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बिहार एमएलसी चुनाव से पहले एनडीए में अनंत सिंह-नीरज प्रकरण और महागठबंधन से मची खलबली

बिहार के राजनीतिक गलियारों में विधान परिषद (MLC Election) यानी एमएलसी चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। आगामी चुनावों को लेकर सत्ताधारी एनडीए (NDA) और मुख्य विपक्षी महागठबंधन (Mahagathbandhan) दोनों ही खेमों में हलचल तेज हो गई है, लेकिन इन सबके बीच दोनों ही गठबंधनों के भीतर जिस प्रकार की आंतरिक कलह, अंतर्कलह और विवाद सामने आ रहे हैं, उसने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया है। एक तरफ एनडीए खेमे में अनंत सिंह और नीरज कुमार से जुड़े हालिया राजनीतिक प्रकरणों और बयानों ने शीर्ष नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, तो दूसरी तरफ महागठबंधन के भीतर भी सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर जबर्दस्त किचकिच और खींचतान मची हुई है। इन दोनों पारंपरिक गठबंधनों के आपसी घमासान और उठापटक के बीच अब सियासी बाजार में यह चर्चा सबसे गर्म हो गई है कि क्या इस राजनीतिक शून्यता और आपसी कलह का सबसे बड़ा फायदा रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor – PK) की पार्टी ‘जन सुराज’ (Jan Suraaj) उठा ले जाएगी? इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से हम विस्तार से जानेंगे कि बिहार के इस हाई-प्रोफाइल एमएलसी चुनाव में किस तरह के समीकरण बन रहे हैं और कौन किस पर भारी पड़ रहा है।

एनडीए खेमे में अनंत सिंह और नीरज प्रकरण से क्यों बढ़ी है बेचैनी?

बिहार की राजनीति में बाहुबलियों और रसूखदार नेताओं का दखल हमेशा से चर्चा का विषय रहा है, और जब बात मोकामा या आसपास के क्षेत्रों की हो तो अनंत सिंह (Anant Singh) का नाम सबसे ऊपर आता है। हाल ही में जेल से बाहर आने और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता को लेकर सत्ताधारी दल के भीतर और बाहर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेता और विधान पार्षद नीरज कुमार (Neeraj Kumar) के तीखे बयानों और राजनीतिक पैतरों ने एनडीए के भीतर समीकरणों को और अधिक उलझा दिया है। इन दोनों नेताओं के बयानों और उनके इर्द-गिर्द घूमती राजनीति के कारण एनडीए के भीतर आंतरिक असहजता साफ तौर पर महसूस की जा रही है। गठबंधन के घटक दल यह आंकलन करने में जुटे हैं कि इस तरह के विवादास्पद प्रकरणों का आगामी एमएलसी चुनावों में उनके वोट बैंक पर कितना नकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि विधान परिषद जैसे प्रतिष्ठित सदन में साफ-सुथरी छवि और बौद्धिक वर्ग के वोट बहुत मायने रखते हैं।

महागठबंधन में टिकट और वर्चस्व की जंग: अंदरखाने मची है भारी किचकिच

सिर्फ एनडीए का हाल बेहाल नहीं है, बल्कि विपक्षी महागठबंधन यानी राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और वामदलों के खेमे में भी टिकट बंटवारे और आपसी वर्चस्व को लेकर भयंकर घमासान मचा हुआ है। एमएलसी चुनाव के लिए जब उम्मीदवारों के नामों पर मंथन शुरू हुआ, तो हर पार्टी का एक ही स्थानीय क्षत्रप अपने करीबी या परिवार के सदस्य को टिकट दिलाने के लिए अड़ गया। महागठबंधन के भीतर इस बात को लेकर भी खींचतान चल रही है कि किस दल का पारंपरिक वोट बैंक किस वार्ड या क्षेत्र में ज्यादा मजबूत है। जब तक विपक्षी गठबंधन आपसी फूट और अंतर्कलह को सुलझाने में व्यस्त रहेगा, तब तक वे सत्ताधारी दल के खिलाफ एक प्रभावी और संयुक्त रणनीति जमीन पर उतारने में नाकाम साबित होंगे। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि विपक्षी खेमे की यह कमजोरी चुनाव के वक्त उनके लिए बहुत भारी पड़ सकती है।

क्या प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ इस सियासी घमासान का पूरा फायदा उठा ले जाएगी?

जब दो दिग्गज और पारंपरिक राजनीतिक गठबंधन आपस में उलझे होते हैं, तो हमेशा से यह इतिहास रहा है कि तीसरे विकल्प या नए राजनीतिक मोर्चे के लिए अपनी जमीन मजबूत करने का सबसे सुनहरा मौका मिल जाता है। प्रशांत किशोर इन दिनों अपनी ‘जन सुराज’ पदयात्रा और अभियान के जरिए बिहार के कोने-कोने में जन-समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं। वे लगातार पारंपरिक राजनीति, जातिगत समीकरणों और बाहुबल की संस्कृति पर तीखा प्रहार कर रहे हैं। बिहार की जनता, खासकर युवा और प्रबुद्ध वर्ग, अब जाति और बाहुबल के नाम पर वोट देने से ऊब चुका है। ऐसे में यदि एनडीए और महागठबंधन अपने आंतरिक विवादों और अनंत सिंह-नीरज जैसे प्रकरणों से ही नहीं उबर पाएंगे, तो प्रशांत किशोर की पार्टी इस वैचारिक और राजनीतिक शून्यता का पूरा फायदा उठाकर विधान परिषद के मंच तक अपनी धमक दर्ज कराने में सफल हो सकती है।

आगामी चुनावों का ऊँट किस करवट बैठेगा? बिहार की जनता की टकटकी

बिहार विधान परिषद के ये आगामी चुनाव केवल कुछ सीटों या सदस्यों के चयन भर का मामला नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले विधानसभा चुनावों का एक प्रकार से सेमीफ़ाइनल साबित होने वाले हैं। सूबे की जनता बहुत गौर से यह देख रही है कि कौन सा दल या गठबंधन सचमुच जनता के विकास, शिक्षा, रोजगार और पारदर्शी शासन की बात कर रहा है और कौन सिर्फ अपने पुराने जातिगत और बाहुबल के समीकरणों को साधने में लगा हुआ है। आने वाले कुछ हफ्तों में जब नामांकन और प्रचार का दौर परवान चढ़ेगा, तब यह साफ हो जाएगा कि क्या पारंपरिक दल अपनी गलतियों से सीखते हैं या फिर कोई नया राजनीतिक उलटफेर बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिख देता है।