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पश्चिम एशिया युद्ध को लेकर ब्रिक्स शेरपाओं की उच्चस्तरीय बैठक, दिल्ली घोषणापत्र के अहम मुद्दों पर गहन चर्चा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर एक बार फिर से दुनिया की निगाहें ब्रिक्स (BRICS) देशों की बैठकों पर टिक गई हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया में सुलग रही युद्ध की भीषण आग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इसी सुलगते भू-राजनीतिक माहौल के बीच ब्रिक्स देशों के शेरपाओं की एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया है, जिसमें विशेष रूप से पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात और आगामी दिल्ली घोषणापत्र के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जा रही है। दुनिया के तमाम प्रमुख उभरते हुए आर्थिक महाशक्तियों के प्रतिनिधि एक मंच पर बैठकर इस बात का मंथन कर रहे हैं कि कैसे इस क्षेत्रीय संघर्ष के प्रभावों को ग्लोबल लेवल पर नियंत्रित किया जाए और शांति बहाली के लिए एक साझा कूटनीतिक रुख अपनाया जाए। हालांकि, इस बैठक के एजेंडे में सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा पिछली बार की तरह ही इस बार भी खाड़ी देशों के आपसी मतभेद बने हुए हैं, क्योंकि पिछले सम्मेलन के दौरान ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच तीखी तनातनी देखने को मिली थी, जिसने इस बहुपक्षीय मंच की एकता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

ब्रिक्स शेरपाओं की इस आपात बैठक का मुख्य उद्देश्य और वैश्विक कूटनीति में इसका महत्व

जब दुनिया के विभिन्न हिस्से युद्ध, आर्थिक मंदी और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं से जूझ रहे हैं, तब ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली संगठन की भूमिका और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है। ब्रिक्स शेरपाओं की इस बैठक का प्राथमिक उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आपसी तालमेल को मजबूत करना और पश्चिम एशिया में जारी खूनी संघर्ष के बीच एक संतुलित तथा शांतिपूर्ण दृष्टिकोण तैयार करना है। दिल्ली घोषणापत्र के प्रारूप को अंतिम रूप देने से पहले सभी देशों के प्रतिनिधि हर एक बिंदु पर बारीकी से विचार कर रहे हैं ताकि किसी भी ऐसे संवेदनशील विषय पर आम सहमति बनाई जा सके जिससे किसी एक देश की संप्रभुता या कूटनीतिक संबंधों को ठेस न पहुंचे। भारत की मेजबानी और नेतृत्व में आयोजित होने वाली इस बैठक में यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की जा रही है कि ग्लोबल साउथ की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और अधिक मजबूती के साथ उठाया जाए, विशेषकर तब जब पश्चिमी देश अपने हितों के अनुसार नीतियों को आकार दे रहे हैं।

पिछली बार ईरान और यूएई के बीच हुए विवाद की कड़वी यादें और इस बार की चुनौतियां

ब्रिक्स समूह का विस्तार होने के बाद से इसमें शामिल नए और पुराने सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक समीकरण काफी जटिल हो चुके हैं, जिसकी एक बानगी हमें पिछली बैठकों में देखने को मिली थी। मध्य पूर्व के दो प्रमुख देश, ईरान और यूएई, जिनके बीच ऐतिहासिक और राजनीतिक स्तर पर गहरे मतभेद रहे हैं, वे जब एक ही मंच पर आते हैं तो क्षेत्रीय तनावों की आंच बैठकों के अंदर तक महसूस की जाने लगती है। पिछली बार जब खाड़ी के इन दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने आए थे, तो क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर तीखी बहस छिड़ गई थी, जिसके कारण साझा बयानों और घोषणापत्रों को तैयार करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भी ईरान और यूएई के बीच के उन पुराने तनावों के उभरने का पूरा अ अंदेशा बना हुआ है, और ब्रिक्स शेरपाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे कूटनीतिक कौशल का परिचय देते हुए इन दोनों देशों को एक मंच पर साधकर रखें ताकि संगठन की एकता अक्षुण्ण बनी रहे।

दिल्ली घोषणापत्र और पश्चिम एशिया संकट पर भारत की संतुलित कूटनीति की भूमिका

भारत ने हमेशा से वसुधैव कुटुंबकम और शांति के सिद्धांतों पर चलते हुए सभी देशों के साथ अपने मधुर कूटनीतिक संबंधों को बनाए रखा है, और ब्रिक्स के इस मंच पर भी भारत की यही कोशिश है कि किसी भी तरह के ध्रुवीकरण से बचा जाए। पश्चिम एशिया में फंसे लाखों भारतीयों और वहां की अर्थव्यवस्था पर निर्भरता के चलते भारत के लिए यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए दिल्ली घोषणापत्र में शांति, क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान निकालने पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। ब्रिक्स के अन्य सदस्य देश जैसे रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी इस बात पर सहमत नजर आ रहे हैं कि दुनिया को एक और बड़े आर्थिक संकट से बचाने के लिए पश्चिम एशिया में तुरंत युद्धविराम होना चाहिए। भारत का यह कूटनीतिक प्रयास रंग लाता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शेरपा स्तर की इस बैठक में सभी देश अपने क्षेत्रीय अहंकारों को छोड़कर वैश्विक कल्याण के एजेंडे पर कितनी जल्दी और कितनी सहजता से राजी होते हैं।

भविष्य के भू-राजनीतिक समीकरण और ब्रिक्स समूह की बढ़ती हुई वैश्विक जवाबदेही

आने वाले समय में ब्रिक्स केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि यह दुनिया की नई राजनीतिक व्यवस्था को दिशा देने वाला एक प्रमुख मंच बनकर उभर रहा है। पश्चिम एशिया के युद्ध जैसे गंभीर मामलों पर ब्रिक्स देशों का एक सुर में बोलना या बंटा हुआ नजर आना यह तय करेगा कि वैश्विक स्तर पर इस संगठन का कितना वजन माना जाएगा। ईरान-यूएई के आपसी तनाव को सुलझाते हुए एक ठोस और सर्वमान्य दिल्ली घोषणापत्र तैयार करना इस बैठक की सबसे बड़ी सफलता होगी, जो दुनिया को यह संदेश देगी कि बहुध्रुवीय विश्व में आपसी संवाद से हर बड़े संकट का समाधान निकाला जा सकता है। कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि यदि ब्रिक्स इस परीक्षा में सफल हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसका कद और भी ज्यादा बुलंद हो जाएगा, जिससे दुनिया के तमाम विकासशील देशों को एक नई उम्मीद की किरण दिखाई देगी।