
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी शिकस्त के बाद अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदरूनी हालात पूरी तरह से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। सत्ता से बाहर होते ही पार्टी के भीतर से बगावत और विरोध के सुर खुलकर सामने आने लगे हैं। इसी कड़ी में टीएमसी के उलुबेरिया पूर्व से विधायक रिताब्रता बंदो (Ritabrata Banerjee) ने अपनी ही पार्टी और चुनावी रणनीति बनाने वाली मशहूर एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे बंगाल की राजनीति में हड़कंप मच गया है।
‘मैं भ्रष्टाचार का बोझ लेकर नहीं घूमूंगा’ – विधायक रिताब्रता बंदो
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधायक रिताब्रता बंदो ने पार्टी नेतृत्व को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “मैं 15 दिन का समय लूंगा, लेकिन इस भ्रष्टाचार का बोझ मैं अब और ढोकर नहीं फिरूंगा। उलूबेरिया में आवास योजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ है और कई फर्जी घर बनाए गए हैं। जब मैंने इस बारे में पार्टी को जानकारी दी, तो मुझे साफ तौर पर चुप रहने के लिए कह दिया गया था।”
विधायक ने आगे कहा कि वह अब किसी भी ‘बेईमान’ शख्स के साथ काम नहीं करेंगे। उन्होंने ऐलान किया, “मैं अब उलूबेरिया नगरपालिका में नहीं बैठूंगा, बल्कि जो ईमानदार पार्षद हैं, उनके टूटे हुए दफ्तर में ही बैठूंगा।”
चुनावी रणनीतिकार एजेंसी I-PAC पर भी दागे गंभीर सवाल
विधायक रिताब्रता का गुस्सा सिर्फ पार्टी नेताओं पर ही नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति देखने वाली एजेंसी आई-पैक (I-PAC) पर भी फूटा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आई-पैक की तरफ से भी उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने की सलाह दी गई थी।
विधायक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, “आई-पैक के बड़े-बड़े बाबुओं से बात करने के लिए किसी तीर्थ की तरह लगातार इंतजार में बैठे रहना पड़ता था। उन्होंने ही मुझसे कहा था कि चुनाव के वक्त भ्रष्टाचार को लेकर कोई बात न करें, वरना मुश्किल खड़ी हो जाएगी। बाद में मुझसे यह भी कहा गया कि स्थानीय लोगों को लेकर तो बात की जा सकती है, लेकिन उससे ऊपर के स्तर के लोगों के खिलाफ कोई बात नहीं होगी।”
TMC के पहले बड़े प्रदर्शन से गायब रहे आधे से ज्यादा विधायक, बढ़ीं धड़कनें
इस अंदरूनी कलह का सीधा असर सड़कों पर भी देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस ने बुधवार को अपना पहला बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। विधानसभा परिसर में बीआर अंबेडकर की प्रतिमा के सामने यह धरना राज्य में हुई कथित हिंसा, लोगों को हटाए जाने के अभियान और बुलडोज़र की कार्रवाई के खिलाफ था।
लेकिन यह प्रदर्शन अपनी मांगों से ज्यादा पार्टी विधायकों की गुटबाजी के कारण चर्चा में आ गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से मात्र 35 विधायक ही इस धरने में शामिल होने पहुंचे, जबकि 45 विधायक इस पूरे कार्यक्रम से गायब रहे। 15 साल बाद सत्ता से बेदखल होकर विपक्ष की बेंच पर बैठी टीएमसी के अंदर की यह छटपटाहट अब खुलकर सामने आ रही है। हालांकि, इस धरने में शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कुणाल घोष और नयना बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
कालीघाट की बैठक के अगले ही दिन बिखराव!
पार्टी विधायकों की यह गैरमौजूदगी इसलिए भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि इसके ठीक एक दिन पहले ही दक्षिण कोलकाता के कालीघाट में टीएमसी की एक हाई-लेवल मीटिंग हुई थी। इस बैठक में सभी नेताओं ने एकजुट होकर फिर से सड़कों पर उतरकर आक्रामक राजनीति करने का संकल्प लिया था, लेकिन अगले ही दिन आधे से ज्यादा विधायकों ने इस प्रदर्शन से दूरी बना ली।
पार्टी ने मतभेद से किया इनकार, दी ये सफाई
इस पूरे मामले पर विपक्ष के नेता पद के उम्मीदवार और टीएमसी के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने पार्टी में किसी भी तरह के मतभेद या गुटबाजी से साफ इनकार किया है।
विधायकों की कम संख्या पर सफाई पेश करते हुए उन्होंने कहा, “आज के कार्यक्रम में करीब 35 विधायक ही पहुंच पाए, क्योंकि कई विधायक चुनाव के बाद अपने-अपने इलाकों में हुई हिंसा से प्रभावित कार्यकर्ताओं की मदद में व्यस्त हैं। इसके अलावा यह कार्यक्रम महज एक दिन के शॉर्ट नोटिस पर रखा गया था, जिसकी वजह से सुदूर और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले विधायकों के लिए इतनी जल्दी कोलकाता पहुंचना मुमकिन नहीं था।”
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