
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के साए के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक चोकपॉइंट माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से सितंबर महीने में तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी (LNG) ले जाने वाले जहाजों की आवाजाही ने युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे उच्चतम स्तर छू लिया है। वैश्विक शिपिंग ट्रैकिंग डेटा और ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार, सितंबर 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले एलएनजी जहाजों की संख्या में अचानक तेज उछाल दर्ज किया गया, जिसने यह साबित कर दिया है कि युद्ध और मिसाइल हमलों के भारी जोखिम के बावजूद वैश्विक गैस आपूर्ति की पहिया थमने वाला नहीं है। इस अहम समुद्री मार्ग से गैस कार्गो की संख्या में आया यह इजाफा उन सभी आशंकाओं को खारिज करता है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि संघर्ष के चलते फारस की खाड़ी से पश्चिमी और एशियाई देशों को होने वाला एलएनजी निर्यात पूरी तरह ठप हो जाएगा।
शिपिंग डेटा और ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख ट्रैकिंग एजेंसियों के आंकड़े इस नए रिकॉर्ड की पुष्टि करते हैं। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी (S&P Global Energy) और कमोडिटी इनसाइट्स के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर महीने में कुल 19 एलएनजी जहाजों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को सफलतापूर्वक पार किया। इनमें से 13 जहाज अकेले कतर से रवाना हुए थे, जबकि 6 एलएनजी कार्गो संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बंदरगाहों से लोड होकर निकले थे। वहीं दूसरी ओर, वैश्विक मरीन डेटा एनालिटिक्स फर्म केपलर (Kpler) के शिप-ट्रैकिंग इंडिकेटर्स बताते हैं कि सितंबर के अंत तक कुल जहाजों का आंकड़ा 20 से 21 तक पहुंच गया, जो जून के 15 जहाजों के स्तर से काफी अधिक है। युद्ध शुरू होने के बाद के किसी भी एक महीने में दर्ज किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा शिपमेंट रिकॉर्ड है। हालांकि यह आंकड़ा युद्ध-पूर्व के सामान्य स्तर के मुकाबले अभी भी लगभग 20 से 25 प्रतिशत के आसपास ही है, लेकिन जिस तरह से सितंबर के दूसरे पखवाड़े में जहाजों के गुजरने की रफ्तार बढ़ी है, वह वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ी राहत बनकर उभरी है।
युद्ध क्षेत्र बन चुके होर्मुज जलडमरूमध्य से इतनी बड़ी संख्या में जहाजों का सुरक्षित निकलना कोई आसान काम नहीं था। शिपिंग कंपनियों और टैंकर ऑपरेटरों ने इस जोखिम भरे रास्ते को पार करने के लिए ‘डार्क ट्रांजिट’ (Dark Transit) तकनीक का सहारा लिया। अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के तहत हर बड़े जहाज को अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी एआईएस (AIS) ट्रांसपोंडर चालू रखना अनिवार्य होता है, जिससे उसकी लाइव लोकेशन सैटेलाइट पर दिखाई देती है। लेकिन ईरानी ड्रोन, गश्ती नौकाओं और मिसाइल हमलों के खतरे से बचने के लिए कई जहाजों ने होर्मुज में प्रवेश करते ही अपने एआईएस सिग्नल पूरी तरह बंद कर दिए। रिपोर्टों के अनुसार, ‘अल खरैतियात’ (Al Kharaitiyat) और ‘अल गर्राफा’ (Al Gharrafa) जैसे विशाल गैस टैंकर जलडमरूमध्य में प्रवेश करते ही अचानक ग्लोबल रडार से गायब हो गए और कुछ दिनों बाद भारत के पश्चिमी समुद्री तट के पास सुरक्षित दोबारा दिखाई दिए। इसके अलावा, ‘मिलाहा कतर’ (Milaha Qatar) नामक जहाज ने भी इसी गुप्त रणनीति के तहत रास्ता पार किया और वर्तमान में वह भारत के पश्चिमी बंदरगाह हजीरा पर अपना गैस कार्गो अनलोड कर रहा है।
