
दुनियाभर के युवाओं के जेहन में जब भी मैनेजमेंट की दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित डिग्री यानी मास्टर इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी एमबीए का जिक्र आता है, तो सबसे पहला और बड़ा नाम अमेरिका की शीर्ष यूनिवर्सिटीज का ही आता है, जहां से पढ़ाई करना हर महत्वाकांक्षी छात्र का एक बड़ा सपना होता है। अमेरिका की हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, व्हार्टन और कोलंबिया जैसी दुनिया की नंबर-1 बिजनेस स्कूलों से एमबीए की डिग्री हासिल करना न सिर्फ एक शानदार कॉर्पोरेट करियर की गारंटी माना जाता है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर पेशेवर तरक्की के नए दरवाजे भी खोल देता है। हालांकि, इस सुनहरे सपने को पूरा करने की राह में सबसे बड़ी और मुख्य बाधा भारी-भरकम खर्च यानी ट्यूशन फीस और वहां रहने का भारी आर्थिक बोझ होता है, जिसके बारे में हर उस छात्र को गहराई से पता होना चाहिए जो अमेरिका जाकर अपनी किस्मत आजमाना चाहता है। आज के इस विस्तृत आर्टिकल में हम आपको अमेरिका की टॉप यूनिवर्सिटीज से एमबीए करने आने वाले कुल खर्च, ट्यूशन फीस, लिविंग कॉस्ट और अन्य सभी जरूरी शुल्कों का पूरा और सटीक हिसाब-किताब आसान भाषा में समझाने जा रहे हैं।
अमेरिका के किसी भी शीर्ष या प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल से एमबीए करने की जब बात होती है, तो ट्यूशन फीस अपने आप में एक बहुत बड़ा आंकड़ा होती है जो किसी को भी चौंका सकती है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस या पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल जैसे दुनिया के नंबर-1 संस्थानों में दो साल के फुल-टाइम एमबीए प्रोग्राम की कुल ट्यूशन फीस अकेले ही लगभग 80,000 अमेरिकी डॉलर से लेकर 1,20,000 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष तक हो सकती है। अगर भारतीय रुपये में इसका सीधा हिसाब लगाया जाए, तो केवल दो साल की ट्यूशन फीस का यह आंकड़ा आसानी से 75 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच जाता है। यह फीस केवल शैक्षणिक पाठ्यक्रम, क्लासरूम रिसोर्सेज, केस स्टडी मैटेरियल और फैकल्टी चार्ज को कवर करती है, जबकि इसके अलावा अन्य यूनिवर्सिटी चार्जेस और हेल्थ इंश्योरेंस का खर्च अलग से जुड़ जाता है, जो बजट को और अधिक बढ़ा देता है।
ट्यूशन फीस के बाद जो दूसरा सबसे बड़ा वित्तीय खर्च छात्र के सामने आता है, वह है अमेरिका के महंगे शहरों में दो साल तक रहने, खाने और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने का खर्च जिसे लिविंग कॉस्ट या कॉस्ट ऑफ लिविंग कहा जाता है। बोस्टन, सैन फ्रांसिस्को, न्यूयॉर्क या फिलाडेल्फिया जैसे महानगरों में स्थित टॉप यूनिवर्सिटीज के आसपास रहना अपने आप में एक खर्चीला सौदा है, क्योंकि वहां किराए पर अपार्टमेंट लेना, लोकल ट्रांसपोर्ट का खर्च, ग्रॉसरी और खाने-पीने का सामान काफी महंगा पड़ता है। एक छात्र के तौर पर अमेरिका में रहने और खाने का औसत खर्च लगभग 25,000 से 40,000 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये के बीच बैठता है। इसमें शेयरिंग अकमोडेशन, हेल्थ इंश्योरेंस, किताबें, लैपटॉप और अन्य पर्सनल खर्चे शामिल होते हैं, और यदि कोई छात्र अपने परिवार या पार्टनर के साथ वहां रहता है, तो यह खर्च डेढ़ गुना तक और अधिक बढ़ सकता है।
जब छात्र अमेरिका से एमबीए करने का फाइनल बजट तैयार करते हैं, तो वे अक्सर ट्यूशन और लिविंग कॉस्ट को तो जोड़ लेते हैं, लेकिन कई अन्य छोटे और छुपे हुए खर्चों को नजरअंदाज कर देते हैं जो बाद में बड़ा आर्थिक झटका दे सकते हैं। इसमें सबसे पहले अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के आवेदन यानी एप्लीकेशन फीस शामिल होती है, जो हर एक यूनिवर्सिटी के लिए 150 से 250 डॉलर तक होती है, और छात्र आमतौर पर 4 से 5 यूनिवर्सिटीज में आवेदन करते हैं। इसके अलावा जीमैट या जीआरई परीक्षा की फीस, टोफेल या आईलेट्स जैसी अंग्रेजी दक्षता परीक्षाओं की कोचिंग और टेस्ट फीस, अमेरिका का एफ-1 स्टूडेंट वीजा और सेविस फीस, तथा भारत से अमेरिका आने-जाने का वन-वे और रिटर्न हवाई किराया शामिल होता है। इन सभी शुरुआती और प्रक्रियागत खर्चों को मिलाकर लगभग 3 से 5 लाख रुपये का अतिरिक्त फंड अपने पास रखना बेहद जरूरी होता है, ताकि ऐन वक्त पर किसी भी प्रकार की वित्तीय परेशानी का सामना न करना पड़े।
अमेरिका के किसी टॉप स्कूल से एक करोड़ रुपये से अधिक के कुल खर्च को देखकर घबराने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि दुनिया भर के योग्य और मेधावी छात्रों के लिए इन यूनिवर्सिटीज में भारी-भरकम स्कॉलरशिप और फेलोशिप के विकल्प हमेशा खुले रहते हैं। हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड जैसी यूनिवर्सिटीज नीड-ब्लाइंड एडमिशन प्रक्रिया का पालन करती हैं, जिसका मतलब है कि यदि आपका चयन हो जाता है, तो यूनिवर्सिटी आपकी आर्थिक स्थिति को देखकर बिना मांगे ही आपको भारी स्कॉलरशिप या ग्रांट प्रदान करती है। इसके अलावा, भारतीय छात्र स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा या क्रेडिड कर्मा और एजीडब्लू जैसे ग्लोबल लेंडर पोर्टल्स के माध्यम से बिना किसी भारी कोलेटरल या संपत्ति को गिरवी रखे करोड़ों रुपये का एजुकेशन लोन आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। अपनी समर इंटर्नशिप के दौरान मिलने वाला तगड़ा स्टाइपेंड और पढ़ाई के बाद वहां की टॉप कंपनियों में मिलने वाला लाखों डॉलर का सालाना पैकेज इस शुरुआती निवेश को कुछ ही सालों में पूरी तरह वसूल कर देता है, जिससे यह सौदा लंबी अवधि में बेहद फायदेमंद साबित होता है।
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