
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के सर्कुलर के बाद मचे देशव्यापी हंगामे के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देर रात एक बेहद अहम और आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है। देश के बैंकिंग नियामक ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और प्रेस नोट के जरिए साफ कर दिया है कि यह नीतिगत फैसला भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता (Long-term Sustainability) और सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया एक अनिवार्य कदम है।
रिजर्व बैंक ने सोशल मीडिया पर चल रही उन सभी अफवाहों और भ्रांतियों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि अब आम नागरिकों को यूपीआई से भुगतान करने पर अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी। केंद्रीय बैंक ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि यूपीआई आम उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित, सुलभ और शत-प्रतिशत निशुल्क बना रहेगा। वहीं, बड़े मर्चेंट पेमेंट्स से मिलने वाले एमडीआर का एक न्यायसंगत और पारदर्शी बंटवारा डिजिटल बुनियादी ढांचे, सर्वर कैपेसिटी और साइबर सिक्योरिटी में नए निवेश का रास्ता खोलेगा।
आरबीआई के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस नई एमडीआर व्यवस्था से सबसे बड़ा संस्थागत लाभ किसे मिलने जा रहा है। साल 2020 से लागू ‘जीरो एमडीआर’ (Zero MDR) नीति के चलते बैंक, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (जैसे गूगल पे, फोनपे, पेटीएम और रेजरपे) भारी वित्तीय दबाव में काम कर रहे थे। हर महीने 15 से 16 अरब ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने वाले इस विशाल नेटवर्क के सर्वर मेंटेनेंस, डाउनटाइम मैनेजमेंट और साइबर फ्रॉड की रोकथाम का सालाना खर्च हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था, जिसकी भरपाई के लिए केंद्र सरकार को हर साल बजट से करीब 2,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी पड़ रही थी।
केंद्रीय बैंक के अनुसार, एमडीआर व्यवस्था के लागू होने से निम्नलिखित संस्थाओं को सीधा फायदा पहुंचेगा:
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बैंकों को वित्तीय मजबूती: ग्राहक के बैंक (Issuing Bank) और मर्चेंट के बैंक (Acquiring Bank) को एमडीआर का एक बड़ा हिस्सा मिलेगा, जिससे वे अपने मुख्य बैंकिंग सर्वर और यूपीआई स्विच को अपग्रेड कर सकेंगे।
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फिनटेक ऐप्स और पेमेंट एग्रीगेटर्स: पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फ्रॉड डिटेक्शन और आधुनिक साउंडबॉक्स व पीओएस (POS) नेटवर्क का विस्तार करने के लिए नई पूंजी मिलेगी।
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ग्रामीण और टियर-3 मर्चेंट फंड: जुटाए गए एमडीआर के एक हिस्से से एक विशेष फंड (Dedicated Acceptance Development Fund) बनाया जाएगा, जिसका उपयोग ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में छोटे व्यापारियों को डिजिटल नेटवर्क से जोड़ने और उन्हें इंसेंटिव देने के लिए किया जाएगा।
आरबीआई ने साफ किया है कि यह शुल्क किसी भी सूरत में आम खरीदार या ग्राहक से नहीं वसूला जाएगा। इसका पूरा वित्तीय दायित्व केवल और केवल बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों (Commercial Merchants) पर होगा, जो ₹2,000 से अधिक मूल्य के बड़े लेन-देन स्वीकार करते हैं। नए नियमों के तहत 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के सामान्य पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर 0.40 प्रतिशत का मानक एमडीआर लगेगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन पर कैप (Capped) कर दी गई है।
इसका सीधा हिसाब इस प्रकार है:
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यदि कोई ग्राहक किसी बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स या कपड़ों के शोरूम में ₹3,000 का सामान खरीदकर यूपीआई से पे करता है, तो ग्राहक के खाते से पूरे ₹3,000 ही कटेंगे।
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व्यापारी के बैंक द्वारा 0.4% की दर से मात्र ₹12 का एमडीआर काटा जाएगा और व्यापारी के खाते में ₹2,988 क्रेडिट होंगे।
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यदि कोई ग्राहक ₹50,000 का मोबाइल या टीवी खरीदता है, तो व्यापारी को 0.4% के हिसाब से ₹200 का शुल्क देना होगा।
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यदि कोई ग्राहक ₹75,000 से लेकर ₹1,00,000 या उससे अधिक का कोई बड़ा बिल चुकाता है, तो 0.4% की दर लागू होने के बावजूद व्यापारी से अधिकतम ₹300 ही लिए जाएंगे।
कानूनन कोई भी दुकानदार या शोरूम मालिक ग्राहक से यह नहीं कह सकता कि “यूपीआई से पेमेंट करने पर 0.4% एक्स्ट्रा लगेगा।” यदि कोई व्यापारी ऐसा करता है, तो वह आरबीआई और उपभोक्ता संरक्षण कानून का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
