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ट्रंप की पाबंदियों पर शी जिनपिंग का पलटवार: 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने खोला ओपन सोर्स एआई का खजाना

नई दिल्ली के ऐतिहासिक भारत मंडपम में संपन्न हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अंतिम सत्र में उस वक्त वैश्विक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय तकनीकी समीकरण बदल गए, जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सीधे अमेरिकी तकनीकी प्रभुत्व को चुनौती दे डाली। अमेरिका में सत्तासीन ट्रंप प्रशासन द्वारा सेमीकंडक्टर निर्यात पर लगातार बढ़ाई जा रही सख्त पाबंदियों और अमेरिकी एआई मॉडल्स को केवल पश्चिमी हितों तक सीमित रखने की आक्रामक नीतियों के जवाब में चीन ने ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर एक स्वतंत्र, संप्रभु और ओपन-सोर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम बनाने का औपचारिक प्रस्ताव पेश कर दिया है। यह कदम सीधे तौर पर वाशिंगटन की ‘सिलिकॉन डिप्लोमेसी’ के मुकाबले बीजिंग की एक सोची-समझी ‘ओपन सोर्स टेक डिप्लोमेसी’ मानी जा रही है, जिसका सीधा असर भारत समेत सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ना तय है।

शिखर सम्मेलन के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दुनिया के विकासशील और गैर-पश्चिमी देशों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि आधुनिक तकनीक पर किसी एक देश या कुछ चुनिंदा बहुराष्ट्रीय टेक दिग्गजों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। ट्रंप प्रशासन द्वारा हाल ही में उन्नत जीपीयू चिप्स, सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन टूल्स और अत्याधुनिक लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के निर्यात पर कड़ी पाबंदियां लगाई गई हैं। ऐसे दौर में चीन ने ब्रिक्स मंच का उपयोग करते हुए यह ऐलान किया कि वह सदस्य देशों के लिए साझा ‘ब्रिक्स एआई ओपन-सोर्स कम्युनिटी’ की स्थापना में आगे बढ़कर वित्तीय और तकनीकी नेतृत्व प्रदान करेगा। इस पहल का सीधा मकसद यह है कि लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और एशिया के विकासशील देश महंगे अमेरिकी सॉफ्टवेयर और बंद एल्गोरिदम (क्लोज्ड-सोर्स मॉडल्स) पर अपनी रणनीतिक निर्भरता को तुरंत घटा सकें।

राष्ट्रपति जिनपिंग ने अपने भाषण में स्पष्ट किया कि चीन ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर अत्याधुनिक लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स के संयुक्त अनुसंधान, अनुकूलन और व्यावहारिक उपयोग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देगा। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत स्थानीय भाषाओं के डेटासेट तैयार करना, संयुक्त सेमिनार आयोजित करना और विकासशील देशों के वैज्ञानिकों के लिए उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित करना शामिल है। तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो वर्षों में चीनी टेक कंपनियों ने डीपसीक (DeepSeek), अलीबाबा के क्वेन (Qwen) और किमी (Kimi) जैसे बेहद किफायती और उच्च क्षमता वाले ओपन-सोर्स मॉडल्स को दुनिया के सामने रखकर पहले ही हलचल मचा रखी है। अब बीजिंग इसी तकनीकी सफलता को बहुपक्षीय कूटनीतिक समझौते के जरिए संस्थागत रूप देने की रणनीति पर उतर आया है, ताकि उभरते देशों के स्टार्टअप्स और सरकारी एजेंसियां अमेरिकी प्रतिबंधों से बेअसर होकर अपना डिजिटल ढांचा खड़ा कर सकें।

