
देशभर में बुजुर्गों से लेकर मध्यम आयु वर्ग के लाखों लोग गंभीर ऑस्टियोआर्थराइटिस और घुटनों के असहनीय दर्द से जूझ रहे हैं। दिल्ली, लखनऊ, मुंबई, जयपुर या पटना जैसे शहरों के बड़े अस्पतालों की ओपीडी में रोजाना आने वाले मरीजों की सबसे बड़ी चिंता सर्जरी के बाद होने वाला भयंकर दर्द, हफ्तों तक बिस्तर पर पड़े रहना और शरीर के भीतर मेटल यानी भारी धातु के इंप्लांट की स्वीकार्यता को लेकर होती थी। पारंपरिक घुटना प्रत्यारोपण में सर्जन को हाथों से हड्डियों की कटाई और अलाइनमेंट तय करना पड़ता था, जिसमें खून का रिसाव और मानवीय त्रुटि की थोड़ी बहुत आशंका बनी रहती थी। अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने ‘एक्टिव रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट’ के जरिए इस पूरी प्रक्रिया को बेहद सरल, सटीक और सुरक्षित बना दिया है।
एक्टिव रोबोटिक तकनीक में ऑर्थोपेडिक सर्जन की भूमिका एक कुशल कमांडर जैसी होती है, जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-प्रिसिजन रोबोटिक आर्म का पूरा सहयोग मिलता है। सर्जरी से पहले मरीज के घुटने का 3डी सीटी स्कैन किया जाता है, जिसके आधार पर सॉफ्टवेयर घुटने का एक डिजिटल मॉडल तैयार करता है। इस मॉडल के जरिए रोबोट यह पहले से तय कर लेता है कि मरीज की हड्डी के किस खराब हिस्से को किस कोण से तराशना है। पारंपरिक सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले बड़े-बड़े चीरों और जिग्स की तुलना में यह तकनीक उप-मिलीमीटर यानी बाल जितनी सटीकता के साथ केवल खराब कार्टिलेज को हटाती है। स्वस्थ हड्डियों और आसपास के संवेदनशील लिगामेंट्स को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचता, जिससे सर्जरी के दौरान नसों में खिंचाव या अनावश्यक रक्तस्राव लगभग शून्य हो जाता है।
पारंपरिक घुटना प्रत्यारोपण में भारी मेटल एलॉय के कारण कुछ मरीजों को एलर्जिक रिएक्शन, भारीपन या शरीर द्वारा इंप्लांट को अस्वीकार करने का डर रहता था। एक्टिव रोबोटिक युग में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक इंप्लांट्स में उच्च श्रेणी के बायो-कंपैटिबल मैटेरियल्स जैसे ऑक्सीडाइज्ड जिरकोनियम और मेडिकल-ग्रेड क्रॉस-लिंक्ड पॉलिमर का इस्तेमाल किया जाता है। ये सामग्रियां बेहद हल्की, चिकनी और घर्षण-मुक्त होती हैं। शरीर की प्राकृतिक संरचना के साथ इनका तालमेल इतना सटीक बैठता है कि मरीज को भीतर किसी बाहरी धातु के होने का अहसास तक नहीं होता। इस उन्नत तकनीक से प्रत्यारोपित किए गए घुटनों की कार्यक्षमता 25 से 30 वर्षों तक आसानी से बनी रहती है, जिससे दोबारा सर्जरी कराने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
इस आधुनिक प्रक्रिया का सबसे बड़ा चमत्कार इसका रिकवरी टाइम है। चूंकि एक्टिव रोबोटिक आर्म केवल प्रभावित हिस्से पर ही काम करती है और मांसपेशियों को काटा नहीं जाता, बल्कि धीरे से हटाकर काम किया जाता है, इसलिए ऑपरेशन के बाद होने वाला दर्द न के बराबर होता है। पारंपरिक सर्जरी के बाद जहां मरीज को हफ्तों तक फिजियोथेरेपिस्ट के सहारे दर्द झेलना पड़ता था, वहीं इस रोबोटिक तकनीक से ऑपरेशन के महज 4 से 6 घंटे बाद ही मरीज को वॉकर के सहारे खड़ा कर दिया जाता है। अस्पताल में मरीज को केवल 24 से 48 घंटे रुकना पड़ता है और वह खुद चलकर सीढ़ियां चढ़ने तथा बिना किसी सहारे के अपनी दैनिक दिनचर्या शुरू करने में सक्षम हो जाता है।
एक्टिव रोबोटिक सर्जरी उन सभी मरीजों के लिए आदर्श विकल्प बनकर उभरी है जो डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या मोटापे जैसी अन्य जटिल बीमारियों से ग्रस्त हैं और पारंपरिक सर्जरी का जोखिम नहीं लेना चाहते। यह तकनीक आंशिक यानी पार्शियल नी रिप्लेसमेंट में भी अद्भुत परिणाम देती है, जहां पूरे घुटने को बदले बिना केवल खराब हिस्से को नया जीवन दिया जा सकता है। इसके अलावा जिन मरीजों के घुटने गंभीर रूप से मुड़ चुके हैं या जो पुरानी सर्जरी के असफल होने के बाद रिवीजन सर्जरी के लिए आते हैं, उनके लिए रोबोटिक अलाइनमेंट एक वरदान साबित हो रहा है।
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