
कर्ज और वित्तीय दबाव से जूझ रही दिग्गज टेलीकॉम ऑपरेटर कंपनी वोडाफोन आइडिया लिमिटेड (Vodafone Idea – Vi) को देश की शीर्ष अदालत से एक बड़ी कानूनी व वित्तीय राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के खिलाफ केंद्र सरकार और जीएसटी विभाग द्वारा उठाई गई ₹363 करोड़ की वस्तु एवं सेवा कर (GST) मांग को बहाल करने से साफ इनकार करते हुए सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश को बरकरार रखा, जिसमें अस्तित्व समाप्त हो चुकी कंपनी के खिलाफ शुरू की गई कर कार्यवाही को पूरी तरह अधिकार क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) और शुरू से ही शून्य (Void Ab Initio) करार दिया गया था। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि जब कोई कंपनी विलय (Merger) के बाद अस्तित्व में ही नहीं रही, तो उसके खिलाफ कोई कानूनी या कर प्रक्रिया कैसे शुरू की जा सकती है?
इस कानूनी विवाद की जड़ें वर्ष 2017 में वोडाफोन के टेलीकॉम टावर कारोबार की बिक्री से जुड़ी हैं:
-
स्लंप सेल (Slump Sale) के तहत बिक्री: नवंबर 2017 में वोडाफोन मोबाइल सर्विसेज लिमिटेड (VMSL) ने अपने पूरे टेलीकॉम टावर कारोबार को एटीसी टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर (ATC Telecom Infrastructure) को एक ‘गोइंग कंसर्न’ (चालू व्यवसाय) के रूप में एकमुश्त बेच दिया था।
-
वोडाफोन-आइडिया का विलय: अगस्त 2018 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के औपचारिक आदेश के बाद वोडाफोन मोबाइल सर्विसेज लिमिटेड का विलय वोडाफोन इंडिया लिमिटेड और आइडिया सेल्यूलर लिमिटेड में हो गया। इसके साथ ही वीएमएसएल (VMSL) एक स्वतंत्र कानूनी इकाई के रूप में पूरी तरह समाप्त हो गई। इस समामेलन की औपचारिक सूचना जीएसटी प्राधिकरण को भी दे दी गई थी।
-
जीएसटी इंटेलिजेंस का नोटिस: विलय के करीब छह साल बाद, अगस्त 2024 में डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) ने अस्तित्व समाप्त हो चुकी कंपनी (VMSL) को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी कर दिया। विभाग का दावा था कि चालू व्यवसाय का हस्तांतरण एक टैक्स-छूट वाली आपूर्ति (Exempt Supply) थी, इसलिए कंपनी को आनुपातिक इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ नहीं मिलना चाहिए था। इसके आधार पर पेनल्टी सहित कुल ₹363 करोड़ की मांग रखी गई थी।
जीएसटी विभाग की इस कार्यवाही और जनवरी 2025 में पारित आदेश के खिलाफ वोडाफोन आइडिया ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अप्रैल 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की बेंच ने वोडाफोन के पक्ष में फैसला सुनाया था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब 30 अगस्त 2018 को एनसीएलटी की मंजूरी के साथ कंपनी का कानूनी अस्तित्व समाप्त हो चुका था, तो उसके छह साल बाद उस गैर-मौजूद कंपनी (Non-existent Entity) के नाम पर नोटिस जारी करना कानूनी रूप से अक्षम्य और अधिकार क्षेत्र से परे है। टैक्स विभाग ने सीजीएसटी एक्ट (CGST Act) की धारा 87 का हवाला देते हुए दलील दी थी कि विलय से पहले की देनदारियों को वसूला जा सकता है, लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि धारा 87 भी विभाग को किसी मृत या गैर-मौजूद कंपनी पर नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं देती।
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सॉलिसिटर जनरल पक्ष ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट का पूर्व फैसला (जो गैर-मौजूद कंपनियों पर कार्यवाही रोकता है) केवल इनकम टैक्स मामलों पर लागू होता है, जबकि जीएसटी एक स्वतंत्र कोड है जिसमें अतीत की देनदारियां तय करने के विशेष प्रावधान हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इन दलीलों को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत के वर्ष 2019 के ऐतिहासिक मारुति सुजुकी (Maruti Suzuki) फैसले की नजीर को दोहराया। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि विलय के बाद समाप्त हो चुकी किसी भी कंपनी पर कोई नई कर कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। इसके साथ ही अदालत ने मामले में केंद्र की याचिका को शुरुआत में ही खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन आइडिया के लिए बहुत बड़ा बूस्ट माना जा रहा है:
-
वित्तीय देनदारी से मुक्ति: ₹363 करोड़ की भारी कर मांग रद्द होने से कंपनी की बैलेंस शीट पर संभावित देनदारी का खतरा टल गया है।
-
निवेशकों का भरोसा: एजीआर (AGR) बकाए और बैंक गारंटी जैसी समस्याओं के बीच टैक्स मोर्चे पर मिली यह जीत निवेशकों के सेंटिमेंट को मजबूत करेगी। फैसले के बाद शेयर बाजार में वोडाफोन आइडिया के शेयरों में जोरदार तेजी दर्ज की गई और शेयर 4 प्रतिशत तक उछल गया।
-
कॉरपोरेट जगत के लिए मिसाल: यह फैसला उन सभी भारतीय कंपनियों के लिए भी एक बड़ा कानूनी सुरक्षा कवच बनेगा, जहां विलय या अधिग्रहण के वर्षों बाद टैक्स विभाग पुरानी देनदारियों के नाम पर अस्तित्व खो चुकी कंपनियों को नोटिस थमा देता है।
| विवरण | प्रमुख कानूनी तथ्य |
| मामला | वोडाफोन मोबाइल सर्विसेज टावर बिजनेस ट्रांसफर (2017) |
| विवादित टैक्स मांग | ₹363 करोड़ (जीएसटी व पेनल्टी सहित) |
| सुप्रीम कोर्ट बेंच | जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन |
| फैसले का आधार | गैर-मौजूद कंपनी (Non-existent entity) के खिलाफ कार्यवाही अवैध (मारुति सुजुकी केस नजीर) |
| अंतिम आदेश | केंद्र सरकार की याचिका खारिज, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार |
girls globe