
बिहार की राजनीति में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर चल रहा वर्चस्व का बड़ा खेल अब पूरी तरह से सड़कों और चौराहों पर बेपर्दा हो चुका है। मोकामा के चर्चित बाहुबली विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को जेडीयू से 6 साल के लिए निष्कासित किए जाने और उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश के बाद राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लेकिन इस पूरी कार्रवाई के केंद्र में केवल विधान परिषद चुनाव (MLC Election) का विवाद नहीं है, बल्कि पार्टी के दो सबसे कद्दावर दिग्गजों—केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह और जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा—के बीच चल रही वर्चस्व की अंदरूनी जंग है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा जोरों पर है कि ललन सिंह और संजय झा के बीच पावर गेम और शह-मात की इस लड़ाई में अनंत सिंह बलि का बकरा बन गए हैं।
बिहार विधान परिषद के पटना स्नातक चुनाव के दौरान इस अंदरूनी कलह की पहली चिंगारी भड़की थी। जेडीयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर मैदान में उतरे अनंत सिंह ने जब जनसुराज प्रत्याशी का समर्थन किया, तो इसे पार्टी की अनुशासनहीनता माना गया। हालांकि, जब तक मामले को सुलझाने की बात थी, तब तक ललन सिंह ने बीच-बचाव करते हुए यह बयान दिया था कि “ताली एक हाथ से नहीं बजती” और पार्टी से भी कुछ चूक हुई है। लेकिन दूसरी ओर, संजय झा और पार्टी के अन्य रणनीतिकारों ने इसे सीधे तौर पर चुनौती माना। ललन सिंह द्वारा मोकामा विधायक के बचाव की कोशिशों और संजय झा खेमे द्वारा सख्त कार्रवाई के दबाव ने पार्टी के भीतर दो बड़े पावर सेंटर्स की दरार को पूरी तरह उजागर कर दिया।
अनंत सिंह और उनकी पत्नी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश जारी होने के तुरंत बाद जब दिल्ली में मीडिया ने ललन सिंह और संजय झा को एक साथ घेरा, तो वहां जो नजारा देखने को मिला उसने पूरी कहानी बयान कर दी। निष्कासन के सवाल पर ललन सिंह ने सीधे तौर पर संजय झा की ओर इशारा करते हुए कह दिया कि “यह उनके अधिकार क्षेत्र का मामला है, उनसे बात कीजिए” और वे गाड़ी में बैठकर निकल गए। वहीं, जब संजय झा से सवाल पूछा गया तो उन्होंने भी चुप्पी साध ली और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गए। केंद्रीय नेतृत्व के दो शीर्ष स्तंभों का इस तरह मीडिया के सामने जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालना और चुप्पी साधना यह साबित करता है कि जेडीयू के भीतर फैसलों को लेकर गहरी खींचतान जारी है।
जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखाए जाने और विधानसभा सदस्यता खत्म करने के लिए स्पीकर को पत्र भेजे जाने के बाद ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर अनंत सिंह ने भी अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। मोकामा में अपना मजबूत जनाधार रखने वाले अनंत सिंह ने संकेत दिए हैं कि वे आने वाले समय में अपने समर्थकों के साथ नई राजनीतिक राह चुन सकते हैं। बिहार की राजनीति के जानकारों का मानना है कि मोकामा और आसपास के भूमिहार बहुल इलाकों में अनंत सिंह की सीधी पकड़ को नजरअंदाज करना जेडीयू के लिए भी आने वाले विधानसभा चुनावों में भारी पड़ सकता है। फिलहाल, ललन सिंह और संजय झा की इस अंदरूनी जंग से उपजे सियासी बवंडर पर पूरे बिहार की नजरें टिकी हुई हैं।
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