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एक मैच और… फिर सोऊंगा! Gen Z में गेमिंग का जानलेवा जुनून

आज की युवा पीढ़ी यानी जेन जी (Gen Z) के जीवन में डिजिटल क्रांति ने मनोरंजन के मायनों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। देर रात तक स्मार्टफोन, लैपटॉप या गेमिंग कंसोल की जगमगाती स्क्रीन के सामने आंखें गड़ाए बैठे युवाओं का सिर्फ एक ही डायलॉग सुनने को मिलता है— “बस एक मैच और… फिर पक्का सोऊंगा!” लेकिन यह ‘एक मैच’ कब पूरी रात को लील जाता है और कब यह एक बेकाबू लत का रूप धारण कर लेता है, इसका अंदाजा खुद गेमर्स को भी नहीं हो पाता। ऑनलाइन गेमिंग का यह जुनून युवाओं की सेहत, मानसिक संतुलन, पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस बढ़ते खतरे पर गंभीर चिंता जताते हुए युवाओं व अभिभावकों को आगाह किया है कि गेमिंग का यह बेलगाम शौक अब एक गंभीर मानसिक विकार की श्रेणी में आ चुका है।

गेमिंग अब केवल टाइमपास या मनोरंजन का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह आज के युवाओं के लिए एक वर्चुअल दुनिया बन चुका है जहां वे अपनी वास्तविक जिंदगी के तनाव से दूर भागने की कोशिश करते हैं। PUBG, BGMI, Call of Duty, Free Fire और Valorant जैसे मल्टीप्लेयर बैटल रॉयल गेम्स युवाओं को अपनी ओर खींचते हैं। इन गेम्स की संरचना इस तरह से डिजाइन की जाती है कि हर लेवल के बाद खिलाड़ी को डोपामाइन (Dopamine) का अहसास होता है, जो उन्हें बार-बार खेलने के लिए उकसाता है। हारने पर ‘जीतने की जिद्द’ और जीतने पर ‘रैंक बढ़ाने का लालच’ युवाओं को स्क्रीन से बांधकर रखता है। इसके चक्कर में नींद पूरी न होना, खान-पान में लापरवाही और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं आम बात बन चुकी हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अंतर्राष्ट्रीय बीमारी वर्गीकरण (ICD-11) में ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ (Gaming Disorder) को आधिकारिक तौर पर एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में शामिल किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह कैसे पहचानें कि गेमिंग कब एक सामान्य शौक से बढ़कर बीमारी बन चुकी है? मनोचिकित्सकों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपनी दैनिक जिम्मेदारियों, पढ़ाई, नौकरी और पारिवारिक संबंधों को दरकिनार करके केवल गेमिंग को प्राथमिकता देने लगे, तो यह एक बड़ा रेड फ्लैग (Red Flag) है। जब गेम न खेलने पर बेचैनी, गुस्सा, एंग्जायटी या आक्रामकता महसूस होने लगे, या फिर नींद न आने की समस्या (Insomnia) और डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि गेमिंग अब बीमारी का रूप ले चुकी है।

लगातार कई घंटों तक एक ही जगह बैठकर गेम खेलने का असर केवल दिमाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर को अंदर से खोखला कर देता है। देर रात तक स्क्रीन देखने से निकलने वाली ब्लू लाइट हमारे स्लीप हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ के स्राव को रोक देती है, जिससे अनिद्रा की शिकायत हो जाती है। इसके अलावा, गलत पॉश्चर में बैठने से रीढ़ की हड्डी और गर्दन में दर्द (Text Neck Syndrome), आंखों में सूखापन व कमजोर रोशनी, और वजन बढ़ने (Obesity) जैसी शारीरिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार स्क्रीन से जुड़े रहने के कारण युवाओं का सामाजिक दायरा सिमट रहा है और वे अकेलापन (Isolation) व अवसाद का शिकार हो रहे हैं।

यदि आप या आपके घर का कोई सदस्य इस स्थिति से गुजर रहा है, तो समय रहते सही कदम उठाना बेहद जरूरी है। इसके लिए सबसे पहले ‘डिजिटल डिटॉक्स’ (Digital Detox) की रणनीति अपनानी होगी। दिनभर में गेमिंग का एक निश्चित समय तय करें और सोने से कम से कम 2 घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दें। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों पर बेवजह चिल्लाने या डांटने के बजाय उनसे दोस्ताना बातचीत करें और उनकी मानसिक स्थिति को समझें। बच्चों को मैदानी खेलों, आउटडोर एक्टिविटीज, योग और पेंटिंग या म्यूजिक जैसे अन्य रचनात्मक शौकों से जोड़ना एक कारगर उपाय साबित हो सकता है। अगर स्थिति हाथ से निकलती दिखे, तो बिना देर किए किसी प्रोफेशनल काउंसलर या मनोचिकित्सक की मदद जरूर लें।