
हिंदी दिवस के पावन अवसर पर देश की शीर्ष अदालत ने न्यायिक प्रणाली को आम आदमी की समझ के करीब लाने के लिए एक ऐतिहासिक और युगांतकारी पहल का बिगुल बजा दिया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आधिकारिक तौर पर ‘जन सूचना सेवा’ (Public Information Service) नाम से एक अनूठी जन-जागरूकता पहल शुरू करने की औपचारिक घोषणा की है। दशकों से कानूनी दांव-पेचों, भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दावली और जटिल आदेशों के चलते जो फैसले केवल वकीलों और न्यायाधीशों तक सीमित रह जाते थे, अब वे देश के गांव-कस्बों में बैठे आम नागरिकों, गरीब वादियों और खासकर दिव्यांगजनों तक सीधे उनकी मातृभाषा में पहुंचेंगे। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि वास्तविक न्याय केवल अदालत के बंद कमरों में सुनाए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जब तक एक आम भारतीय नागरिक अपने पक्ष या विपक्ष में आए फैसले की मूल भावना और उसके सामाजिक-कानूनी असर को अपनी जानी-पहचानी भाषा में न समझ ले, तब तक न्याय तक समग्र पहुंच का लक्ष्य अधूरा रहता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई इस नई ‘जन सूचना सेवा’ के ढांचे को आधुनिक डिजिटल युग की जरूरतों के अनुसार बहु-आयामी स्वरूप में डिजाइन किया गया है। इसके अंतर्गत संवैधानिक पीठों, जनहित याचिकाओं और व्यापक जन-सरोकार से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी आदेशों का बेहद सरल, स्पष्ट और बिना किसी कानूनी जटिलता वाला हिंदी सारांश तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही, देश में पहली बार शीर्ष अदालत स्वयं लगभग 15 से 30 मिनट की अवधि वाले विशेष हिंदी ऑडियो और वीडियो बुलेटिन प्रसारित करेगी। इन बुलेटिनों में अनुभवी विधिक विश्लेषकों द्वारा यह आसान भाषा में समझाया जाएगा कि अदालत के सामने वास्तविक विवाद क्या था, संविधान के किस अनुच्छेद या कानून के तहत दलीलें दी गईं, और अंतिम निर्णय का आम आदमी के दैनिक जीवन व अधिकारों पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
यह क्रांतिकारी पहल विशेष रूप से उन वादियों, बुजुर्गों और दिव्यांग नागरिकों के लिए एक बड़ा वरदान साबित होने जा रही है, जो दृष्टिबाधित होने या औपचारिक कानूनी शिक्षा न होने के कारण सैकड़ों पन्नों के अंग्रेजी फैसले पढ़ने या समझने में असमर्थ रहते थे। ऑडियो प्रारूप की उपलब्धता से दृष्टिबाधित नागरिक सुनकर सीधे फैसले का सार समझ सकेंगे, जबकि विजुअल बुलेटिन से श्रवण-बाधित या कम साक्षर लोग भी शीर्ष अदालत के कामकाज से सीधा जुड़ाव महसूस करेंगे। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का मूल उद्देश्य न्याय व्यवस्था को पूरी तरह से समावेशी, पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाना है, जिससे भारतीय भाषाओं के प्रति गहरा सम्मान प्रदर्शित होने के साथ-साथ न्यायिक प्रणाली पर जनता का अटूट विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो सके।
सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक बयान में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हालांकि इस महत्वाकांक्षी सेवा की औपचारिक शुरुआत हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ की जा रही है, लेकिन इसका दायरा यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में चरणबद्ध तरीके से इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़, उड़िया और मलयालम जैसी तमाम प्रमुख भारतीय भाषाओं में भी विस्तारित किया जाएगा। इस बहुभाषी डिजिटल विस्तार का मुख्य लक्ष्य देश के भाषाई तौर पर विविधतापूर्ण हर राज्य और क्षेत्र के अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को सशक्त बनाना है, ताकि भाषाई बाधाएं न्याय और मौलिक अधिकारों की समझ के बीच कभी दीवार न बन सकें।
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