
यदि आप इस साल ज्येष्ठ मास की प्रसिद्ध निर्जला एकादशी की तारीख खोज रहे हैं, तो आपके लिए एक बड़ा अपडेट है। इस बार निर्जला एकादशी मई के महीने में नहीं, बल्कि जून में पड़ने जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस समय अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) लगा हुआ है, जिसके कारण अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘पद्मिनी’ या ‘कमला’ एकादशी मनाई जाएगी। यह एकादशी बेहद दुर्लभ और खास मानी जाती है, क्योंकि यह हर 3 साल में सिर्फ एक बार आती है।
पद्मपुराण में इस एकादशी का विशेष उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि अधिकमास में आने वाली एकादशी ‘कमला’ या ‘पद्मिनी’ नाम से प्रसिद्ध है और यह सभी तिथियों में उत्तम है। इस व्रत के प्रभाव से भक्तों के जीवन में साक्षात मां लक्ष्मी का आगमन होता है और दरिद्रता दूर होती है।
पद्मिनी एकादशी की उदया तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 26 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट से हो जाएगी। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन 27 मई को सुबह 6 बजकर 22 मिनट पर होगा।
चूंकि शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार दशमी तिथि से युक्त एकादशी का व्रत नहीं रखा जाता है, इसलिए उदया तिथि की मान्यता के आधार पर कमला (पद्मिनी) एकादशी का व्रत 27 मई को रखा जाएगा। हालांकि, व्रत के कड़े नियमों और संयम का पालन भक्तों को 26 मई से ही शुरू करना होगा।
भगवान श्रीहरि के साथ मां लक्ष्मी और तुलसी पूजा का महासंयोग
चूंकि अधिकमास को भगवान पुरुषोत्तम (श्रीहरि) का महीना माना जाता है, इसलिए इस दिन मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की पूजा करने से अनंत गुना फल मिलता है। इस दिन तुलसी जी की पूजा और दीपदान का विशेष महत्व है। पद्मपुराण के श्लोक के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन जनार्दन (भगवान विष्णु) को तुलसी दल और पुष्प अर्पित करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन तुलसी के समीप दीप जलाने से लाख गुना और भगवान विष्णु के निकट दीपदान करने से अनंत गुना पुण्य फल की प्राप्ति होती है। तुलसी की यह सात्विक पूजा साधक को सीधे श्रीहरि के करीब ले जाती है।
व्रत के नियम, विधि और क्या खाएं-क्या न खाएं?
पद्मिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें और भगवान नारायण की विधिवत पूजा करके व्रत कथा का श्रवण करें। शाम के समय भगवान का कीर्तन करना उत्तम माना गया है। इस दिन के लिए कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:
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फलाहार का नियम: व्रत रखने वाले श्रद्धालु भोजन में केवल फलाहार ही ग्रहण करें।
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चावल का निषेध: यदि आप किसी कारणवश यह व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तो भी इस विशेष तिथि पर घर में चावल का सेवन भूलकर भी न करें।
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दीपदान: शाम के समय पीपल के पेड़ और तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जरूर जलाएं।
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मंत्र पाठ: इस दिन ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ का पाठ करना जीवन में खुशहाली और आर्थिक समृद्धि लाता है।
अधिकमास की दूसरी एकादशी (परमा एकादशी) के कड़े नियम
अधिकमास के कृष्ण पक्ष में आने वाली दूसरी एकादशी को ‘परमा’ या ‘कमला/पद्मा’ एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर भगवान पुरुषोत्तम की धूप, दीप, नैवेद्य और फलों से विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इस व्रत को लेकर शास्त्रों में बेहद कड़े नियम बताए गए हैं:
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दशमी के नियम: व्रत करने वाले वैष्णव पुरुष को दशमी तिथि से ही कांसे के बर्तन में भोजन, उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग, शहद, दूसरे का अन्न, दो बार भोजन और मैथुन जैसी 10 चीजों का पूरी तरह परित्याग कर देना चाहिए।
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एकादशी के नियम: एकादशी के दिन व्रती को जुआ, निद्रा (दिन में सोना), पान, दातुन करना, पराई निंदा, चुगली, चोरी, हिंसा, क्रोध और असत्य भाषण (झूठ बोलना) जैसे 11 दोषों का त्याग करना अनिवार्य है।
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