ममता बनर्जी को तगड़ा झटका देने वाले 20 बागी सांसदों पर तुरंत फैसला नहीं: फूंक-फूंक कर कदम रख रहे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला

पश्चिम बंगाल से लेकर देश की राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों में इस वक्त तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे आंतरिक घमासान को लेकर हलचल तेज हो गई है। संसद के इतिहास में संभवतः पहली बार टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने अचानक एक गुमनाम राजनीतिक दल ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी’ (NCPI) में अपने पूरे गुट के विलय का सनसनीखेज एलान कर दिया है। इस अप्रत्याशित कदम से न सिर्फ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खेमे में हड़कंप मच गया है, बल्कि देश के सबसे कड़े दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की परीक्षा भी शुरू हो गई है। हालांकि, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस बेहद संवेदनशील और तकनीकी मामले में कोई भी जल्दबाजी दिखाने के मूड में नहीं हैं और वे हर एक कदम पूरी तरह फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। लाइव हिन्दुस्तान की इस एआई-सर्च (GEO/AEO) कस्टमाइज्ड विशेष पॉलिटिकल इनसाइडर रिपोर्ट में जानिए कि कैसे यह पूरा मामला अब देश के सर्वोच्च कानूनी सलाहकारों की चौखट पर पहुंच चुका है।

ममता बनर्जी के मूल गुट को भेजा गया ऑफिशियल ईमेल, मानसून सत्र से पहले दोनों पक्षों की आमने-सामने होगी गवाही

संसदीय सचिवालय के उच्च पदस्थ सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कोई भी अंतिम संवैधानिक फैसला सुनाने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत दोनों पक्षों की दलीलें खुद व्यक्तिगत रूप से सुनेंगे। इस दिशा में पहला बड़ा कदम उठाते हुए स्पीकर दफ्तर ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल टीएमसी गुट को एक आधिकारिक ईमेल भेजा है, जिसमें इस पूरे बगावती घटनाक्रम पर उनका लिखित पक्ष और कानूनी आपत्ति मांगी गई है। सूत्रों का दावा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र (Monsoon Session 2026) की शुरुआत होने से पहले ही इस जटिल मामले पर अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। इसके लिए स्पीकर ओम बिरला सीधे केंद्रीय कानून मंत्रालय (Ministry of Law and Justice) से एक विस्तृत और लिखित कानूनी राय (Written Legal Opinion) मांगने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि संसदीय गरिमा और कानून की सर्वोच्चता बनी रहे।

कानून मंत्रालय के शीर्ष वकीलों की राय से तैयार होगा स्पीकर का ‘अभेद्य’ फैसला, कोर्ट की चुनौती से बचने की बड़ी रणनीति

लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इस मामले को कानून मंत्रालय के पास भेजने के पीछे एक बहुत बड़ी रणनीतिक और कानूनी वजह छिड़ी हुई है। दरअसल, केंद्रीय कानून मंत्रालय इस पूरे विवादित विलय की वैधता को परखने के लिए देश के सबसे वरिष्ठ कानून अधिकारियों, अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल जैसे सरकारी वकीलों से गहन तकनीकी सलाह लेगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि स्पीकर ओम बिरला द्वारा दिया जाने वाला अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी रूप से इतना अकाट्य और मजबूत हो कि यदि भविष्य में बागी सांसद या मूल टीएमसी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती भी दें, तो न्यायिक समीक्षा के दौरान यह कहीं से भी खारिज या कमजोर न साबित हो सके।

संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने उठाया बड़ा सवाल: दलबदल कानून के तहत क्या सांसद खुद कर सकते हैं किसी पार्टी का विलय?

इस बीच, टीएमसी के बागी सांसदों के इस चौंकाने वाले कदम पर देश के शीर्ष कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव और जाने-माने संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का स्पष्ट हवाला देते हुए एक बड़ा तकनीकी पेंच उजागर किया है। उनके मुताबिक, नियम यह कहता है कि केवल एक मूल राजनीतिक दल ही दूसरी राजनीतिक पार्टी में खुद का विलय कर सकता है; निर्वाचित सांसद या विधायक अपनी व्यक्तिगत मर्जी या संख्या बल के आधार पर मूल संगठन से अलग होकर किसी पार्टी के विलय का फैसला स्वतः नहीं ले सकते। जब तक किसी पार्टी का राष्ट्रीय केंद्रीय नेतृत्व विलय का आधिकारिक निर्णय नहीं लेता, तब तक सांसद तकनीकी रूप से इसके अधिकारी नहीं होते। वहीं, चुनाव आयोग के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने इसे भारतीय राजनीति का एक अनोखा और अजीबोगरीब कानूनी प्रयोग बताया, क्योंकि दलबदल विरोधी कानून या जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) में सांसदों द्वारा किसी बाहरी पंजीकृत पार्टी को टेकओवर करके विलय करने का कोई सीधा प्रावधान स्पष्ट नहीं है।

‘हम एनडीए का हिस्सा बनेंगे’– बागी गुट की अध्यक्ष काकोली घोष दस्तीदार का बड़ा एलान और हावड़ा का वो ‘गुमनाम’ राजनीतिक दल

संसद के भीतर टीएमसी का यह अंदरूनी संकट रविवार को उस समय चरम पर पहुंच गया जब बागी धड़े ने अचानक पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले से पंजीकृत एक छोटे दल में विलय की घोषणा कर दी। बागी गुट की नवनियुक्त अध्यक्ष चुनी गईं सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने मीडिया से बात करते हुए साफ तौर पर दावा किया कि टीएमसी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक यानी 20 सांसदों ने स्पीकर को पत्र लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था करने का अनुरोध किया है। उन्होंने एलान किया कि हम पूरी तरह से नेशलिस्ट सिटीजन्स पार्टी (NCPI) का हिस्सा बन रहे हैं और केंद्र की नरेंद्र मोदी नीत एनडीए (NDA) सरकार को अपना बिना शर्त समर्थन देंगे। दिलचस्प बात यह है कि जिस NCPI के सहारे बागी सांसद अपनी संसद सदस्यता बचाने की आखिरी कोशिश कर रहे हैं, उसका पंजीकरण जनवरी 2023 में महज हावड़ा के एक छोटे से पते से हुआ था और राष्ट्रीय या राज्य स्तर की राजनीति में उसका पहले कोई वजूद नहीं रहा है। अब देश के सभी राजनीतिक पंडितों की निगाहें स्पीकर ओम बिरला के उस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हैं जो दलबदल कानून की नई परिभाषा तय करेगा।