
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक नया समीकरण तेजी से उभर रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद अब जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर यानी पीके ने बिहार की धरती पर अपनी राजनीतिक ताकत का खुलकर अहसास कराया है। राज्य में लगातार बढ़ रही जनसभाओं और पैठ के बाद राजनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या वाकई पारंपरिक दलों से बिहार की जनता का मोहभंग हो चुका है? प्रशांत किशोर का यह बढ़ता प्रभाव आने वाले विधानसभा चुनावों के गणित को किस तरह प्रभावित करेगा, यह हर किसी के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है।
जंतर-मंतर के बाद बिहार की जमीन पर उतरा जन सुराज का कारवां
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया आयोजनों के बाद प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक रणनीति का रुख पूरी तरह से बिहार की जमीनी वास्तविकताओं पर केंद्रित कर दिया है। पीके लगातार गांवों और कस्बों का दौरा कर रहे हैं, जहां उन्हें आम जनता का भारी समर्थन मिल रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर सिर्फ रैलियां नहीं कर रहे, बल्कि वे लोगों के बीच जाकर एक ऐसा वैकल्पिक राजनीतिक ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं जो सीधे तौर पर जाति और धर्म की पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मूल मुद्दों पर आधारित हो।
क्या पारंपरिक दलों के प्रति जनता के मन में पैदा हो गया है गहरा असंतोष?
बिहार के राजनीतिक इतिहास में पिछले तीन दशकों से मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा दलों और गठबंधनों के इर्द-गिर्द ही सत्ता घूमती रही है। हालांकि, लंबे समय से राज्य के युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं और बुनियादी ढांचे की स्थिति पर भी सवाल उठते रहे हैं। प्रशांत किशोर अपने हर भाषण में इसी नस को टटोल रहे हैं। वे जनता को यह समझाने में काफी हद तक सफल होते दिख रहे हैं कि जब तक वोट जाति के नाम पर दिए जाएंगे, तब तक बच्चों का भविष्य नहीं सुधरेगा। जनता की यह बदलती सोच और सभाओं में उमड़ती भीड़ इस बात का संकेत दे रही है कि पारंपरिक राजनीति के प्रति मतदाताओं की झुंझलाहट अब मुखर होने लगी है।
प्रशांत किशोर का ‘बिहार मॉडल’ और आगामी चुनावों की असल चुनौती
जन सुराज अभियान के तहत प्रशांत किशोर राज्य के हर जिले और हर वर्ग तक अपनी पहुंच बनाने में जुटे हैं। उनका यह दावा है कि इस बार का चुनाव किसी एक नेता या दल को हराने के लिए नहीं, बल्कि बिहार के युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए होगा। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि जमीन पर संगठन को मजबूत करना और बूथ स्तर पर अपनी पकड़ बनाना एक बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद, जिस तरह से पीके ने अपनी रैलियों के जरिए सियासी पारा चढ़ाया है, उससे सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों की नींद उड़ना लाजमी है। अब देखना यह होगा कि यह जन-समर्थन चुनावी मतों में कितना तब्दील हो पाता है।
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