
सनातन धर्म में पितृ पक्ष के पावन सोलह दिनों की अवधि को दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन कालखंड माना गया है। धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस महापक्ष में हमारे सभी पूर्वज सूक्ष्म रूप से परलोक से भूलोक पर अपने कुल के द्वार पर पधारते हैं और अपने वंशजों द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाने वाले अन्न, जल और तर्पण को सहर्ष स्वीकार करते हैं। यूं तो पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथि का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक विधान है और पूर्वज जिस तिथि को गोलोकवासी हुए हों, उसी दिन उनका श्राद्ध करने की परंपरा है, परंतु इन सोलह तिथियों में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को असाधारण स्थान प्राप्त है। इस पावन तिथि को शास्त्रों में ‘मातृ नवमी’, ‘अविधवा नवमी’ और ‘सौभाग्यवती श्राद्ध’ के नाम से जाना जाता है, जो परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों और समस्त मातृ-शक्ति के तृप्तिकरण के लिए पूर्णतः समर्पित है।
शास्त्रों और वैदिक अंक ज्योतिष में नौ (9) के अंक को कोई साधारण संख्या नहीं बल्कि परम पूर्णता और आदिशक्ति स्वरूपा दैवीय ऊर्जा का प्रतीक स्वीकार किया गया है। जिस प्रकार चैत्र और शारदीय नवरात्र के नौ दिन मां भगवती दुर्गा के नौ स्वरूपों को समर्पित होकर प्रकृति की स्त्री शक्ति का उत्सव मनाते हैं, ठीक उसी तरह पितृ पक्ष का यह नौवां दिन कुल की उन दिवंगत मातृ-शक्तियों के प्रति समर्पण का दिन है जिन्होंने अपने वात्सल्य, त्याग और स्नेह से वंश को सींचा था। गरुड़ पुराण और निर्णय सिंधु जैसे प्रामाणिक धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि पितृ पक्ष में पितृ और मातृ दोनों पक्षों के पूर्वजों का तर्पण करना प्रत्येक गृहस्थ का परम कर्तव्य है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि किसी व्यक्ति को अपनी दिवंगत माता, दादी, नानी, सास या परिवार की किसी भी महिला पूर्वज की निश्चित मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो भी मातृ नवमी के दिन उनका विधिवत श्राद्ध और तर्पण करने से उन्हें सीधे परलोक में तृप्ति प्राप्त हो जाती है और वे प्रसन्न होकर विदा लेती हैं।
हिंदू धर्म दर्शन में मनुष्य के जीवन पर मुख्य रूप से तीन बड़े ऋण माने गए हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण, जिसमें सबसे गहन और संवेदनशील हिस्सा ‘मातृ ऋण’ का होता है। नौ महीने तक गर्भ में धारण करने और असहनीय पीड़ा सहकर जीवन देने वाली मां का ऋण किसी भी सांसारिक वस्तु से नहीं चुकाया जा सकता, परंतु मातृ नवमी पर पूरी निष्ठा और श्रद्धा से किया गया श्राद्ध वंशज को इस गंभीर आध्यात्मिक दायित्व से मुक्ति दिलाने में सहायक बनता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति इस तिथि पर महिला पूर्वजों का स्मरण और श्राद्ध कर्म नहीं करता, उसकी दिवंगत माताएं और मातृ-शक्तियां अतृप्त और क्षुब्ध होकर वापस अपने लोक लौट जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार कुल की माताओं का अतृप्त लौटना परिवार में अज्ञात अशांति, वंश वृद्धि में बाधा, स्वास्थ्य संकट और दुर्भाग्य का कारण बन सकता है, वहीं विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध कुल को अखंड सौभाग्य, पारिवारिक समृद्धि और खुशहाली का स्थायी आशीर्वाद प्रदान करता है।
मातृ नवमी के दिन श्राद्ध का दायित्व विशेष रूप से घर की बहुओं और पुत्रों द्वारा अत्यंत पवित्र भाव से निभाया जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल अथवा किसी स्वच्छ स्थान पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके एक पवित्र चौकी स्थापित की जाती है, जिस पर दिवंगत माता अथवा महिला पूर्वजों के निमित्त श्वेत वस्त्र बिछाया जाता है। इसके पश्चात पके हुए चावल, गाय के कच्चे दूध, तिल और शहद के मिश्रण से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं। तर्पण विधान के अंतर्गत तांबे अथवा पीतल के पात्र में शुद्ध जल लेकर उसमें काले तिल, श्वेत पुष्प और पवित्र कुश घास मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके “तस्मै स्वधा नमः” अथवा मातृ तर्पण मंत्रों का उच्चारण करते हुए अंजलि से जल प्रवाहित किया जाता है। तर्पण के उपरांत शुद्ध घी में बने सात्विक भोजन, पकवान, खीर और मौसमी फलों को देशी गाय के गोबर से बने कंडे की पवित्र अग्नि (धूप) पर अर्पित करके हवन किया जाता है। शास्त्रों में इस तिथि पर ब्राह्मण महिलाओं अथवा सौभाग्यवती स्त्रियों को श्रद्धापूर्वक आदर सहित घर बुलाकर भोजन कराने, उन्हें वस्त्र व सुहाग सामग्री भेंट करने तथा पंचबलि कर्म के तहत गाय, कौवे, कुत्ते, चींटियों और देवताओं के निमित्त भोजन का पहला ग्रास निकालने का अनिवार्य नियम बताया गया है, जिससे पूर्वज तृप्त होकर वंशजों को दीर्घायु और समृद्धि का आशीष देते हैं।
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