
अपनी संजीदा एक्टिंग और सादगी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले बॉलीवुड अभिनेता पंकज त्रिपाठी इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने एक हालिया इंटरव्यू को लेकर जबरदस्त चर्चा में हैं। एक मशहूर यूट्यूब चैनल के पॉडकास्ट में शामिल हुए पंकज त्रिपाठी ने अपने जीवन के नए-पुराने अनुभवों, संघर्ष के दिनों और आधुनिक जीवनशैली पर बेहद बेबाकी से अपने विचार साझा किए। बातचीत के दौरान अभिनेता ने यहां तक कह दिया कि वह इंसान नहीं, बल्कि एक ‘पेड़’ बनना चाहते हैं, क्योंकि प्रकृति में कोई बनावटी परफेक्शन नहीं होता; उसकी टेढ़ी-मेढ़ी डालियां भी बेहद खूबसूरत लगती हैं।
दिल्ली आते ही लगा था तगड़ा ‘कल्चरल शॉक’
अपने पुराने दिनों को याद करते हुए पंकज त्रिपाठी ने बताया कि जब वह साल 2001 में बिहार से देश की राजधानी दिल्ली आए और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लिया, तो उन्हें शुरुआत में एक बड़ा सांस्कृतिक झटका (Cultural Shock) लगा था।
अभिनेता ने हंसते हुए बताया, “जब मैं दिल्ली आया, तो मैंने पहली बार लड़कियों को खुलेआम सिगरेट पीते देखा। उस वक्त मेरे मन में पहला ख्याल आया कि ‘ये कैसी लड़कियां हैं?’ इसके बाद मैंने करीब 10-15 दिनों तक इस बात पर गहरा आत्ममंथन किया। फिर मुझे समझ आया कि मैं लड़कों को भी तो सिगरेट पीते देख रहा हूं, तब तो मेरा दिमाग रिएक्ट नहीं करता। नुकसान तो सिगरेट पीने से दोनों का बराबर ही होगा, ऐसा तो नहीं है कि लड़की को ज्यादा नुकसान होगा।” पंकज ने माना कि साहित्य पढ़ने की वजह से उनकी समझ जरूर विकसित हुई थी, लेकिन शुरुआत में वह इस बात को पचा नहीं पाए थे।
अंग्रेजी नहीं बोलने पर लोगों ने समझ लिया था ‘गरीब’
पंकज त्रिपाठी ने बताया कि दिल्ली में उनके हिंदी बैकग्राउंड और अंग्रेजी न बोल पाने की वजह से लोगों ने उन्हें बहुत जल्दी जज कर लिया था। उन्होंने कहा, “हमारे समाज में लोगों की यह सोच बन चुकी है कि अगर कोई व्यक्ति फटाफट अंग्रेजी नहीं बोल पा रहा है, तो वह जरूर किसी बेहद गरीब या पिछड़े बैकग्राउंड से आता है। लोग आपकी भाषा के आधार पर आपकी बुद्धिमत्ता और क्षमता का आकलन करने लगते हैं, जबकि हकीकत यह है कि भाषा और काबिलियत का आपस में कोई लेना-देना नहीं है।”
हीनभावना पर पंकज त्रिपाठी का करारा जवाब
इस भाषाई भेदभाव और जजमेंटल माहौल से निपटने को लेकर पंकज त्रिपाठी ने युवाओं को एक बेहद काम की सलाह दी। उन्होंने कहा, “ऐसी परिस्थितियों से बाहर निकलने के दो ही तरीके होते हैं—या तो आप दूसरों की बातें सुनकर इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स (हीनभावना) के शिकार हो जाओ, या फिर खुद को इन सब चीजों से ऊपर उठा लो। शुक्र है कि मेरे भीतर कभी हीनता का भाव नहीं आया। मुझे हमेशा से लगता था कि मेरा व्यक्तित्व अपने आप में एकदम शानदार है और जिसे यह समझ नहीं आता, यह उसकी समस्या है, मेरी नहीं।”
‘मुझे मोबाइल से भयंकर नफरत है…’
आजकल के डिजिटल दौर और सोशल मीडिया की लत पर पंकज त्रिपाठी ने गहरी चिंता जताई। उन्होंने जेन-जी (Gen-Z) यानी आज की युवा पीढ़ी की अंग्रेजी पर तंज कसते हुए कहा कि अब बातचीत के वाक्य इतने छोटे हो गए हैं कि वे खत्म होने की कगार पर हैं।
मोबाइल के प्रति अपनी चिढ़ जाहिर करते हुए अभिनेता बोले, “मुझे मोबाइल फोन से भयंकर नफरत है। आज के समय में इस तकनीक का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अगर मेरा वश चले, तो मैं पूरी दुनिया को मोबाइल मुक्त घोषित कर दूं।” उन्होंने लोगों से अपील की कि जीवन में असली आनंद पाने के लिए मोबाइल की स्क्रीन देखने के बजाय किताबों के 10 पेज पढ़ें, रोजाना 15-20 मिनट हरी घास पर नंगे पैर घूमें और पेड़-पौधों को निहारें। उन्होंने साफ कहा कि पैसे की अंधी दौड़ क्षणिक है, असली सुकून प्रकृति के करीब रहने में ही है।
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