
देश की राजनीति में इन दिनों युवा पीढ़ी और बच्चों यानी ‘जेन-अल्फा’ का रुख और उनके तेवर चर्चा का विषय बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में स्कूलों और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली को लेकर बच्चों और छात्रों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। मायावती ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि बच्चों और छात्रों के इस तरह के विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रशासन या सरकारों द्वारा किसी भी प्रकार के बल का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताते हुए अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर छह प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से अपनी बात रखी है, जो वर्तमान राजनीतिक गलियारों में बड़ा मुद्दा बन गया है।
जेन-अल्फा के सड़कों पर उतरने की जमीनी हकीकत
आज के दौर में जब डिजिटल और आधुनिक युग तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब देश के सरकारी स्कूलों की बुनियादी दशा बेहद दयनीय बनी हुई है। उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में सरकारी विद्यालयों की जर्जर इमारतों, पानी, बिजली और पढ़ाई की मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण अबोध बच्चों को भी आवाज उठानी पड़ रही है। मायावती ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया है कि जिन उम्र के बच्चों के हाथों में किताबें और खेलकूद का सामान होना चाहिए, वे अपनी बुनियादी शिक्षा के अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष करने को मजबूर हैं। यह स्थिति समाज और शासन व्यवस्था दोनों के लिए एक बड़ा आत्ममंथन करने का विषय है।
मायावती द्वारा उठाए गए 6 प्रमुख बिंदु और चिंताएं
बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पूरे प्रकरण को लेकर अपनी जो छह मुख्य बातें रखी हैं, वे देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक नीतियों पर सवालिया निशान लगाती हैं:
-
प्राथमिक शिक्षा की बदहाली: मायावती ने पहली चिंता जताते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी के कारण छात्रों का सब्र टूट रहा है और वे अति-मुखर होकर सड़कों पर उतरने को विवश हैं।
-
बच्चों के संघर्ष पर अफसोस: उन्होंने कहा कि यह बेहद दुखद है कि हंसने-खेलने और पढ़ने की उम्र वाले बच्चों को अपनी सामान्य जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
-
सरकारों की उदासीनता: बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि सरकारों ने शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के बजाय हमेशा इसकी अनदेखी की है और सरकारी स्कूलों को बंद करने या उन्हें निष्क्रिय करने का कुचक्र चलाया जा रहा है।
-
बल प्रयोग से बचने की चेतावनी: उन्होंने सरकारों और प्रशासन को कड़ी नसीहत देते हुए कहा कि यदि युवा पीढ़ी या छात्र अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो उन पर किसी भी प्रकार के बल का प्रयोग करने से बचा जाना चाहिए, क्योंकि यह उचित नहीं है।
-
राजनीतिक दलों से दूरी की सलाह: मायावती ने पहले भी स्पष्ट किया है कि छात्र और युवा वर्ग किसी भी राजनीतिक दल के हाथों की कठपुतली न बनें और अपने आंदोलन को राजनीतिक पार्टियों द्वारा हाईजैक होने से बचाएं।
-
भविष्य की सुरक्षा की मांग: उन्होंने जोर देकर कहा कि जेन-अल्फा यानी आधुनिक तकनीक के दौर में पल रहे बच्चों और उनके अभिभावकों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए मजबूत और पारदर्शी शैक्षिक नीतियां बनानी होंगी।
राजनीतिक दलों की भूमिका और छात्रों को नसीहत
इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों की सक्रियता भी लगातार बढ़ती जा रही है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष इस आयु वर्ग के युवाओं और छात्रों के बीच अपनी जमीन तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं मायावती ने स्पष्ट किया है कि छात्र किसी के राजनीतिक फायदे का मोहरा न बनें। उन्होंने युवाओं को यह सलाह दी है कि वे अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल अपने उज्ज्वल भविष्य और बौद्धिक विकास के लिए करें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते सरकारों ने इन बुनियादी मुद्दों का समाधान नहीं किया, तो यह असंतोष आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है, जिससे प्रशासनिक तंत्र की मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं।
girls globe