
हो लाल मेरी पत रखियो बला झूले लालण…” यह एक ऐसी धुन है, जो कानों में पड़ते ही रूह को सूफियाना सुकून से भर देती है। चाहे आबिदा परवीन की रूहानी आवाज हो, नुसरत फतेह अली खान का क्लासिक अंदाज या फिर मीका सिंह का मॉडर्न रीमिक्स इस सिंधी कलाम का जादू हर पीढ़ी के सिर चढ़कर बोलता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया रील्स पर ‘चार चराग तेरे बरण हमेशा’ की लाइनें आज भी उतनी ही ट्रेंडिंग हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर धर्म और देश की सीमाओं को तोड़कर लोगों को झुमाने वाले ‘दमादम मस्त कलंदर’ का असल मतलब क्या है? और यह इतनी शिद्दत से किसके लिए गाया गया है? आइए जानते हैं सिंध की मिट्टी से जुड़ी इसकी 700 साल पुरानी बेहद दिलचस्प कहानी।
कौन थे ‘मस्त कलंदर’?
इस कव्वाली की असली कहानी आज से करीब 700 साल पहले 13वीं सदी में शुरू होती है। कव्वाली में जिस ‘कलंदर’ का जिक्र बार-बार आता है, वे असल में हजरत उस्मान मरवंदी थे, जो 13वीं सदी के एक महान सूफी संत थे। उन्हें दुनिया ‘लाल शाहबाज कलंदर’ के नाम से जानती है।
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‘लाल’ क्यों कहा जाता है?: सूफी संत हजरत उस्मान मरवंदी का पसंदीदा रंग लाल था। वे हमेशा लाल रंग का चोगा और लाल टोपी पहनते थे, इसलिए उन्हें ‘लाल’ कहा गया।
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‘शाहबाज’ का मतलब: फारसी में शाहबाज का मतलब होता है ‘शाही बाज’ (Falcon)। उनकी तीक्ष्ण बुद्धि और रूहानी उड़ान के कारण उन्हें यह उपाधि मिली।
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‘कलंदर’ का मतलब: कलंदर उस मस्त फकीर या संत को कहा जाता है, जो दुनियादारी के मोह-माया, नियम-कानूनों से परे होकर सिर्फ खुदा की इबादत में लीन रहता है।
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दरगाह: इनकी दरगाह आज भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सेहवान शरीफ में स्थित है, जहां हर साल लाखों लोग (हिंदू और मुस्लिम दोनों) सजदा करने पहुंचते हैं।
‘झूलेलाल’ और ‘अली’ का अनोखा संगम
इस कव्वाली की सबसे खूबसूरत बात इसका धर्मनिरपेक्ष (Secular) ताना-बाना है। इसमें एक तरफ सिंधी हिंदुओं के आराध्य देव ‘झूलेलाल’ (जिन्हें जल के देवता वरुण का अवतार माना जाता है और ‘लाल’ भी कहा जाता है) की महिमा दिखती है, तो दूसरी तरफ सूफी संत शाहबाज कलंदर और इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली का जिक्र आता है।
‘दमादम मस्त कलंदर, अली दम दम दे अंदर’ का सीधा मतलब है कि हर सांस (दम) के भीतर उस परम शक्ति और मौला अली का वास है, और उस भक्ति में झूमना ही ‘दमादम मस्त कलंदर’ है।
किसने लिखी थी यह कालजयी कव्वाली?
इतिहासकारों और जानकारों के मुताबिक, इस कव्वाली की मूल रचना महान सूफी कवि अमीर खुसरो ने की थी, जो हजरत निजामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य थे। समय के साथ-साथ इसमें बदलाव हुए और बाद में प्रसिद्ध पंजाबी सूफी कवि बाबा बुल्ले शाह ने भी इसमें ‘अली दा पहला नंबर’ जैसी पंक्तियां जोड़कर इसे एक नया विस्तार दिया।
भजनों/कव्वाली की पंक्तियों का गहरा अर्थ
कव्वाली की पंक्तियों में छिपे अर्थ को समझना बेहद खूबसूरत है:
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‘सिंदड़ी दा सेवण दा सखी शाह बाज कलंदर’: सिंध के सेहवान शहर के प्यारे सखी (दाता) लाल शाहबाज कलंदर, मेरी लाज (पत) रखना।
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‘चार चराग तेरे बरण हमेशा, पंजवा मैं बारण आई बला झूले लालण’: हे झूलेलाल! आपकी दरगाह/चौखट पर चार चिराग तो हमेशा जलते ही रहते हैं (जो चार दिशाओं या चार महान सूफी संतों के प्रतीक हैं), लेकिन पांचवां चिराग मैं अपनी मन्नत और श्रद्धा के साथ जलाने आई/आया हूं।
यह कव्वाली महज एक गाना नहीं, बल्कि उस दौर की साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) का प्रतीक है जहां संगीत और भक्ति के लिए मजहब की दीवारें कोई मायने नहीं रखती थीं। यही वजह है कि आज 700 साल बाद भी जब यह गाना बजता है, तो इंसान का मन सचमुच मगन हो जाता है।
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