प्लेटलेट्स बढ़ाने में पपीते के पत्ते का ‘जादुई’ असर या सिर्फ भ्रम? टाटा मेमोरियल के रिसर्च पेपर ने छेड़ी नई बहस

डेंगू और वायरल फीवर के दौरान गिरते प्लेटलेट्स को लेकर पपीते के पत्तों के अर्क (Papaya Leaf Extract) का इस्तेमाल भारत में एक घरेलू नुस्खे की तरह आम हो चुका है। हाल ही में टाटा मेमोरियल सेंटर (TMC) की एक रिसर्च रिपोर्ट ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। शोध में पपीते के पत्तों के अर्क के असर पर कुछ चौंकाने वाले दावे किए गए हैं, जिसके बाद से चिकित्सा जगत में पक्ष और विपक्ष में लंबी बहस छिड़ गई है। एक ओर जहां लोग इसे प्राकृतिक रामबाण मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक और डॉक्टर इसके इस्तेमाल पर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।

टाटा मेमोरियल का रिसर्च पेपर और दावे

टाटा मेमोरियल के शोध में इस बात की पड़ताल की गई कि क्या पपीते के पत्तों का अर्क वास्तव में प्लेटलेट्स काउंट को बढ़ाने में सहायक है। रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि इसके अर्क में मौजूद फाइटोकेमिकल्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुधारने और रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने डेंगू के मरीजों पर इसके प्रभावों का विश्लेषण किया, जिसके आधार पर इस अर्क को पारंपरिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, शोध में यह भी साफ किया गया है कि यह किसी भी स्थिति में गंभीर मेडिकल उपचार का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता।

एक्सपर्ट्स के बीच क्यों उठ रहे हैं सवाल?

इस रिसर्च के सार्वजनिक होते ही मेडिकल विशेषज्ञों के बीच सवाल उठने लगे हैं। प्रमुख अस्पतालों के डॉक्टरों का कहना है कि पपीते के पत्तों के अर्क को लेकर अभी तक कोई भी बड़ा ‘क्लिनिकल ट्रायल’ नहीं हुआ है जो इसे सौ फीसदी सुरक्षित साबित कर सके। सवाल यह भी है कि अर्क की सही खुराक (Dosage) क्या होनी चाहिए, क्योंकि अनियंत्रित मात्रा में इसका सेवन पेट में जलन या एलर्जी पैदा कर सकता है। आलोचकों का मानना है कि वैज्ञानिक तथ्यों की कमी के कारण मरीज अक्सर मुख्य चिकित्सा (जैसे अस्पताल में भर्ती होना या ब्लड ट्रांसफ्यूजन) में देरी कर बैठते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकता है।

मरीजों के लिए क्या है सही सलाह?

अगर आप भी प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए घरेलू उपचार का सहारा ले रहे हैं, तो सबसे पहले अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें। पपीते के पत्तों का अर्क एक सहायक (Supportive) थेरेपी हो सकता है, लेकिन इसे दवा का एकमात्र विकल्प समझना भूल होगी। खासकर जब प्लेटलेट्स का स्तर 50,000 से नीचे गिर जाए, तो बिना देरी किए चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है। टाटा मेमोरियल की यह रिसर्च केवल एक शुरुआती संकेत है, न कि कोई अंतिम मेडिकल प्रोटोकॉल। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें और किसी भी इंटरनेट के दावे पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय विशेषज्ञों के सुझावों को ही प्राथमिकता दें।