8th Pay Commission: इस हफ्ते बेंगलुरु में 8वें वेतन आयोग की बड़ी बैठक, कर्मचारियों की सैलरी व पेंशन पर होंगी ये 5 बड़ी चर्चाएं

देश के लगभग 48.62 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 67.85 लाख पेंशनभोगियों के वेतन, भत्तों और पेंशन संशोधन की प्रक्रिया को गति देने के लिए गठित 8वां केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) अब अपने सबसे अहम चरण में प्रवेश कर चुका है। देश के विभिन्न राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख शहरों में विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श पूरा करने के बाद आयोग की उच्चस्तरीय टीम इस हफ्ते कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में डेरा डालने जा रही है। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, 7 और 8 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु में आयोग के सदस्यों और दक्षिण भारत के प्रमुख केंद्रीय कर्मचारी यूनियनों, रक्षा कर्मियों के संगठनों, रेलवे कर्मचारी महासंघों और पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशनों के बीच आमने-सामने विस्तृत बैठकें आयोजित की जाएंगी। इससे पहले आयोग लद्दाख, उत्तर प्रदेश (लखनऊ), चंडीगढ़, चेन्नई, पुडुचेरी और जयपुर जैसे शहरों में बैठकों का दौर पूरा कर चुका है। बेंगलुरु बैठक इसलिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसके बाद आयोग 22 और 23 अक्टूबर को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में वित्तीय और प्रशासनिक चर्चाओं को अंतिम रूप देने वाला है।

बेंगलुरु की इस दो दिवसीय बैठक का सबसे प्रमुख और बहुप्रतीक्षित एजेंडा फिटमेंट फैक्टर (Fitment Factor) का निर्धारण रहने वाला है। सातवें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था। कर्मचारी संगठनों की शीर्ष संस्था नेशनल काउंसिल (JCM – Staff Side) और भारत पेंशनर्स समाज (BPS) ने आयोग के सामने 3.833 के उच्च फिटमेंट फैक्टर की आधिकारिक मांग रखी है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ (BPMS) ने इसे 4 गुना तक करने का सुझाव दिया है। हालांकि, वित्तीय विशेषज्ञों और सरकार के आर्थिक सलाहकारों के बीच 2.28 से लेकर 2.86 के व्यावहारिक फिटमेंट फैक्टर पर सहमति बनने की चर्चा जोरों पर है। बेंगलुरु बैठक में कर्मचारी प्रतिनिधि विस्तृत प्रजेंटेशन के जरिए यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि पिछले एक दशक में बढ़ी महंगाई, जीवन-यापन की लागत और प्रति व्यक्ति आय में हुए इजाफे के अनुसार 3 गुना से अधिक का फिटमेंट फैक्टर ही न्यायसंगत होगा।

वर्तमान में 7वें वेतन आयोग के पे-मैट्रिक्स लेवल 1 के तहत कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 प्रति माह निर्धारित है। कर्मचारी संगठनों ने आयोग के समक्ष मजबूत दलील रखी है कि 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) के डॉ. एक्रोयड फॉर्मूले के अनुसार, जिसमें भोजन, कपड़ा, आवास और बच्चों की शिक्षा की न्यूनतम जरूरतों को शामिल किया जाता है, न्यूनतम वेतन कम से कम ₹41,000 से ₹54,000 के दायरे में होना चाहिए। कुछ प्रमुख यूनियनों ने इसे ₹69,000 तक ले जाने का प्रस्ताव भी सौंपा है। इसके अलावा, बीपीएमएस (BPMS) ने सुझाव दिया है कि सैलरी तय करते समय परिवार की इकाई को 3 सदस्यों से बढ़ाकर 5 सदस्य माना जाना चाहिए। इस हफ्ते बेंगलुरु में होने वाली वार्ता के दौरान आयोग विभिन्न वेतन स्तरों के अनुपात (Compression Ratio) और न्यूनतम से अधिकतम वेतन के बीच के अंतर को संतुलित करने पर यूनियनों से उनका अंतिम रुख जानेगा।

