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जिसे समझते रहे आम बिल्ली, वह निकली ‘मायावी’: DNA ने खोला 14 लाख साल पुराना राज, नतीजे जान वैज्ञानिक भी दंग

प्रकृति के गर्भ में आज भी ऐसे अनसुलझे रहस्य छिपे हैं जो आधुनिक विज्ञान की उन्नत तकनीकों को भी चकित कर देते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और हैरतअंगेज मामला भूमध्य सागर में स्थित फ्रांस के सुरम्य कोर्सिका द्वीप (Corsica Island) से सामने आया है। सदियों से स्थानीय गड़ेरिये और ग्रामीण जिस जीव को एक सामान्य आवारा बिल्ली या लोमड़ी जैसी शक्ल वाला जीव समझकर नजरअंदाज कर रहे थे, आधुनिक आनुवंशिक विश्लेषण (DNA Sequencing) ने उसके बारे में ऐसा खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया के जीव वैज्ञानिकों को हक्का-बक्का कर दिया है।

स्थानीय लोककथाओं में ‘घियात्तु वोल्पे’ (Ghjattu Volpe) यानी ‘कैट-फॉक्स’ (Cat-Fox) के नाम से मशहूर यह रहस्यमयी बिल्ली वास्तव में घरेलू या आम यूरोपीय जंगली बिल्ली नहीं, बल्कि प्रागैतिहासिक काल से अपनी शुद्ध आनुवंशिक पहचान बचाए रखने वाली एक बिल्कुल अनूठी और अलग प्रजाति सिद्ध हुई है। इसके डीएनए के तार लगभग 14 लाख साल पुराने विकासवादी इतिहास से जुड़े पाए गए हैं।

कोर्सिका के घने जंगलों और दुर्गम चट्टानी घाटियों में बकरियां चराने वाले स्थानीय चरवाहे पीढ़ियों से एक ऐसे शिकारी जानवर की कहानियां सुनाते आ रहे थे, जो रात के अंधेरे में भेड़ों और बकरियों के बाड़ों पर हमला करता था। इसकी पूंछ घनी और छल्लेदार थी, शरीर सामान्य बिल्लियों से काफी लंबा था और इसके नुकीले दांत लोमड़ी जैसे दिखते थे। दशकों तक मुख्यधारा के प्राणीशास्त्री इन दावों को सिर्फ चरवाहों की मनगढ़ंत कहानियां और मिथक मानकर खारिज करते रहे।

यह स्थिति तब बदली जब 2008 में एक मुर्गी के बाड़े में यह अजीबोगरीब बिल्ली अप्रत्याशित रूप से फंसी हुई पाई गई। इसके बाद फ्रांस के जैव विविधता कार्यालय (OFB – Office Français de la Biodiversité) के वैज्ञानिकों ने इस मायावी जीव को औपचारिक रूप से ट्रैक करने के लिए एक विशेष मिशन शुरू किया। वैज्ञानिकों ने जंगलों में नॉन-इनवेसिव ट्रैप लगाए, जिनमें खुशबूदार आकर्षण और ऐसे ब्रश लगाए गए थे जिनसे गुजरते समय बिल्ली के बाल उनमें उलझ जाएं। इन बालों से मिले नमूनों ने शोधकर्ताओं को पहली बार इसके उच्च-गुणवत्ता वाले डीएनए तक सीधी पहुंच प्रदान की।

जब पेरिस और ल्योन की शीर्ष आनुवंशिक प्रयोगशालाओं में इस ‘कैट-फॉक्स’ के डीएनए प्रोफाइल का मिलान ज्ञात घरेलू बिल्लियों (Felis catus), यूरोपीय जंगली बिल्लियों (Felis silvestris silvestris) और अफ्रीकी जंगली बिल्लियों (Felis lybica) से कराया गया, तो नतीजे देखकर शोधकर्ता दंग रह गए।

आनुवंशिक डेटा ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि यह बिल्ली यूरोपीय मुख्य भूमि पर पाई जाने वाली आम जंगली बिल्लियों से पूरी तरह भिन्न है। इसका माइटोकॉन्ड्रियल और न्यूक्लियर जीनोम एक ऐसी अलग आनुवंशिक वंशावली (Lineage) प्रदर्शित करता है जो लगभग 10 से 14 लाख वर्ष पहले मुख्य बिल्ली कुल से अलग होकर भूमध्यसागरीय बेसिन के किसी अज्ञात हिस्से में विकसित हुई थी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह प्रजाति प्रागैतिहासिक काल में मध्य पूर्व या उत्तरी अफ्रीका के तटीय इलाकों से किसी प्राकृतिक माध्यम या शुरुआती मानव प्रवास के जरिए इस द्वीप तक पहुंची होगी और लाखों वर्षों तक द्वीप के अलग-थलग वातावरण (Island Isolation) में बिना किसी मिलावट के सुरक्षित रही।

