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हरतालिका तीज के नामकरण का अनूठा रहस्य: माता पार्वती के ‘हरण’ से जुड़ी है कथा, भाद्रपद तृतीया पर अखंड सौभाग्य के इस महापर्व की रोचक महिमा

सनातन धर्म परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए सबसे पवित्र और फलदायी व्रतों में सर्वोच्च स्थान रखता है। इस पावन अवसर पर सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पूरे चौबीस घंटे का अत्यंत कठिन निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं देवाधिदेव महादेव जैसे सुयोग्य, निष्ठावान और मनभावन वर की प्राप्ति हेतु भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त रूप से पूजा-अर्चना करती हैं। इस महाव्रत की प्रमुख परंपरा यह है कि इसमें नदी किनारे की शुद्ध काली मिट्टी या बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य श्री गणेश की मूर्तियां अपने हाथों से बनाई जाती हैं और उनका षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। अक्सर लोगों के मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है कि तीज के इस महापर्व को केवल तीज न कहकर विशेष रूप से ‘हरतालिका’ क्यों पुकारा जाता है। इसके पीछे का रहस्य किसी व्याकरण से नहीं बल्कि भगवान शिव के प्रति माता पार्वती के अनन्य प्रेम और उनकी सखियों के असीम समर्पण की एक अद्भुत पौराणिक गाथा से जुड़ा हुआ है।

संस्कृत और वैदिक शास्त्रों के अनुसार ‘हरतालिका’ शब्द दो मूल शब्दों के मेल से निर्मित हुआ है—पहला शब्द ‘हरत’ है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘हरण करना’ या गुप्त रूप से कहीं ले जाना होता है, और दूसरा शब्द ‘आलिका’ है जिसका अर्थ ‘सहेली’ अथवा ‘सखी’ होता है। इस प्रकार हरतालिका का सीधा और स्पष्ट अर्थ है ‘सखियों द्वारा किया गया हरण’। शिव महापुराण में वर्णित प्राचीन कथा के अनुसार यह व्रत सर्वप्रथम जगज्जननी माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने शाश्वत पति के रूप में पाने के लिए संपन्न किया था। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के नाते माता पार्वती बाल्यकाल से ही भगवान शंकर को अपना सर्वस्व और पति मान चुकी थीं, लेकिन उनके पिता गिरिराज हिमालय अपनी लाडली का विवाह देवर्षि नारद के प्रस्ताव पर जगत के पालनहार भगवान विष्णु से कराना चाहते थे। जब माता पार्वती को इस बात का भान हुआ कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह तय किया जा रहा है, तो वे गहरे शोक और विरह में डूब गईं। तब उनकी घनिष्ठ सखियों ने माता पार्वती की मानसिक व्यथा को समझा और एक गोपनीय योजना बनाकर उनका महल से हरण कर लिया। सखियां उन्हें राजसी सुख-सुविधाओं से दूर एक अत्यंत बीहड़, शांत और सुरक्षित वन क्षेत्र की गुफा में छिपा लाईं, ताकि बिना किसी पारिवारिक हस्तक्षेप के वे अपनी साधना पूरी कर सकें। चूंकि यह पूरी तपस्या सखियों द्वारा हरण किए जाने के बाद आरंभ हुई थी, इसलिए इस पावन तिथि और व्रत का नाम युगों-युगों के लिए ‘हरतालिका तीज’ के रूप में अमर हो गया।

घने जंगल में छिपकर माता पार्वती ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए ऐसी घोर तपस्या आरंभ की जिसे देख देवलोक भी विस्मित रह गया था। उन्होंने राजमहल के 56 भोगों और अन्न-जल का पूरी तरह परित्याग कर दिया और लगातार 17 वर्षों तक केवल सूखे पत्ते, कंदमूल और अंत में निराहार रहकर घोर शीत, धूप और वर्षा की परवाह किए बिना तप किया। अंततः भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को, जब आकाश में हस्त नक्षत्र का शुभ संयोग बना, माता पार्वती ने गंगा या पावन नदी की रेत से अपने हाथों से शिवलिंग का निर्माण किया और बेलपत्र, धतूरा, भांग व पुष्प अर्पित कर पूरी रात्रि जागरण किया। माता पार्वती की इस निश्छल भक्ति, कठोर तप और अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर भोलेनाथ स्वयं उस बीहड़ वन में प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। तभी से हस्त नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल तृतीया को अखंड सौभाग्य के उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।

हरतालिका तीज का अनुष्ठान मुख्य रूप से तीन चरणों में संपन्न होता है। व्रत के एक दिन पूर्व यानी द्वितीया तिथि को सुहागिन महिलाएं अपने मायके जाती हैं या फिर ससुराल में उनके लिए मायके से विशेष ‘सिंजारा’ भेजा जाता है, जिसमें पारंपरिक वस्त्र, मेहंदी, सुहाग की पिटारी, चूड़ियां, मिठाइयां और फल शामिल होते हैं। व्रत के मुख्य दिन यानी तृतीया को महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर निर्जला व्रत का कड़ा संकल्प लेती हैं। पूरे दिन जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती। प्रदोष काल यानी गोधूलि वेला में स्वच्छ वेदी पर केले के पत्तों का मंडप बनाकर मिट्टी के शिव-पार्वती और गणेश जी को स्थापित किया जाता है। महिलाएं सोलह श्रृंगार करके सामूहिक रूप से हरतालिका तीज व्रत की पावन कथा सुनती हैं और रात्रि भर चार प्रहर की विशेष आरती व भजन-कीर्तन करती हैं। अगले दिन प्रातःकाल चतुर्थ प्रहर के उपरांत स्नान कर माता पार्वती को सुहाग की सभी सामग्री—जैसे सिंदूर, बिंदी, महावर और वस्त्र—अर्पित की जाती हैं, ब्राह्मणों को दान दिया जाता है और उसके पश्चात चरणामृत व जल ग्रहण करके इस कठिन व्रत का विधिवत पारण किया जाता है। शास्त्रों का मत है कि जो भी स्त्री इस पावन विधि का श्रद्धापूर्वक पालन करती है, उसका वैवाहिक जीवन समस्त संकटों से मुक्त रहता है और उसे जीवनभर अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।