
देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों और वेतनभोगी नागरिकों के लिए अपने आशियाने, कार या बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए लिया गया बैंक लोन मासिक घरेलू बजट का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। ऐसे में केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की आगामी समीक्षा बैठकों को लेकर वित्तीय गलियारों से जो संकेत छनकर आ रहे हैं, वे आम कर्जदारों (Borrowers) के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने वाले हैं। देश-विदेश की अग्रणी वित्तीय रेटिंग एजेंसियों, निवेश बैंकों और प्रमुख अर्थशास्त्रियों (Economists) का मानना है कि महंगाई (Inflation) की लगातार बनी हुई तपिश, खाद्य वस्तुओं के दामों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनावों के बीच रिजर्व बैंक अपनी उदारवादी या तटस्थ नीति को कड़ा कर सकता है। यदि केंद्रीय बैंक अपनी प्रमुख नीतिगत दर ‘रेपो रेट’ (Repo Rate) में बढ़ोतरी का फैसला करता है, तो वाणिज्यिक बैंकों द्वारा तुरंत अपने फ्लोटिंग लोन की ब्याज दरों को बढ़ा दिया जाएगा, जिसका सीधा और तात्कालिक असर आपकी जेब से हर महीने कटने वाली लोन ईएमआई (EMI) पर पड़ेगा।
वैश्विक और घरेलू वित्तीय बाजारों का बारीकी से विश्लेषण करने वाले शीर्ष अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पिछले कुछ तिमाहियों से ब्याज दरों में जो स्थिरता बनी हुई थी, उस पर अब ब्रेक लगने का जोखिम बढ़ रहा है।
आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने के लिए बन रहे मुख्य आर्थिक दबाव:
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खाद्य और कोर महंगाई का दबाव: मानसून के अंतिम दौर में मौसम के अप्रत्याशित बदलाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण फल, सब्जियों, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में लगातार अस्थिरता बनी हुई है। जब खाद्य महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो यह ‘कोर इन्फ्लेशन’ (Core Inflation) को भी भड़काती है, जिसे थामने के लिए केंद्रीय बैंकों के पास ब्याज दरें बढ़ाने के अलावा कोई सीधा हथियार नहीं होता।
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कच्चे तेल की कीमतें और रुपया-डॉलर समीकरण: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) की कीमतों में तेजी से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ता है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) को अनावश्यक गिरावट से बचाने और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के पलायन को रोकने के लिए ब्याज दरों में प्रतिस्पर्धी संतुलन बनाना जरूरी हो जाता है।
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ग्लोबल सेंट्रल बैंकों की नीतियां: अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) और यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) की ब्याज दरों को लेकर आक्रामक रणनीति के चलते वैश्विक तरलता (Global Liquidity) सख्त बनी हुई है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ब्याज दरों का अंतर कम होने से पूंजी निकासी का खतरा रहता है।
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बैंकिंग सिस्टम में क्रेडिट ग्रोथ बनाम डिपॉजिट ग्रोथ: वर्तमान में भारतीय बैंकों की लोन देने की रफ्तार (Credit Growth) उनके पास जमा होने वाले पैसों (Deposit Growth) से कहीं अधिक तेज है। बैंकों को फंड जुटाने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट की दरें बढ़ानी पड़ रही हैं, जिससे उनकी ‘फंड की लागत’ (Cost of Funds) बढ़ रही है और वे इसका भार अंततः कर्जदारों पर डालने के लिए विवश हैं।
अक्टूबर 2019 से पहले जब भी आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता था, तो बैंक अपनी ब्याज दरें बढ़ाने में कई महीने का समय लगाते थे। लेकिन अक्टूबर 2019 में रिजर्व बैंक ने सभी वाणिज्यिक बैंकों (जैसे SBI, HDFC, ICICI, PNB, BoB) के लिए ‘एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट’ (EBLR) की व्यवस्था अनिवार्य कर दी। अधिकांश बैंकों ने अपने फ्लोटिंग रेट लोन्स (विशेष रूप से होम लोन, कार लोन और एमएसएमई लोन) को सीधे आरबीआई के रेपो रेट से जोड़ दिया, जिसे ‘रेपो लिंक्ड लेंडिंग रेट’ (RLLR) कहा जाता है।
