
भीषण गर्मी के मौसम में पेट की बीमारियां और फूड पॉइजनिंग के मामले तेजी से बढ़ते हैं। ऐसे में गर्मियों में खुद को बीमार होने से बचाने के लिए खानपान का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है। आमतौर पर बुजुर्गों द्वारा हमेशा सलाह दी जाती है कि बासी भोजन करने से बचना चाहिए। इसके विपरीत, आजकल की आधुनिक जीवनशैली में लोग बचे हुए खाने, सब्जी, दाल, चावल और रोटी को फ्रिज में स्टोर कर देते हैं और बाद में उसे दोबारा गर्म (Reheat) करके खाते हैं।
भले ही आधुनिक साइंस के कुछ नियम फ्रिज में सही तापमान पर रखे भोजन को दोबारा गर्म करके खाने की इजाजत देते हों, लेकिन हमारा प्राचीन आयुर्वेद इस मामले में पूरी तरह सख्त है। आयुर्वेद ने हजारों साल पहले ही यह नियम स्पष्ट कर दिया था कि भोजन को पकाने के कुछ निश्चित घंटों के भीतर ही ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि एक तय समय के बाद भोजन में सूक्ष्म बैक्टीरिया पनपना शुरू हो जाते हैं।
WHO की चेतावनी: रखे हुए खाने में बुलेट की रफ्तार से बढ़ते हैं बैक्टीरिया
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पकाए गए भोजन को फौरन ताजा-ताजा खा लेना ही सबसे हेल्दी प्रैक्टिस (स्वस्थ आदत) है। लंबे समय तक रखे हुए खाने में बहुत तेजी से बैक्टीरिया अपनी ग्रोथ करने लगते हैं, जो गर्मियों के दिनों में इंसान को गंभीर रूप से बीमार या डायरिया का शिकार बना सकते हैं।
तापमान का ‘डेंजर जोन’: क्यों बीमार बनाता है बासी खाना?
बासी खाना खाने से लोग बीमार न पड़ें, इसके लिए WHO ने एक विशेष गाइडलाइन भी जारी की है। इस गाइडलाइन के पीछे का वैज्ञानिक कारण बेहद दिलचस्प और डरावना है:
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बैक्टीरिया का खात्मा: जब हम भोजन को उच्च तापमान पर पकाते हैं, तो उसके अंदर मौजूद सभी हानिकारक बैक्टीरिया पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं।
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5 से 60 डिग्री का खतरा: लेकिन, जब उसी पके हुए भोजन को 5 डिग्री सेल्सियस से लेकर 60 डिग्री सेल्सियस के तापमान (जिसे बैक्टीरिया का ‘डेंजर जोन’ कहा जाता है) पर लंबे समय के लिए छोड़ दिया जाता है, तो उसमें बचे हुए बैक्टीरिया खतरनाक रफ्तार से दोबारा संख्या बढ़ाने लगते हैं।
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फूडबॉर्न डिसीज: ऐसे दूषित भोजन का सेवन करने से ‘फूडबॉर्न डिसीज’ (भोजन से होने वाली बीमारियां) और गंभीर फूड पॉइजनिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
आयुर्वेद का नजरिया: वात, पित्त और कफ का बिगड़ जाता है संतुलन
प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति ‘आयुर्वेद’ के अनुसार, बासी या फ्रिज में रखा खाना खाने से शरीर के तीनों मुख्य दोष (वात, पित्त और कफ) पूरी तरह असंतुलित (Imbalance) हो जाते हैं। जब शरीर में इन तीनों दोषों का संतुलन बिगड़ता है, तो उसका सीधा और सबसे बुरा असर हमारी ‘जठराग्नि’ यानी पाचन क्रिया पर पड़ता है।
पाचन तंत्र कमजोर होने से खाना ठीक से पच नहीं पाता और शरीर में टॉक्सिंस (विषाक्त पदार्थ) जमा होने लगते हैं। इसीलिए आयुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि पके हुए भोजन को केवल 1 से 3 घंटे के भीतर ही खा लेना स्वास्थ्य के लिए सबसे उत्तम है।
रिहीटिंग (Reheating) का नुकसान: नष्ट हो जाते हैं जरूरी विटामिंस और न्यूट्रिशन
कई लोग सोचते हैं कि फ्रिज से खाना निकालकर अच्छे से खौलाने या गर्म करने से वह बिल्कुल सुरक्षित हो जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जब खाने को बार-बार या दोबारा गर्म किया जाता है, तो उसके भीतर मौजूद आवश्यक पोषक तत्व (Nutrients) पूरी तरह नष्ट होने लगते हैं।
भोजन में मौजूद कई महत्वपूर्ण विटामिंस और मिनरल्स हीट (गर्मी) और एयर (हवा) के प्रति बेहद संवेदनशील (Sensitive) होते हैं। दोबारा तेज आंच पर गर्म करने से ये संवेदनशील तत्व पूरी तरह खत्म हो जाते हैं, जिससे उस भोजन की ‘हेल्दी वैल्यू’ (पोषण क्षमता) शून्य के बराबर रह जाती है। वह सिर्फ पेट भरने का साधन मात्र रह जाता है, शरीर को उससे कोई ऊर्जा नहीं मिलती।
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