इस पूरी तकनीकी घोषणा के बीच नई दिल्ली का रुख बेहद नपा-तुला और कूटनीतिक सतर्कता से भरा हुआ है। दिलचस्प तथ्य यह है कि सम्मेलन के औपचारिक ‘नई दिल्ली संयुक्त घोषणा पत्र’ में एआई संसाधनों तक न्यायसंगत पहुंच, डेटा सुरक्षा, सिस्टम की विश्वसनीयता और वैश्विक समावेशिता की वकालत तो की गई है, लेकिन इसमें चीन प्रायोजित किसी केंद्रीयकृत एआई ओपन-सोर्स गठबंधन का सीधा समर्थन शामिल नहीं किया गया। भारतीय सुरक्षा रणनीतिकार और टेक नीति विशेषज्ञ चीनी हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर कंपनियों के बैकडोर, डेटा गोपनीयता और साइबर सुरक्षा उल्लंघनों को लेकर हमेशा से बेहद सतर्क रहे हैं। गलवान गतिरोध और पिछले वर्षों में सैकड़ों चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद भारत किसी भी ऐसे तकनीकी ढांचे में शामिल होने से हिचकिचाता है जिसका नियंत्रण परोक्ष रूप से बीजिंग के हाथों में हो। भारत अपनी खुद की ‘इंडिया एआई मिशन’ और स्वतंत्र ओपन कंप्यूटिंग क्षमता को गति देने में जुटा है, जिससे शी जिनपिंग के इस प्रस्ताव पर भारतीय प्रतिक्रिया काफी सधी रहने की संभावना है।

एआई के खुले मंच के अलावा चीनी राष्ट्रपति ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चार अन्य दूरगामी आर्थिक और औद्योगिक पहलों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। व्यापार और निवेश को नई रफ्तार देने के उद्देश्य से उन्होंने ‘ब्रिक्स विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) साझेदारी’ स्थापित करने की अपील की, जिसके माध्यम से सदस्य देशों में समन्वित नीतियां बनाकर एकीकृत मैन्युफैक्चरिंग हब तैयार किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, ‘ब्रिक्स डिजिटल इकोसिस्टम क्लाउड प्लेटफॉर्म’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया, जिससे सभी सदस्य देशों के पारंपरिक उद्योगों को डिजिटल रूप से एक साझा क्लाउड नेटवर्क से जोड़ा जा सके। तीसरी पहल के तहत ‘स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग पार्टनरशिप’ का खाका खींचा गया, जिसमें चीन अपनी रोबोटिक्स और ऑटोमेशन विशेषज्ञता का इस्तेमाल करके अन्य विकासशील देशों में स्मार्ट फैक्ट्रियों के निर्माण में तकनीकी मानकों को साझा करेगा।

शी जिनपिंग द्वारा घोषित पांचवीं महत्वपूर्ण योजना मानव संसाधन और तकनीकी कौशल से जुड़ी है। इसके तहत ‘ब्रिक्स इंजीनियर ट्रेनिंग अलायंस’ गठित करने की बात कही गई है। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों के लाखों युवा इंजीनियरों और शोधकर्ताओं को आधुनिक तकनीकों, नैनोटेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर डिजाइनिंग और रोबोटिक्स में प्रशिक्षित करना है। साथ ही, सदस्य राष्ट्रों के बीच इंजीनियरिंग योग्यताओं और पेशेवर डिग्रियों की पारस्परिक मान्यता (म्यूचुअल रिकॉग्निशन) की व्यवस्था बनाई जाएगी, ताकि कुशल मानव संसाधन बिना किसी कानूनी या वीजा अड़चनों के पूरे ब्लॉक में स्वतंत्र रूप से अपनी सेवाएं दे सके।

इस प्रकार नई दिल्ली से सामने आया चीन का यह पांच सूत्रीय वैश्विक तकनीकी एजेंडा केवल आर्थिक सहयोग का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह शीत युद्ध जैसी परिस्थितियों में अमेरिकी तकनीकी वर्चस्व के समानांतर एक नया बहुध्रुवीय तकनीकी ब्लॉक खड़ा करने की बीजिंग की सबसे आक्रामक कोशिश है।