इस व्यवस्था का नियम बेहद स्पष्ट और क्रूर है:
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जैसे ही आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स (0.25%) या 50 बेसिस प्वाइंट्स (0.50%) की वृद्धि की घोषणा करती है, बैंकों का कंप्यूटर सिस्टम स्वचालित रूप से आपके लोन की ब्याज दर में ठीक उतनी ही बढ़ोतरी कर देता है।
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अधिकांश बैंकों में यह संशोधन घोषणा के अगले ही महीने की पहली तारीख से प्रभावी हो जाता है। इसका मतलब यह है कि नीतिगत दर बढ़ते ही कर्जदार को बिना किसी देरी के बढ़ी हुई दर पर भुगतान करना पड़ता है।
यदि अर्थशास्त्रियों के अनुमान के अनुसार आरबीआई अपनी ब्याज दरों में 25 से 50 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी करता है, तो 20 वर्ष (240 महीने) की अवधि के विभिन्न लोन स्लैब पर आपकी मासिक ईएमआई और कुल ब्याज पर कितना असर पड़ेगा, इसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| लोन की मूल राशि (20 वर्ष की अवधि) | वर्तमान ब्याज दर (8.50% p.a.) पर EMI | 0.25% बढ़ोतरी (8.75% p.a.) पर नई EMI | 0.50% बढ़ोतरी (9.00% p.a.) पर नई EMI | 0.50% वृद्धि पर कुल अतिरिक्त ब्याज (20 वर्ष में) |
| ₹30 लाख (₹30,00,000) | ₹26,035 / माह | ₹26,511 / माह (+₹476) | ₹26,992 / माह (+₹957) | ₹2,29,680 अतिरिक्त |
| ₹50 लाख (₹50,00,000) | ₹43,391 / माह | ₹44,186 / माह (+₹795) | ₹44,986 / माह (+₹1,595) | ₹3,82,800 अतिरिक्त |
| ₹75 लाख (₹75,00,000) | ₹65,087 / माह | ₹66,278 / माह (+₹1,191) | ₹67,480 / माह (+₹2,393) | ₹5,74,320 अतिरिक्त |
| ₹1 करोड़ (₹1,00,00,000) | ₹86,782 / माह | ₹88,371 / माह (+₹1,589) | ₹89,973 / माह (+₹3,191) | ₹7,65,840 अतिरिक्त |
नोट: यह गणना 240 महीनों के मानक परिशोधन (Standard Amortization) फॉर्मूले पर आधारित है। विभिन्न बैंकों के स्प्रेड और क्रेडिट स्कोर के आधार पर वास्तविक दरों में आंशिक भिन्नता हो सकती है।
जब भी ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो अधिकांश बैंक ग्राहकों की ईएमआई की राशि तुरंत नहीं बढ़ाते, बल्कि वे ग्राहक की सहमति या स्वचालित क्लॉज के तहत लोन की भुगतान अवधि (Tenure) को 1 से 3 साल तक आगे खिसका देते हैं। पहली नजर में ग्राहक को लगता है कि उसकी ईएमआई ₹43,391 ही कट रही है और उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन यह एक बहुत बड़ा वित्तीय भ्रम (Tenure Trap) होता है।
लोन की अवधि बढ़ने का खौफनाक पहलू:
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यदि 20 साल के लोन की अवधि बढ़कर 23 या 24 साल हो जाती है, तो आप अपने मूलधन से कहीं अधिक केवल ‘ब्याज’ बैंक को चुका रहे होते हैं।
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कई बार ब्याज दरें इतनी बढ़ जाती हैं कि मासिक ईएमआई उस महीने के ब्याज को भी कवर नहीं कर पाती, जिसे बैंकिंग की भाषा में ‘नेगेटिव अमॉर्टाइजेशन’ (Negative Amortization) कहा जाता है। इसमें हर महीने किस्त भरने के बावजूद आपका लोन कम होने के बजाय बढ़ने लगता है। इसलिए बैंक से आने वाले हर रीसेट लेटर को ध्यान से पढ़ें और जांचें कि आपकी अवधि कितनी बढ़ाई गई है।
होम लोन के अलावा अन्य खुदरा ऋणों पर भी इस बढ़ोतरी का बहुआयामी प्रभाव पड़ता है:
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कार और ऑटो लोन (Auto Loans): अधिकांश ऑटो लोन ‘फिक्स्ड रेट’ पर होते हैं, इसलिए जिन लोगों ने पहले से कार लोन ले रखा है, उनकी पुरानी ईएमआई पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि, जो लोग आगामी त्योहारी सीजन (नवरात्र और दीपावली) में नई कार या बाइक खरीदने की योजना बना रहे हैं, उन्हें अब 0.50% तक महंगी ब्याज दरों पर नया लोन मिलेगा।
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पर्सनल लोन और कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन: चूंकि पर्सनल लोन असुरक्षित (Unsecured) होते हैं, इसलिए बैंक जोखिम प्रीमियम जोड़कर इनकी ब्याज दरें तुरंत 11-12% से बढ़ाकर 12.5-13.5% तक कर देते हैं, जिससे शादी, इलाज या यात्रा के लिए लिया जाने वाला लोन महंगा हो जाएगा।