जहाजों की आवाजाही में इस रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी का एक बड़ा श्रेय अमेरिकी नौसेना और उसके सहयोगी देशों द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे कड़े सुरक्षा घेरे को भी जाता है। यूएस नेवल फोर्सेस सेंट्रल कमांड (NAVCENT) ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच वाणिज्यिक ऊर्जा जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए विशेष नेवल एस्कॉर्ट्स और कॉन्वॉय सिस्टम (काफिला प्रणाली) को सक्रिय कर रखा है। युद्धपोतों, फ्रिगेट्स और एंटी-ड्रोन एयर डिफेंस शील्ड की मौजूदगी में एलएनजी टैंकरों को झुंड बनाकर इस संकरे रास्ते से गुजारा जाता है। हालांकि इस प्रकार के उच्च-सुरक्षा नौसैनिक एस्कॉर्ट की परिचालन लागत बहुत अधिक है और शिपिंग इंश्योरेंस कंपनियों ने वॉर-रिस्क प्रीमियम में कई गुना बढ़ोतरी कर रखी है, लेकिन यूरोपीय और एशियाई बाजारों में प्राकृतिक गैस की भारी मांग और प्रीमियम कीमतों के चलते एनर्जी एक्सपोर्टर्स यह अतिरिक्त खर्च उठाने को तैयार हैं। सुरक्षा के इस भरोसे ने ही शिपिंग कप्तानों का मनोबल बढ़ाया और सितंबर में जहाजों की संख्या में अप्रत्याशित उछाल ला दिया।
होर्मुज जलडमरूमध्य से एलएनजी का सुचारू प्रवाह भारत समेत तमाम एशियाई देशों की आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी और 25 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। भारत अपनी कुल प्राकृतिक गैस जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिसमें कतर और यूएई उसके सबसे बड़े और दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता हैं। देश में उर्वरक (फर्टिलाइजर) कारखानों, सीएनजी ऑटोमोबाइल नेटवर्क, शहरी गैस वितरण (PNG) और बिजली उत्पादन संयंत्रों को चलाने के लिए कतरी गैस पर भारी निर्भरता है। यदि होर्मुज का यह गलियारा पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता, तो भारत में औद्योगिक उत्पादन ठप होने और महंगाई के बेकाबू होने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। सितंबर में हजीरा और दाहेज जैसे भारतीय टर्मिनलों पर एलएनजी जहाजों की सफल लैंडिंग ने देश के ऊर्जा आयातकों और नीति निर्माताओं को बड़ी मानसिक राहत प्रदान की है।
यूरोप और उत्तरी गोलार्ध के देशों में सर्दियों का मौसम शुरू होने वाला है, जिस दौरान घरों को गर्म रखने और बिजली बनाने के लिए गैस की खपत अपने चरम पर पहुंच जाती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूरोप पहले ही रूसी पाइपलाइन गैस पर अपनी निर्भरता खत्म कर चुका है और मध्य पूर्व व अमेरिका की एलएनजी पर टिका हुआ है। ऐसे में अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते यदि होर्मुज से गैस की सप्लाई रुक जाती, तो अंतरराष्ट्रीय स्पॉट गैस की कीमतें 2022 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी तोड़ सकती थीं। सितंबर में जहाजों की संख्या में हुई इस वृद्धि ने अंतरराष्ट्रीय टीटीएफ (TTF) और जेकेएम (JKM) गैस बेंचमार्क पर कीमतों के दबाव को हल्का किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अक्टूबर में भी जहाजों की आवाजाही की यह रफ्तार बनी रहती है, तो वैश्विक गैस स्टोरेज समय पर भर जाएंगे और सर्दियों में ऊर्जा संकट की गंभीर आशंका काफी हद तक टल जाएगी। हालांकि, जब तक मध्य पूर्व में कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक किसी भी एक नए सैन्य हमले से यह पूरा सुरक्षा संतुलन पल भर में डगमगा सकता है।
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