
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की बहुप्रतीक्षित मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आज यानी सोमवार, 5 अक्टूबर से औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। 5 से 7 अक्टूबर तक चलने वाले इस उच्चस्तरीय आर्थिक मंथन में देश के मैक्रोइकॉनॉमिक हालात, खुदरा महंगाई दर, खाद्य उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक ऊर्जा संकट और रुपये की विनिमय दर जैसे संवेदनशील वित्तीय पैमानों की गहन समीक्षा की जाएगी। तीन दिनों तक चलने वाली सघन चर्चा और वोटिंग के बाद समिति द्वारा लिए गए नीतिगत फैसलों का आधिकारिक ऐलान 7 अक्टूबर की सुबह किया जाएगा। देश के करोड़ों बैंक खाताधारकों, होम लोन और ऑटो लोन की किस्तें भर रहे आम मध्यमवर्गीय परिवारों, उद्योग जगत और शेयर बाजार के निवेशकों की नजरें इस बैठक के नतीजों पर टिकी हुई हैं। बाजार में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या केंद्रीय बैंक लगातार पांचवीं बार नीतिगत रेपो रेट को अपरिवर्तित रखकर यथास्थिति (Status Quo) बरकरार रखेगा, या फिर महंगाई के बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का सख्त कदम उठाएगा।
मौद्रिक नीति की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछली चार लगातार नीतिगत बैठकों में नीतिगत रेपो दर को बिना किसी बदलाव के स्थिर बनाए रखा है। अब यह पांचवीं लगातार बैठक है जहां दरों पर फैसला होना है। वर्तमान में वित्तीय विश्लेषक और अर्थशास्त्री दो प्रमुख खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं। कई प्रमुख रेटिंग एजेंसियों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, क्रूड ऑयल और ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता तथा हाल के महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) के चलते हेडलाइन महंगाई दर में आई तेजी को देखते हुए केंद्रीय बैंक पर नीतिगत सख्ती का दबाव काफी बढ़ चुका है। कुछ विशेषज्ञों का आधारभूत अनुमान (Base Case) यह है कि आरबीआई महंगाई की उम्मीदों को काबू में रखने के लिए रेपो रेट को 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर एक सख्त संदेश दे सकता है। वहीं दूसरी ओर, विश्लेषकों का एक मजबूत तबका यह तर्क दे रहा है कि चूंकि देश में त्योहारी सीजन का पीक दौर शुरू हो चुका है, ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाने से रिटेल, ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट सेक्टर की क्रेडिट डिमांड पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास की रफ्तार (GDP Growth) को सहारा देने के लिए लगातार पांचवीं बार भी रेपो रेट को ‘जस का तस’ बनाए रखने का सुरक्षित रास्ता चुन सकता है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती खाद्य महंगाई की अनिश्चितता से निपटना है। यद्यपि कोर इन्फ्लेशन यानी गैर-खाद्य और गैर-ईंधन मुद्रास्फीति काफी हद तक नियंत्रण में रही है, लेकिन दालों, खाद्य तेलों और हरी सब्जियों की कीमतों में समय-समय पर आने वाले उछाल ने आम आदमी के घरेलू बजट को प्रभावित किया है। खाद्य पदार्थों की यह महंगाई यदि लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह वेतन और सेवा लागतों में भी दूसरी लहर के रूप में फैल सकती है (Second-round effects)। इसके अलावा, मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्षों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री रास्तों पर तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल और एलएनजी के दामों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की स्थिरता बनाए रखना और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के पूंजी प्रवाह को घरेलू बाजार में टिकाए रखना भी मौद्रिक समिति की प्राथमिकताओं में शामिल है। इन तमाम वैश्विक और घरेलू कारकों को संतुलित करने के लिए समिति को बहुत सोच-समझकर नीतिगत रुख (Monetary Policy Stance) तय करना होगा।
आम करदाताओं और कर्जदारों के लिए रेपो रेट केवल एक तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनकी मासिक ईएमआई (EMI) और घरेलू बचत को प्रभावित करने वाला पैमाना है। यदि रिजर्व बैंक रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट का इजाफा करता है, तो देश के सभी प्रमुख वाणिज्यिक बैंक जैसे एसबीआई, पीएनबी, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक अपनी एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) में तत्काल वृद्धि कर देंगे। इसका सीधा असर यह होगा कि फ्लोटिंग रेट पर लिए गए होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें महंगी हो जाएंगी, जिससे कर्जदारों की मासिक किस्त बढ़ जाएगी या उनके लोन की पुनर्भुगतान अवधि लंबी हो जाएगी। इसके विपरीत, यदि एमपीसी पांचवीं बार भी ब्याज दरों को स्थिर रखने का निर्णय लेती है, तो मौजूदा कर्जदारों को बड़ी राहत मिलेगी और उनकी मासिक ईएमआई में कोई बदलाव नहीं होगा। साथ ही, बैंकों द्वारा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर दी जा रही मौजूदा आकर्षक ब्याज दरें भी स्थिर बनी रहेंगी, जिससे वरिष्ठ नागरिकों और सुरक्षित रिटर्न चाहने वाले जमाकर्ताओं को अपनी बचत पर अच्छा मुनाफा मिलता रहेगा।
अक्टूबर की यह मौद्रिक समीक्षा बैठक ऐसे समय में हो रही है जब देश भर में नवरात्रि, दशहरा और दिवाली का त्योहारी उपभोग अपने चरम पर पहुंचने वाला है। भारतीय अर्थव्यवस्था में त्योहारी सीजन के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। वाहन कंपनियां, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता और रियल एस्टेट डेवलपर्स इस दौरान अपनी बिक्री का एक बड़ा हिस्सा हासिल करते हैं। यदि इस महत्वपूर्ण मोड़ पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी जाती है, तो मध्यम वर्ग के उपभोक्ता महंगे कर्ज के डर से बड़े खर्च या नए घर की खरीद को टाल सकते हैं, जिससे त्योहारी मांग की गति धीमी पड़ने का जोखिम रहेगा। यही कारण है कि इंडस्ट्री चैंबर्स और विनिर्माण संगठनों की ओर से लगातार यह मांग की जा रही है कि आरबीआई कम से कम इस तिमाही में दरों को यथावत रखे ताकि बाजार में लिक्विडिटी और क्रेडिट ग्रोथ की रफ्तार बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
तीन दिनों तक चलने वाले इस उच्चस्तरीय विचार-मंथन के बाद 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक के गवर्नर प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए समिति के फैसलों, मुद्रास्फीति के संशोधित अनुमानों और चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी विकास दर के आधिकारिक प्रक्षेपण जारी करेंगे। इसके साथ ही वित्तीय विश्लेषक गवर्नर के वक्तव्य की बारीकियों और केंद्रीय बैंक के ‘रुख’ पर करीबी नजर रखेंगे कि क्या आरबीआई आने वाले महीनों में सख्त मौद्रिक नीति की ओर झुकेगा या फिर न्यूट्रल रुख अपनाते हुए भविष्य में राहत के संकेत देगा। यदि एमपीसी दरों को यथावत रखती है, तो यह त्योहारी अर्थव्यवस्था के लिए बूस्टर डोज साबित होगा, और यदि किसी भी प्रकार का इजाफा होता है, तो वह महंगाई के खिलाफ केंद्रीय बैंक की कड़ी लड़ाई का स्पष्ट संकेत होगा। देश के हर वित्तीय क्षेत्र, कॉरपोरेट जगत और आम नागरिक की आंखें अब 7 अक्टूबर की सुबह होने वाले अंतिम नीतिगत ऐलान पर टिकी हुई हैं।
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