
एप्पल के नए फ्लैगशिप स्मार्टफोन की आधिकारिक बिक्री शुरू होते ही देश के प्रमुख शहरों में एक बार फिर वही पुराना और हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला। मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित आधिकारिक एप्पल स्टोर और नई दिल्ली के सेलेक्ट सिटीवॉक (साकेत) स्टोर के बाहर ग्राहकों का ऐसा सैलाब उमड़ा मानो कोई मुफ्त में राशन बंट रहा हो। दिल्ली, मुंबई, गुरुग्राम, नोएडा, बेंगलुरु और चंडीगढ़ जैसे शहरों से आए टेक प्रेमी और एप्पल के डाई-हार्ड फैंस स्टोर खुलने से 12 से 15 घंटे पहले ही यानी पिछली रात से कतारों में अपनी जगह पक्की करके बैठ गए थे। कई लोग अपने साथ फोल्डिंग कुर्सियां, तकिए, पानी की बोतलें और स्नैक्स लेकर पहुंचे थे, ताकि वे भारत में नया फोन खरीदने वाले शुरुआती ग्राहकों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा सकें। सुबह जैसे ही स्टोर के शटर उठे, सुरक्षाकर्मियों को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग लगानी पड़ी।
एप्पल स्टोर के बाहर लगी इन किलोमीटर लंबी कतारों के वीडियो जैसे ही एक्स (पूर्व में ट्विटर), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर वायरल हुए, इंटरनेट यूजर्स दो धड़ों में बंट गए। अधिकांश यूजर्स ने इस तरह रातभर सड़क पर खड़े रहने को समझ से परे और गैर-जरूरी बताया। सोशल मीडिया पर एक यूजर का कमेंट सबसे ज्यादा वायरल हो रहा है, जिसमें उसने लिखा, “यह किस तरह की विडंबना है! डेढ़-दो लाख रुपये जेब से खर्च भी करने हैं और फिर हाथ में पैसे लेकर किसी भिखारी की तरह पूरी रात सड़क पर लाइन में भी खड़े रहना है।”
अन्य कई यूजर्स ने इस पर सहमति जताते हुए लिखा कि कंपनियां मार्केटिंग और पीआर के जरिए ‘आर्टिफिशियल हाइप’ और ‘फोमो’ (FOMO – फियर ऑफ मिसिंग आउट) पैदा करती हैं और लोग केवल सोशल मीडिया पर पहला अनबॉक्सिंग वीडियो डालने के लिए अपना आत्मसम्मान ताक पर रख देते हैं।
सोशल मीडिया पर इस कतार संस्कृति को लेकर बेहद तीखे और हास्यपद मीम्स शेयर किए जा रहे हैं:
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किडनी और ईएमआई के चुटकुले: कतार में खड़े युवाओं की तस्वीरों के साथ यूजर्स ने कैप्शन लिखा, “36 महीने की नो-कॉस्ट ईएमआई साइन करने के लिए 12 घंटे का इंतजार।”
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राशन की दुकान बनाम एप्पल स्टोर: पुराने जमाने में केरोसिन और राशन के लिए लगने वाली लाइनों की तुलना एप्पल स्टोर के बाहर लगे बैरिकेड्स से करते हुए कई व्यंग्यात्मक तस्वीरें साझा की गईं।
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क्विक-कॉमर्स से तुलना: कई समझदार यूजर्स ने तंज कसते हुए लिखा कि जब ब्लिंकिट और जेप्टो जैसी क्विक-कॉमर्स ऐप्स घर बैठे 10 मिनट में बैंक डिस्काउंट के साथ फोन डिलीवर कर रही हैं, तब धूप और पसीने में लाइन लगाकर खड़े होना केवल ‘दिखावे की सनक’ है।
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कर्मचारियों की तालियों पर कटाक्ष: जब पहले ग्राहक का स्वागत करने के लिए स्टोर के दर्जनों कर्मचारी तालियां बजाते हैं, तो यूजर्स ने लिखा, “वे तालियां आपके फोन खरीदने पर नहीं, बल्कि कंपनी की 60% प्रॉफिट मार्जिन वाली रणनीति में फंसने की खुशी में बजा रहे हैं।”
भारत आज दुनिया में प्रीमियम स्मार्टफोन्स के लिए सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है। समाजशास्त्रियों और डिजिटल विश्लेषकों का मानना है कि भारत में आईफोन अब केवल संचार या फोटोग्राफी का गैजेट नहीं, बल्कि एक ‘स्टेटस सिंबल’ और सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बन चुका है। टियर-1 और टियर-2 शहरों में युवा वर्ग खुद को तकनीक और ट्रेंड्स में सबसे आगे दिखाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है। भले ही नए मॉडल में पिछले मॉडल की तुलना में मामूली कैमरे या चिपसेट का ही अपग्रेड क्यों न हुआ हो, स्टोर के बाहर सबसे पहले खड़े होकर हाथ में नया बॉक्स लहराने का रोमांच कई लोगों के लिए स्टेटस की जंग जीतने जैसा होता है।
एप्पल की वैश्विक मार्केटिंग रणनीति हमेशा से ‘एक्सक्लूसिविटी’ यानी विशिष्टता के अहसास पर टिकी रही है। सीमित स्टॉक की अफवाहें, स्टोर के बाहर नियंत्रित भीड़ और मीडिया कैमरों की मौजूदगी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करती है, जिससे आम उपभोक्ता को लगता है कि अगर उसने तुरंत यह फोन नहीं खरीदा, तो वह आधुनिक दुनिया की दौड़ में पीछे छूट जाएगा। हालांकि इंटरनेट पर आ रही तीखी प्रतिक्रियाएं यह संकेत दे रही हैं कि आम जनता अब इस उपभोक्तावादी दिखावे की संस्कृति को लेकर अधिक मुखर और आलोचनात्मक हो रही है।
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