका के बेहद करीबी माने जाने वाले सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस समझौते में शामिल होने के लिए पहले ही एक कड़ा रुख अपना रखा है। सऊदी अरब की स्पष्ट शर्त है कि वह इजरायल के साथ संबंधों को तभी सामान्य करेगा जब फिलिस्तीन विवाद के समाधान के लिए ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (Two-State Solution) यानी स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र के गठन को लेकर वैश्विक स्तर पर पूरी स्पष्टता और गारंटी हो।

वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण और पेचीदा है। पाकिस्तान आधिकारिक और संवैधानिक रूप से इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता ही नहीं देता है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा शांति वार्ता की टेबल पर अब्राहम अकॉर्ड का दांव चलना पाकिस्तान और अन्य मध्यस्थ देशों को एक बेहद कठिन कूटनीतिक मोड़ पर ले आया है, जहां एक तरफ युद्ध टालने की मजबूरी है और दूसरी तरफ अपनी पारंपरिक विदेश नीति से समझौता करने का भारी दबाव।