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क्रेडिट कार्ड और रिवॉल्विंग क्रेडिट: क्रेडिट कार्ड के रोलओवर इंटरेस्ट रेट्स पहले से ही 36% से 42% प्रति वर्ष के ऊंचे स्तर पर हैं। वित्तीय सख्ती के माहौल में बैंक ओवरड्यू चार्जेस और फाइनेंस चार्ज में और इजाफा कर सकते हैं।
रेपो रेट में बढ़ोतरी जहां कर्जदारों के लिए बुरी खबर होती है, वहीं देश के करोड़ों वरिष्ठ नागरिकों, पेंशनभोगियों और रूढ़िवादी निवेशकों के लिए यह एक चांदी की चमक लेकर आती है। जब बैंकों को फंड जुटाने की जरूरत होती है और आरबीआई अपनी नीतिगत दरें बढ़ाता है, तो बैंक अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और आवर्ती जमा (RD) की ब्याज दरों में तुरंत बढ़ोतरी करते हैं।
वरिष्ठ नागरिकों को बैंकों द्वारा सामान्य ग्राहकों से 0.50% अधिक ब्याज दिया जाता है। ऐसे में 1 से 3 साल की एफडी पर ब्याज दरें 7.75% से लेकर 8.25% प्रति वर्ष तक पहुंच सकती हैं। जो बुजुर्ग केवल बैंक ब्याज पर अपने घर का खर्च चलाते हैं, उन्हें अपनी मासिक ब्याज आय में स्पष्ट बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।
यदि आपके ऊपर होम लोन या कोई अन्य फ्लोटिंग लोन चल रहा है और आप बढ़ती ब्याज दरों के चक्रव्यूह से अपने पारिवारिक बजट को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो इन 5 व्यावहारिक रणनीतियों को तत्काल लागू करें:
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आंशिक प्री-पेमेंट (Partial Prepayment) करें: साल में मिलने वाले किसी भी बोनस, इंसेंटिव, टैक्स रिफंड या मैच्योरिटी फंड से हर साल अपने मूलधन (Principal) का कम से कम 5% एकमुश्त जमा करें। 20 साल के लोन में यदि आप शुरुआत में ₹2 लाख का भी प्री-पेमेंट कर देते हैं, तो आपके लोन की अवधि सीधे 2 से 3 साल कम हो जाती है और लाखों रुपये का ब्याज बच जाता है।
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अवधि बढ़ाने के बजाय ईएमआई बढ़ाने का विकल्प चुनें: जब बैंक आपकी ब्याज दर बढ़ाए, तो बैंक को लिखित आवेदन देकर कहें कि वे आपके लोन की अवधि (Tenure) न बढ़ाएं, बल्कि आपकी मासिक ईएमआई में ₹1,000 या ₹1,500 का इजाफा कर दें। छोटी सी अतिरिक्त ईएमआई आपको लाखों रुपये के अतिरिक्त ब्याज के चक्रव्यूह से बचा लेगी।
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होम लोन बैलेंस ट्रांसफर (Balance Transfer) की संभावना तलाशें: अपने मौजूदा बैंक की तुलना अन्य सार्वजनिक व निजी बैंकों की चालू दरों से करें। यदि कोई अन्य बैंक आपको 0.40% से 0.60% तक सस्ती ब्याज दर की पेशकश कर रहा है, तो मामूली प्रोसेसिंग फीस चुकाकर अपने लोन को दूसरे बैंक में ट्रांसफर कराने पर विचार करें।
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क्रेडिट स्कोर (CIBIL Score) को 750+ बनाए रखें: आज के दौर में बैंक जोखिम-आधारित मूल्य निर्धारण (Risk-Based Pricing) अपनाते हैं। जिन ग्राहकों का सिबिल स्कोर 800 से ऊपर होता है, उन्हें बैंक सामान्य दरों से 0.25% से 0.35% तक कम ब्याज दर (कन्सेशन) पर लोन ऑफर करते हैं। अपने क्रेडिट कार्ड के बिल और अन्य देनदारियों को समय पर चुकाकर अपना स्कोर मजबूत रखें।
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होम लोन ओवरड्राफ्ट (Maxgain / Advantage) खाता लें: यदि आपका बैंक सुविधा देता है, तो अपने सामान्य होम लोन को ‘ओवरड्राफ्ट लिंक्ड होम लोन’ में बदलवा लें। इसमें आप अपनी बचत खाते की अतिरिक्त नकदी होम लोन खाते में पार्क कर सकते हैं। जितने दिन वह अतिरिक्त पैसा उस खाते में रहेगा, उतने हिस्से पर बैंक ब्याज नहीं लेगा, और जरूरत पड़ने पर आप उस पैसे को कभी भी वापस निकाल सकते हैं।
आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक का अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो, अर्थशास्त्रियों के इन स्पष्ट आकलनों ने यह साफ कर दिया है कि सस्ते कर्ज का दौर अब ढलान पर है। वित्तीय रूप से सतर्क रहकर, समय पर प्री-पेमेंट की रणनीति अपनाकर और अपने लोन रीसेट पर पैनी नजर रखकर आप इस संभावित ब्याज वृद्धि के झटके से अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रख सकते हैं।
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