
देशभर के केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध स्कूलों में कक्षा 6 से प्रस्तावित ‘तीन भाषा फॉर्मूला’ (Three-Language Formula) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील रुख अपनाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत छात्रों के पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा को अनिवार्य रूप से जोड़े जाने के प्रावधान पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को सुझाव दिया है कि वह इस व्यवस्था को कक्षा 6 से तत्काल लागू करने के बजाय फिलहाल टालने पर गंभीरता से विचार करे। दिल्ली, उत्तर प्रदेश (लखनऊ, नोएडा), महाराष्ट्र (मुंबई), बिहार (पटना), राजस्थान (जयपुर) और कर्नाटक (बेंगलुरु) सहित देश के तमाम राज्यों में संचालित सीबीएसई स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों की नजरें इस अदालती टिप्पणी और बोर्ड के आगामी फैसले पर टिक गई हैं। कोर्ट का मानना है कि इतनी छोटी उम्र के छात्रों पर एक साथ तीन-तीन भाषाओं का अकादमिक दबाव डालना उनके मानसिक विकास और सीखने की सहज प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि प्राथमिक कक्षाओं से निकलकर माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 6 में प्रवेश करने वाले 10 से 11 वर्ष के नन्हे बच्चों पर पहले से ही गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों का भारी बोझ होता है। ऐसे में यदि उन पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के अलावा एक और तीसरी अनिवार्य भाषा का दबाव डाल दिया जाएगा, तो छात्र भाषाओं की व्याकरण और परीक्षा पास करने के तनाव में उलझ कर रह जाएंगे।
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों में सीखने की ललक और रचनात्मकता को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि उनके बस्ते का वजन और विषयों की संख्या बढ़ाकर उन्हें तनावग्रस्त करना। अदालत ने सीबीएसई से पूछा कि क्या इस फॉर्मूले को उच्च कक्षाओं (जैसे कक्षा 8 या 9) से शुरू किया जा सकता है या इसे क्रमिक रूप से लागू किया जाना संभव है, ताकि छात्र अपनी रुचि के अनुसार बिना किसी मानसिक तनाव के नई भाषा का चयन कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव पर सीबीएसई की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विधिक प्रतिनिधियों ने सकारात्मक रुख दिखाया। बोर्ड के वकील ने पीठ को आश्वस्त करते हुए कहा कि अदालत द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं और सुझावों को बेहद गंभीरता से लिया गया है। सीबीएसई के प्रतिनिधियों ने अदालत को अवगत कराया कि बोर्ड इस विषय पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) तथा अपनी गवर्निंग बॉडी के सक्षम प्राधिकारियों और शिक्षाविदों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक कर विचार-विमर्श करेगा। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि छात्रों के समग्र हित और तनावमुक्त शिक्षण माहौल को प्राथमिकता देते हुए जल्द ही इस संबंध में एक सुविचारित नीतिगत निर्णय लिया जाएगा और अगली सुनवाई में अदालत को इसकी प्रगति से अवगत कराया जाएगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत त्रि-भाषा सूत्र की परिकल्पना भारतीय भाषाओं के संवर्धन और बहुभाषी ज्ञान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी। इसके अंतर्गत स्कूली छात्रों को तीन भाषाएं सीखने का प्रस्ताव है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं मूल रूप से भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के साथ किसी एक आधुनिक भारतीय भाषा (विशेषकर दक्षिण भारतीय भाषाएं जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम अथवा संस्कृत) को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने की योजना बनाई गई थी। वहीं गैर-हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा का विकल्प दिया जाना था।
विवाद तब गहराया जब कई शिक्षाविदों, अभिभावक संघों और गैर-सरकारी संगठनों ने यह दलील देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया कि कक्षा 6 के स्तर पर शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता के बिना इसे थोपना अव्यावहारिक है। देश के अधिकांश स्कूलों में दक्षिण भारतीय भाषाओं या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को पढ़ाने के लिए योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे अंततः छात्रों पर संस्कृत या किसी अन्य भाषा को केवल परीक्षा पास करने के लिए रटने का अनुचित दबाव बन रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव का देश भर के अभिभावक संघों ने खुलकर स्वागत किया है। पैरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि आज के दौर में जब बच्चे पहले से ही कोडिंग, प्रोजेक्ट वर्क और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की शुरुआती तैयारियों के बोझ तले दबे हैं, तब एक और भाषा की परीक्षा और होमवर्क का तनाव झेलना उनके लिए मुश्किल हो रहा था। कई अभिभावकों का तर्क है कि भाषा को शौक और संचार के माध्यम के रूप में सिखाया जाना चाहिए, न कि अनिवार्य परीक्षा विषय के रूप में।
दूसरी तरफ, कुछ भाषाविदों और सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि बचपन का दौर नई भाषाएं सीखने के लिए सबसे अनुकूल होता है और यदि तीन भाषा फॉर्मूले को सही शिक्षण पद्धति और खेल-खेल में सिखाया जाए, तो यह बच्चों की बौद्धिक क्षमता को निखारने में मददगार साबित हो सकता है। बहरहाल, अब सबकी नजरें सीबीएसई और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की आगामी उच्चस्तरीय बैठक पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि कक्षा 6 के छात्रों को इस नए अकादमिक सत्र में तीसरी भाषा के दबाव से राहत मिलती है या नहीं।
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