
फरारी के दौरान 2200 किलोमीटर तक पुलिस और जांच एजेंसियों को छकाने वाली श्रद्धा दुबे के मामले में हर दिन चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। अब तक इसे केवल एक शातिर दिमाग का व्यक्तिगत तौर पर पुलिस से भागने का मामला माना जा रहा था, लेकिन पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स की सघन पूछताछ में जो कड़ियां जुड़ी हैं, उसने पूरे जांच तंत्र को हिलाकर रख दिया है। श्रद्धा की फरारी के पीछे अंतरराज्यीय संगठित अपराध के कुख्यात सिंडिकेट यानी ‘Z गैंग’ का साया सामने आया है। जांच से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, कानून के शिकंजे से बचने के लिए श्रद्धा ने इसी गिरोह के नेटवर्क से सीधा संपर्क साधा था। गिरोह के सरगनाओं ने उसे न केवल सुरक्षित ठिकाना (सेफ हाउस) और फर्जी पहचान के दस्तावेज मुहैया कराने का पक्का भरोसा दिया था, बल्कि उसे कानूनी सीमाओं से बाहर निकालकर किसी अन्य राज्य या सीमांत इलाके में सुरक्षित छिपाने की पूरी बिसात बिछाई जा चुकी थी। लेकिन इससे पहले कि अंडरवर्ल्ड की यह ढाल उसे महफूज कर पाती, एक मामूली सी तकनीकी चूक ने पूरे खेल का पासा पलट दिया।
जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर एक अकेली महिला बिना किसी संगठित मदद के कई राज्यों की सीमाएं कैसे लांघती रही और इतने दिनों तक भूमिगत रहने का खर्च कैसे उठाती रही। रिमांड के दौरान हुई तकनीकी पड़ताल में सामने आया है कि वारदात को अंजाम देने के कुछ ही घंटों के भीतर श्रद्धा ने अपने एक पुराने संपर्क सूत्र के जरिए Z गैंग के स्लीपर नेटवर्क से राब्ता कायम किया था। यह गिरोह फिरौती, गैर-कानूनी वसूली और वांछित अपराधियों को पैसे के बदले ‘लॉजिस्टिक और सेफ पैसेज’ देने के लिए कुख्यात माना जाता है। गिरोह के सिंडिकेट ने श्रद्धा को पुलिस से बचने के कई गुप्त कोड और यात्रा के दौरान अपनी असली पहचान छुपाए रखने के सख्त तौर-तरीके सिखाए थे। बुर्का पहनकर बस और सामान्य डिब्बों में सफर करना, डिजिटल सर्विलांस से बचने के लिए अपने फोन को हमेशा के लिए स्विच ऑफ रखना और केवल चलते-फिरते अनजान राहगीरों से इंटरनेट का सीमित इस्तेमाल करना—यह सब उसी गिरोह की दी गई गाइडलाइन का हिस्सा था।
पूछताछ में यह बात भी निकलकर आई है कि Z गैंग के स्थानीय गुर्गों ने श्रद्धा को उत्तर भारत के एक सुरक्षित ठिकाने (सेफ हाउस) में तब तक छिपाए रखने का वादा किया था, जब तक कि मामले में पुलिस की शुरुआती धरपकड़ और मीडिया की सुर्खियां ठंडी न पड़ जाएं। इस संरक्षण के बदले भारी-भरकम रकम और हवाला के जरिए लेनदेन की बात भी तय हुई थी। गिरोह के निर्देश पर ही वह लगातार अपनी लोकेशन बदलती रही ताकि किसी एक जगह पर 24 घंटे से ज्यादा समय न बिताना पड़े। उसे यकीन दिलाया गया था कि रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों के रास्तों पर उसके लिए ‘कवर’ मौजूद है और जैसे ही वह तय किए गए सुरक्षित जिले की सीमा में दाखिल होगी, उसे फर्जी नाम से बना आधार कार्ड और एक नया आवास उपलब्ध करा दिया जाएगा। इस झूठे सुरक्षा चक्र ने श्रद्धा को यह मुगालता दे दिया कि वह पुलिस की पहुंच से मीलों दूर निकल चुकी है।
अपराध की दुनिया में हर चालाकी के पीछे एक कमजोर नस जरूर होती है, और इस मामले में भी वही हुआ। Z गैंग के तकनीकी हैंडलर ने श्रद्धा को सख्त हिदायत दी थी कि वह किसी भी सूरत में अपने पुराने किसी भी सोशल मीडिया, गूगल ड्राइव या बैंकिंग अकाउंट को लॉग-इन नहीं करेगी। लेकिन सफर के आखिरी पड़ाव पर पहुंचते ही उसे अपने एक बेहद निजी दस्तावेज और पैसों के इंतजाम के लिए अपने पुराने डिजिटल क्लाउड स्टोरेज की जरूरत महसूस हुई। इसी बेचैनी में उसने एक अनजान व्यक्ति के फोन से हॉटस्पॉट कनेक्ट किया और चंद सेकंड के लिए अपने उस पुराने डिजिटल खाते में प्रवेश कर गई, जिसे साइबर सेल पहले ही 24 घंटे की ‘रडार’ पर रखकर बैठी थी। साइबर सेल के सर्वर पर आईपी एड्रेस का ट्रिगर बजते ही पुलिस को उस इलाके का सटीक दायरा पता चल गया जहां वह उस वक्त मौजूद थी।
इधर Z गैंग के स्थानीय कारिंदे श्रद्धा को नए ठिकाने पर शिफ्ट करने के लिए गाड़ी लेकर आगे बढ़ रहे थे, उधर पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स की सादे कपड़ों में तैनात टीम ने उस इलाके की पूरी नाकेबंदी कर दी थी। जैसे ही श्रद्धा एक अस्थायी लॉज के पास अपने संपर्क का इंतजार कर रही थी, पुलिस की महिला विंग और स्थानीय सर्विलांस टीम ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। जिस Z गैंग के संरक्षण के दम पर वह निश्चिंत बैठी थी, उसके किसी भी मददगार को मौके पर फटकने तक का मौका नहीं मिला। पुलिस अब श्रद्धा से उस नेटवर्क के बारे में विस्तृत पूछताछ कर रही है, जिसने उसे भागने में मदद की और पैसे मुहैया कराए। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बहुत जल्द Z गैंग के उन चेहरों को भी बेनकाब किया जाएगा जो कानून से भागे अपराधियों को पनाह देने का गैर-कानूनी धंधा चलाते हैं।
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