रिजर्व बैंक ने अपने बयान में देश के आम नागरिकों और असंगठित क्षेत्र के छोटे कारोबारियों को पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया है। केंद्रीय बैंक ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि भारत में होने वाले कुल यूपीआई मर्चेंट भुगतानों का लगभग 95 से 96 प्रतिशत हिस्सा ₹2,000 से कम मूल्य का होता है। वित्त मंत्रालय द्वारा राजपत्र (Gazette Notification) में किए गए संशोधन के तहत ₹2,000 तक के सभी डिजिटल सौदों पर किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चार्ज लगाने पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इसके अलावा, निम्नलिखित श्रेणियों पर शुल्क का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा:
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पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर: दोस्तों, परिजनों, रिश्तेदारों को पैसे भेजने या अपने ही एक खाते से दूसरे खाते में फंड ट्रांसफर करने पर 100% शून्य चार्ज रहेगा।
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किराना, फल-सब्जी और ठेले-पटरी वाले (P2PM): वे सभी छोटे व्यापारी जिनका मासिक डिजिटल टर्नओवर ₹1 लाख तक है, वे एमडीआर के दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे।
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दैनिक जरूरी सेवाएं (Utilities): बिजली, पानी, पाइप्ड गैस, रेलवे टिकट (IRCTC), सरकारी स्कूल-कॉलेज की फीस, बीमा प्रीमियम और पेट्रोल पंप पर ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर 0.4% के बजाय केवल फ्लैट ₹5 का टोकन चार्ज तय किया गया है।
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शेयर बाजार व म्यूचुअल फंड: पूंजी बाजार (Demat, Mutual Funds, Securities) के लिए 0.02% (अधिकतम ₹300 कैप) की बेहद न्यूनतम दर रखी गई है और एसआईपी ऑटोपे (AutoPay) पूरी तरह फ्री रहेगा।
आरबीआई के दिशानिर्देशों के अनुसार, बड़े व्यापारियों से वसूले जाने वाले इस एमडीआर को डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के विभिन्न पक्षों के बीच एक तय अनुपात में बांटा जाएगा। रॉयटर्स और बैंकिंग सूत्रों के अनुसार, राजस्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उस बैंक को मिलेगा जहां ग्राहक का बचत खाता है (Issuing Bank), क्योंकि ग्राहक प्रमाणीकरण, सर्वर प्रोसेसिंग और एसएमएस अलर्ट की प्राथमिक जिम्मेदारी उसी की होती है। शेष 60 प्रतिशत राशि को मर्चेंट के अधिग्रहणकर्ता बैंक (Acquiring Bank), पेमेंट एग्रीगेटर (जैसे Pine Labs, Paytm, Razorpay) और थर्ड-पार्टी पेमेंट ऐप्स (जैसे Google Pay, PhonePe) के बीच उनकी भूमिका के आधार पर समान रूप से विभाजित किया जाएगा। एनपीसीआई को नेटवर्क स्विचिंग और सुरक्षा क्लीयरेंस के लिए एक तय न्यूनतम फीस प्राप्त होगी। यह राजस्व वितरण मॉडल यह सुनिश्चित करेगा कि निजी फिनटेक कंपनियां केवल फ्री मॉडल पर निर्भर न रहकर मुनाफेदार और टिकाऊ बिजनेस बना सकें।
आरबीआई ने अपने विश्लेषण में यह भी दर्शाया कि नया एमडीआर ढांचा लागू होने के बावजूद यूपीआई भारत का सबसे किफायती और मर्चेंट-फ्रेंडली डिजिटल भुगतान साधन बना रहेगा। क्रेडिट कार्ड स्वीकार करने पर आज भी व्यापारियों को 1.5% से लेकर 2.5% तक का भारी-भरकम एमडीआर चुकाना पड़ता है। वहीं, डेबिट कार्ड पर आरबीआई के 2017 के नियमों के तहत ₹20 लाख से अधिक टर्नओवर वाले बड़े व्यापारियों पर 0.90% (अधिकतम ₹1,000 कैप) तक का एमडीआर लगता है।
इसकी तुलना में यूपीआई पर केवल 0.40% की दर और ₹300 की अधिकतम कैप रखी गई है। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यापारी के लिए क्रेडिट या डेबिट कार्ड स्वाइप कराने की तुलना में यूपीआई से ₹50,000 या ₹1 लाख का पेमेंट लेना लगभग 70 से 80 प्रतिशत अधिक सस्ता पड़ेगा। यही कारण है कि व्यापारी वर्ग भी इसका विरोध करने के बजाय इसे कार्ड्स के मुकाबले कहीं बेहतर मान रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक का यह देर रात आया बयान यह स्पष्ट कर देता है कि भारत का डिजिटल पेमेंट मॉडल अब अपने ‘शैशव काल’ (Infancy) से निकलकर एक ‘परिपक्व और आत्मनिर्भर युग’ में प्रवेश कर चुका है। किसी भी वैश्विक स्तर की तकनीकी प्रणाली को दशकों तक केवल सरकारी खजाने की सब्सिडी के दम पर मुफ्त में नहीं चलाया जा सकता।
आरबीआई और केंद्र सरकार ने यह मास्टरप्लान बेहद चतुराई से तैयार किया है: 95% से अधिक जनता और छोटे व्यापारियों को 100% मुफ्त लेन-देन का सुरक्षा कवच दिया गया है, जबकि बड़े कॉर्पोरेट रिटेलर्स और लक्जरी स्टोर्स से मामूली 0.4% चार्ज लेकर उस पैसे को डिजिटल इंडिया की सुरक्षा दीवार को मजबूत करने में लगाया जाएगा। आम नागरिकों को अब किसी भी वॉट्सऐप अफवाह या भ्रामक वीडियो से डरने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है; आपका फोनपे, गूगल पे और भीम यूपीआई 15 अक्टूबर के बाद भी बिल्कुल वैसे ही मुफ्त काम करता रहेगा जैसे आज कर रहा है।
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