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अमेरिका में कुछ खास दवाएं होंगी टैरिफ फ्री, ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ भारत को मिलेगी बड़ी राहत; जानिए किन दवाओं पर होगा असर

वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद और आयात शुल्कों को लेकर जारी उथल-पुथल के बीच भारतीय दवा उद्योग के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के बाजार से एक बेहद राहत भरी और सकारात्मक खबर सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनी घरेलू स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और दवाओं की किल्लत को नियंत्रित करने के उद्देश्य से कुछ खास जरूरी और जीवनरक्षक दवाओं (Essential and Life-Saving Drugs) को आयात शुल्क यानी टैरिफ से पूरी तरह मुक्त (Tariff-Free) करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। इस रणनीतिक फैसले का सीधा और सबसे बड़ा लाभार्थी ‘विश्व की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) के रूप में विख्यात भारत बनने जा रहा है।

भारतीय फार्मास्यूटिकल सेक्टर लंबे समय से अमेरिकी बाजार में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता रहा है। अमेरिका में बेची जाने वाली हर तीन में से एक जेनेरिक दवा भारतीय कंपनियों के संयंत्रों में तैयार की जाती है। ऐसे में दवाओं की कुछ विशिष्ट श्रेणियों पर आयात शुल्क हटने या शून्य किए जाने से भारतीय फार्मा कंपनियों के लाभ मार्जिन (Profit Margins) में सीधा सुधार होगा और अमेरिका में उनके उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक ताकत और अधिक मजबूत होगी। यह फैसला न केवल भारत के फार्मा निर्यात को नई गति देगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की केंद्रीय भूमिका पर भी एक बार फिर मुहर लगाएगा।

अमेरिकी स्वास्थ्य विनियामकों और व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, इस टैरिफ छूट का प्राथमिक दायरा उन दवाओं तक सीमित रखा जा रहा है जिनकी अमेरिकी घरेलू बाजार में गंभीर कमी (Drug Shortages) देखी जा रही है या जिनकी कीमतें वहां के आम नागरिकों की जेब पर अत्यधिक भारी पड़ रही हैं। इसमें कैंसर के उपचार में काम आने वाली ऑन्कोलॉजी दवाएं, हृदय रोग (Cardiovascular) की जरूरी दवाएं, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स व एंटी-इफेक्टिव फॉर्मूलेशन शामिल हैं।

इसके अलावा, कुछ विशिष्ट जटिल जेनेरिक फॉर्मूलेशन और रेयर डिजीज (दुर्लभ बीमारियों) में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को भी इस टैरिफ-मुक्त व्यवस्था के तहत प्राथमिकता दी जा रही है। अमेरिकी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा तंत्र पर दवाओं की आसमान छूती कीमतों के चलते भारी दबाव था। स्थानीय स्तर पर इन दवाओं का उत्पादन तुरंत बढ़ाना संभव नहीं था, जिसके चलते अमेरिकी प्रशासन ने आयात निर्भरता को स्वीकार करते हुए शुल्क हटाने का व्यावहारिक रास्ता चुना है। भारत की सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, सिप्ला, ल्यूपिन, अरबिंदो फार्मा और जाइडस लाइफसाइंसेज जैसी शीर्ष दवा निर्माता कंपनियों के पास इन दवाओं के उत्पादन की विशाल और विश्वस्तरीय क्षमताएं मौजूद हैं, जिससे उन्हें इस नीतिगत ढील का सीधा रणनीतिक लाभ मिलना तय है।

भारत के कुल दवा निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी लगभग 30 से 35 प्रतिशत के बीच रहती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान सख्त यूएस एफडीए (USFDA) ऑडिट्स, मूल्य दबाव (Price Erosion) और कुछ नियामकीय अनिश्चितताओं के कारण भारतीय फार्मा कंपनियों को अमेरिकी बाजार में कड़े वित्तीय संघर्ष का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में चुनिंदा दवाओं पर टैरिफ खत्म होने से कंपनियों की शिपिंग लागत में सीधी बचत होगी और उनका ईबीआईटीडीए (EBITDA) मार्जिन मजबूत होगा।

वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस घोषणा के बाद दलाल स्ट्रीट और घरेलू शेयर बाजार में लिस्टेड फार्मा शेयरों में नई चमक देखने को मिलेगी। विशेष रूप से वे कंपनियां जिनका अमेरिकी बाजार में बड़ा एक्सपोजर है और जिनके पास यूएस एफडीए से अनुमोदित एब्रिविएटेड न्यू ड्रग एप्लीकेशंस (ANDAs) की बड़ी पाइपलाइन मौजूद है, उनके राजस्व में आगामी तिमाहियों के दौरान ठोस वृद्धि दर्ज हो सकती है। आयात शुल्क हटने से भारतीय कंपनियां अपनी सप्लाई को अधिक तेजी से अमेरिकी अस्पतालों और फार्मेसी चेन्स तक पहुंचा सकेंगी, जिससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार संतुलन को भी नया संबल मिलेगा।

अमेरिका द्वारा दवाओं को टैरिफ फ्री करने की यह कवायद केवल तैयार दवाओं (Finished Dosages) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स यानी एपीआई (API) और बल्क ड्रग्स के वैश्विक समीकरणों को भी सीधे प्रभावित करेगी। कोविड महामारी के बाद से ही पश्चिमी देश अपनी दवा आपूर्ति के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भरता को खत्म करने की रणनीति (China Plus One) पर काम कर रहे हैं। भारत ने केंद्र सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना के जरिए घरेलू स्तर पर एपीआई और की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSMs) के निर्माण में भारी आत्मनिर्भरता हासिल की है।

जब अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था कुछ खास दवाओं पर आयात प्रतिबंधों और टैरिफ में ढील देती है, तो भारतीय निर्माताओं को अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार करने और अनुसंधान व विकास (R&D) में और अधिक पूंजी लगाने का प्रोत्साहन मिलता है। तेलंगाना के हैदराबाद जीनोम वैली, गुजरात के अंकलेश्वर और अहमदाबाद फार्मा क्लस्टर, महाराष्ट्र के तारापुर और हिमाचल प्रदेश के बद्दी जैसे प्रमुख भारतीय फार्मा हब्स से अमेरिकी बाजारों के लिए शिपमेंट्स की रफ्तार तेज होने की पूरी उम्मीद है। संक्षेप में कहें तो, यह घटनाक्रम न केवल भारतीय फार्मा निर्यातकों के लिए एक बड़ी वित्तीय राहत है, बल्कि यह वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में भारत की अनिवार्य और अपरिहार्य स्थिति का भी स्पष्ट प्रमाण है।