बाहरी रूप से देखने पर पहली नजर में भले ही यह किसी बड़ी भूरी-धारीदार बिल्ली जैसी लगे, लेकिन इसकी शारीरिक संरचना इसे सामान्य बिल्लियों से बिल्कुल अलग श्रेणी में खड़ा करती है:

  • विशाल आकार और लंबाई: सिर से पूंछ के सिरे तक इसकी लंबाई लगभग 90 सेंटीमीटर (करीब 3 फीट) तक होती है, जो सामान्य घरेलू बिल्ली से काफी ज्यादा है।

  • लोमड़ी जैसी अनूठी पूंछ: इसकी पूंछ बहुत घनी होती है, जिस पर काले रंग के स्पष्ट छल्ले बने होते हैं और पूंछ का सिरा पूरी तरह गहरे काले रंग का होता है।

  • विशेष कान और मूंछें: इसके कान सामान्य से अधिक चौड़े और नीचे की ओर झुके होते हैं, जबकि इसकी मूंछें छोटी और अधिक संवेदनशील होती हैं जो घने जंगलों में शिकार को भांपने में मदद करती हैं।

  • रंग और रेशमी बनावट: इसके पेट का निचला हिस्सा हल्के लाल-गेरुए रंग का होता है और इसके पैरों के तलवे पूरी तरह काले होते हैं, जो इसे चट्टानी रास्तों पर चुपके से चलने की अद्भुत क्षमता देते हैं।

  • श्वान-दंत (Canine Teeth): इसके कैनाइन दांत अत्यधिक विकसित और नुकीले होते हैं, जो शिकार को एक ही वार में दबोचने के लिए लोमड़ी के जबड़ों जैसा असर दिखाते हैं।

कोर्सिका की इस खोज का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत जैसे विशाल जैव-विविधता वाले देश के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण सबक लेकर आया है। भारत के पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर के वर्षावन और उत्तराखंड, हिमाचल तथा लद्दाख के ऊंचे हिमालयी इलाकों में कई ऐसी रहस्यमयी और शर्मीली बिल्ली प्रजातियां पाई जाती हैं—जैसे ‘रस्टी-स्पॉटेड कैट’ (दुनिया की सबसे छोटी बिल्ली), ‘फिशिंग कैट’, ‘क्लाउडेड लेपर्ड’ और ‘पलास कैट’ (Pallas’s cat)।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII, देहरादून) के वैज्ञानिक भी लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों (पीलीभीत, दुधवा) और हिमालयी तलहटियों में पाई जाने वाली कई स्थानीय जंगली बिल्लियों का आनुवंशिक मानचित्रण (Genetic Mapping) अभी भी अधूरा है। जिस तरह आधुनिक जीनोमिक्स ने कोर्सिका की लोककथाओं वाली बिल्ली को 14 लाख साल पुराना अनूठा प्राणी सिद्ध कर दिया, उसी तरह भारत के सघन जंगलों में भी कई ऐसे दुर्लभ जीव मौजूद हो सकते हैं जिन्हें हम सामान्य आवारा जीव समझकर अनदेखा कर रहे हैं, जबकि वे किसी विलुप्त होती प्राचीन प्रजाति के आखिरी जीवित प्रतिनिधि हो सकते हैं।

कोर्सिका की यह बिल्ली अब केवल कौतूहल का विषय नहीं है, बल्कि इसके अस्तित्व को बचाना अंतरराष्ट्रीय संरक्षणवादियों के लिए एक बड़ा मिशन बन चुका है। फ्रांसीसी शोधकर्ताओं ने इसके आधिकारिक वैज्ञानिक नामकरण और इसे आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में एक विशेष संरक्षित प्रजाति के रूप में शामिल करने की सिफारिश की है।

इस प्रजाति के सामने सबसे बड़ा खतरा इसके आवास का विनाश और घरेलू बिल्लियों के साथ होने वाला संभावित संकरण (Hybridization) है। यदि यह जंगली प्रजाति सामान्य पालतू या लावारिस बिल्लियों के संपर्क में आकर प्रजनन करती है, तो इसका 14 लाख साल पुराना शुद्ध जीन पूल हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा। यही कारण है कि स्थानीय प्रशासन ने इन बिल्ली-लोमड़ियों के पर्यावास वाले वन क्षेत्रों को संरक्षित जैविक गलियारा घोषित करने और उनके मूवमेंट पर जीपीएस कॉलर के जरिए 24 घंटे नजर रखने की योजना बनाई है।