
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान भारत ने वैश्विक कूटनीति के केंद्र में अपनी स्थिति एक बार फिर पूरी मजबूती के साथ स्थापित की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के तीन दिनों के बेहद व्यस्त और रणनीतिक कार्यक्रम के बीच विश्व के शीर्ष नेताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों के साथ कुल 15 उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकें पूरी कीं। इस दौरान रूस, चीन, ईरान, दक्षिण-पूर्व एशिया, खाड़ी क्षेत्र और अफ्रीकी महाद्वीप के राष्ट्राध्यक्षों के साथ गहन बातचीत हुई, जिसने भारत के बहुपक्षीय प्रभाव को एक नई दिशा दी है।
भारत द्वारा वर्ष 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालना केवल एक नियमित राजनयिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह वैश्विक मंच पर अलग-अलग हितों और विचारों वाले देशों को एक मंच पर लाने का अभूतपूर्व प्रयास साबित हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने औपचारिक ब्रिक्स एजेंडे के साथ-साथ द्विपक्षीय वार्ताओं के जरिए भारत के राष्ट्रीय हितों, व्यापार, निवेश, रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती से आगे बढ़ाया। इस पूरे कूटनीतिक प्रयास में सबसे अहम पहलू यह रहा कि वैश्विक तनावों और क्षेत्रीय टकरावों के बीच भारत ने शांति, संवाद और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को प्रमुखता से रखा।
सम्मेलन के पहले दिन 11 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत की। दोनों नेताओं ने भारत-रूस विशेष और रणनीतिक साझेदारी के सभी प्रमुख पहलुओं का गहन विश्लेषण किया। बैठक में रक्षा सहयोग, हाइड्रोकार्बन, असैन्य परमाणु ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षित समुद्री व्यापारिक मार्गों पर बात हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई चेन और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर भी गहरी चिंता साझा की।
उसी दिन प्रधानमंत्री ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से द्विपक्षीय मुलाकात की, जिसमें चाबहार पोर्ट परियोजना, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और मध्य पूर्व के मौजूदा हालात पर चर्चा हुई। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि कूटनीतिक संवाद ही लंबे समय तक चलने वाली शांति का एकमात्र माध्यम है। इसके साथ ही यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से हुई वार्ता ने भारत के बहुपक्षीय वैश्विक सुधारों के एजेंडे को मजबूती प्रदान की।
12 सितंबर 2026 का दिन कूटनीतिक लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील और महत्वपूर्ण रहा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने बैठे। डेलिगेशन स्तर की इस वार्ता पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। दोनों नेताओं ने भारत-चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में पूर्ण शांति व स्थिरता, द्विपक्षीय संबंधों के सामान्यीकरण, निष्पक्ष व्यापार, लचीली सप्लाई चेन और जन-जन के संपर्कों पर विमर्श किया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि मतभेदों को कभी भी विवाद का रूप नहीं लेना चाहिए और दोनों देशों के रिश्तों को आपसी संवेदनशीलता, सम्मान और हितों की नींव पर आगे बढ़ना होगा।
इसी दिन पीएम मोदी ने मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ सेमीकंडक्टर निर्माण, फिनटेक, डिजिटल इकोनॉमी और रक्षा तकनीक के विस्तार पर सहमति बनाई। इसके अलावा इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ भी उच्चस्तरीय चर्चाएं हुईं, जिसमें ग्रीन एनर्जी, अत्याधुनिक तकनीक और क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर के निर्माण पर जोर दिया गया।
सम्मेलन के अंतिम दिन 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ग्लोबल साउथ की आवाज पूरी मजबूती से गूंजी। पीएम मोदी ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के साथ ब्रिक्स के विस्तार और विकासशील देशों के आर्थिक अधिकारों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स का संस्थापक स्तंभ होने के कारण अफ्रीकी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में भारत का अभिन्न साझेदार बना हुआ है।
इसके बाद कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर. मार्कोस जूनियर, बुरुंडी के राष्ट्रपति एवरिस्टे नदायिशिमिये के साथ-साथ युगांडा और नाइजीरिया के नेतृत्व से भी द्विपक्षीय चर्चाएं हुईं। इन वार्ताओं ने मध्य एशिया से लेकर पूरे अफ्रीकी महाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारत के रणनीतिक, व्यापारिक और लॉजिस्टिक्स संबंधों को नया आधार प्रदान किया।
यह पूरा सम्मेलन ऐसे समय में संपन्न हुआ जब वैश्विक स्तर पर यूक्रेन संकट, लाल सागर में व्यापारिक चुनौतियां और पश्चिम एशिया की अस्थिरता दुनिया के ऊर्जा बाजारों और व्यापार मार्गों को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे जटिल भू-राजनीतिक माहौल में भारत ने 15 द्विपक्षीय और दर्जनों अनौपचारिक बैठकों के जरिए यह साबित कर दिखाया कि वह पश्चिम और पूरब, उत्तर और दक्षिण के बीच एक भरोसेमंद और मजबूत संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है।
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