
देवों के देव महादेव को समर्पित पावन सावन का महीना शुरू हो चुका है और इस पूरे महीने में देश के कोने-कोने से शिव भक्त भगवान शिव की भक्ति में सराबोर नजर आते हैं। सावन के इस पवित्र महीने में देश के प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में शुमार झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है। इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से कांवड़ यात्रा लेकर यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं। हालांकि, इस पूरी यात्रा में एक बात सबसे ज्यादा खास होती है कि सभी कांवड़िए विशेष तौर पर बिहार के सुल्तानगंज से ही गंगाजल भरकर अपनी कठिन यात्रा शुरू करते हैं। ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर कांवड़िए देश के दूसरे हिस्सों से गंगाजल क्यों नहीं लाते और सुल्तानगंज को ही इसके लिए क्यों चुना जाता है?
उत्तरवाहिनी गंगा का महत्व और धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, सुल्तानगंज में मां गंगा का प्रवाह बेहद खास और अनोखा माना जाता है। यहां पर गंगा नदी उत्तर दिशा की ओर बहती है, जिसके कारण इसे ‘उत्तरवाहिनी गंगा’ के नाम से पुकारा जाता है। आमतौर पर देश के अन्य हिस्सों में गंगा का प्रवाह दूसरी दिशाओं में होता है, लेकिन उत्तर दिशा में बहने वाली गंगा को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और मोक्षदायिनी माना गया है। इसके अलावा, भगवान शिव का वास स्थल कैलाश पर्वत भी इसी उत्तर दिशा में स्थित है, यही वजह है कि उत्तरवाहिनी गंगा का जल उठाकर शिवलिंग पर अर्पित करना बेहद शुभ, फलदायी और शिव को अतिप्रिय माना गया है।
105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा और जलाभिषेक की परंपरा
सावन के महीने में बिहार के सुल्तानगंज में अगाध आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। यहां हजारों-लाखों श्रद्धालु सबसे पहले उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान करते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद अपने कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरते हैं। इसके बाद शुरू होती है लगभग 105 किलोमीटर की बेहद कठिन और लंबी पैदल यात्रा। तमाम शिव भक्त बिना चप्पल-जूतों के नंगे पांव ही भगवा वस्त्र धारण कर ‘बोल बम’ के जयकारे लगाते हुए सुल्तानगंज से देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम तक का सफर तय करते हैं। मान्यता है कि इतनी कठिन यात्रा को पूरी निष्ठा और सच्चे मन से पूरा करने वाले हर भक्त की मनोकामना महादेव अवश्य पूरी करते हैं।
समुद्र मंथन और जलाभिषेक की पौराणिक कथा
सावन के महीने में शिव जी के जलाभिषेक की यह प्राचीन परंपरा समुद्र मंथन की घटना से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान अत्यंत घातक हलाहल विष निकला था, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। इस विष के प्रभाव से महादेव के शरीर में भयंकर उष्णता और गर्मी बढ़ने लगी थी, जिसे शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि सावन के महीने में शिवजी को जल चढ़ाने से उनके शरीर की उष्णता शांत होती है और उन्हें शीतलता मिलती है। इस जलाभिषेक से भक्तों को सुख, शांति, अच्छा स्वास्थ्य और जीवन के सभी दुखों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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