बेंगलुरु की बैठक में पेंशनभोगियों (Pensioners) से जुड़े मसलों पर भी गहन समीक्षा होने जा रही है। सातवें वेतन आयोग के अंतर्गत वर्तमान में न्यूनतम पेंशन ₹9,000 प्रति माह है। पेंशनर्स एसोसिएशनों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और बुढ़ापे की जरूरतों को देखते हुए न्यूनतम पेंशन को कम से कम ₹20,500 से ₹25,000 तक बढ़ाया जाना चाहिए। इसके साथ ही यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS), नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को लेकर चल रहे विवादों के बीच 10 वर्ष से अधिक सेवा वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए सुनिश्चित न्यूनतम पेंशन की गारंटी पर भी विचार-विमर्श होगा। पेंशनर्स यह भी मांग कर रहे हैं कि जिस तरह कार्यरत कर्मचारियों की सैलरी फिटमेंट फैक्टर से संशोधित होती है, ठीक उसी फॉर्मूले से पुरानी पेंशन का भी संपूर्ण रिवीजन होना चाहिए।

वेतन वृद्धि की वार्षिक दर को लेकर कर्मचारी पक्ष एक बड़ा बदलाव चाहता है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार के कर्मचारियों को प्रति वर्ष 3 प्रतिशत का वार्षिक इंक्रीमेंट (Annual Increment) दिया जाता है। एनसी-जेसीएम (NC-JCM) ने आयोग को सौंपे अपने ड्राफ्ट में इसे दोगुना करते हुए 6 प्रतिशत वार्षिक इंक्रीमेंट करने का मजबूत प्रस्ताव रखा है। इसके अतिरिक्त, मौजूदा 18 पे-मैट्रिक्स लेवल्स में मौजूद विसंगतियों को दूर करने के लिए लेवल्स के विलय (Merger) की मांग रखी गई है। इसमें लेवल 2 और 3, लेवल 4 और 5 तथा लेवल 9 और 10 को आपस में मर्ज करके लेवल 13 तक एक सरलीकृत और पारदर्शी यूनिफाइड पे-मैट्रिक्स बनाने की वकालत की गई है। इससे समान पद और समान जिम्मेदारी वाले कर्मचारियों के बीच वेतन असमानता का विवाद हमेशा के लिए सुलझ सकता है।

बेंगलुरु बैठक की पांचवीं सबसे बड़ी चर्चा भत्तों (Allowances) और एरियर (Arrears) के वित्तीय गणित से जुड़ी है। केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को 8वें वेतन आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) को अधिसूचित किया था और आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए 18 महीने की समयसीमा (मई-जून 2027 तक) दी गई है। परंपरा के अनुसार वेतन आयोग की सिफारिशें 10 साल के चक्र पर 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाती हैं। ऐसे में यदि आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने और सरकार द्वारा उसे लागू करने में 2027 तक का समय लगता है, तो कर्मचारियों और पेंशनर्स को 1 जनवरी 2026 से लेकर वास्तविक भुगतान तक का भारी एरियर मिलना तय है। पे-लेवल 6, 7 और 8 के कर्मियों के लिए यह एरियर ₹8 लाख से लेकर ₹17 लाख से भी अधिक पहुंच सकता है। इसके साथ ही महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया भत्ता (HRA) और ट्रांसपोर्ट अलाउंस (TA) को नए मूल वेतन के साथ जोड़ने के नियमों पर भी सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी।

बेंगलुरु के बाद 22-23 अक्टूबर को मुंबई की बैठकों के समापन के साथ ही आयोग के क्षेत्रीय दौरों का मुख्य चरण पूरा हो जाएगा। इसके बाद आयोग प्राप्त सभी ज्ञापनों, वित्तीय अनुमानों और केंद्रीय बजट पर पड़ने वाले राजकोषीय प्रभाव का आकलन करने के लिए वित्त मंत्रालय के साथ आंतरिक बैठकों का दौर शुरू करेगा। हालांकि कर्मचारी संगठन रिपोर्ट को जल्द सौंपने का दबाव बना रहे हैं, लेकिन आयोग की आधिकारिक 18 महीने की निर्धारित समयसीमा मई 2027 के आसपास समाप्त होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही अधिसूचना में समय लगे, लेकिन नई वेतन संरचना 1 जनवरी 2026 से ही प्रभावी मानी जाएगी, जिससे कर्मचारियों की जेब में मोटी रकम और एरियर का पहुंचना पूरी तरह सुनिश्चित है। इस हफ्ते बेंगलुरु में होने वाली बातचीत से निकलने वाले संकेत यह तय करेंगे कि आयोग का रुख कर्मचारियों की मांगों के प्रति कितना सकारात्मक रहता है।