
सुप्रीम कोर्ट के गलियारों से एक बेहद सख्त और तीखी टिप्पणी सामने आई है, जिसने पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक सुस्ती के मामलों में हड़कंप मचा दिया है। देश के सर्वोच्च न्यायालय में अरावली पहाड़ियों के संरक्षण और अवैध खनन से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के दौरान भारत के माननीय न्यायाधीश (CJI पदोन्नति/कार्यभार संदर्भ) जस्टिस सूर्यकांत अधिकारियों और कमिटी के कामकाज के तरीकों पर बुरी तरह भड़क गए। सुनवाई के दौरान जब कमिटी की तरफ से मामले में बार-बार टालमटोल रवैया अपनाया गया और लंबी तारीखों की मांग की जाने लगी, तो जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए बेहद चुटीले और कड़े अंदाज में कहा कि क्या वे चाहते हैं कि इस मामले की अगली तारीख उनकी रिटायरमेंट के बाद दी जाए। सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी फटकार के बाद से पर्यावरण मामलों से जुड़े प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है और अदालत ने साफ शब्दों में दो महीने के भीतर हर हाल में अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश जारी कर दिया है।
भारत के उत्तरी पश्चिमी हिस्से में दिल्ली से लेकर हरियाणा और राजस्थान तक फैली अरावली की पहाड़ियां न केवल इस क्षेत्र के भौगोलिक सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत को मरुस्थलीकरण (Desertification) से बचाने वाली एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती हैं। पिछले कई दशकों से अंधाधुंध अवैध खनन, पत्थरों के उत्खनन, जंगलों की कटाई और बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माणों ने इस प्राचीन पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पर्यावरणविदों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के आदेशों के बावजूद जमीनी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण के चलते अरावली के संरक्षण का काम उतनी तेजी से नहीं हो पाया जितनी की उम्मीद की जा रही थी। यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत ने इस अति-संवेदनशील मामले में खुद कमान संभालते हुए एक विशेष उच्च स्तरीय कमिटी का गठन किया था ताकि वह जमीनी हकीकत का जायजा लेकर अदालत को अपनी सटीक रिपोर्ट सौंप सके, लेकिन कमिटी की धीमी रफ्तार ने अब अदालत का धैर्य पूरी तरह से तोड़ दिया है।
मामले की ताजा सुनवाई के दौरान जब अदालत के सामने यह बात आई कि अरावली मामलों की जांच और सर्वे से जुड़ी कमिटी अपने काम को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने के बजाय लगातार ढिलाई बरत रही है, तो जस्टिस सूर्यकांत का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अदालत कक्ष में मौजूद वकीलों और कमिटी के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि इस तरह के गंभीर और राष्ट्रीय महत्व के पर्यावरणीय मुद्दों पर इस प्रकार का गैर-जिम्मेदाराना रवैया बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जब कमिटी के सदस्यों की तरफ से मामले में और अधिक समय मांगे जाने के संकेत दिए गए, तो जस्टिस सूर्यकांत ने कटाक्ष करते हुए कहा कि लगता है कि आप लोग यह चाहते हैं कि इस केस की सुनवाई मेरी रिटायरमेंट के बाद की तारीख पर हो ताकि फैसले में और ज्यादा देरी की जा सके। इस तरह की दो टूक और खरी-खरी टिप्पणियों ने साफ कर दिया है कि सर्वोच्च न्यायालय अब पर्यावरण से खिलवाड़ करने वाले तत्वों और मामलों को लटकाने वाली प्रशासनिक व्यवस्थाओं के प्रति किसी भी तरह की नरमी बरतने के मूड में नहीं है।
अदालत की इस कड़ी नाराजगी और तीखी फटकार के बाद अब अरावली हिल कमिटी और संबंधित प्रशासनिक महकमों पर तय समय सीमा के भीतर अपना काम पूरा करने का भारी दबाव बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि कमिटी को किसी भी बहाने से और अधिक मोहलत नहीं दी जाएगी और उसे हर हाल में अगले दो महीने के भीतर अरावली संरक्षण से जुड़ी अपनी विस्तृत और अंतिम रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करनी होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय आने वाले दिनों में अवैध खनन और अनियोजित निर्माण कार्यों पर रोक लगाने के लिए कुछ बेहद कड़े और ऐतिहासिक फैसले ले सकता है, जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और आसपास के इलाकों के पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी। जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता से देश भर के अन्य पर्यावरणीय मामलों में भी अदालतों का रुख सख्त होगा और सरकारी तंत्र में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक मजबूत संदेश जाएगा।
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