
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसकी कल्पना शायद कुछ साल पहले तक किसी ने नहीं की होगी। राज्य की सत्ता से 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी के सुर अब बदले-बदले नजर आ रहे हैं। विधानसभा चुनाव की तपिश और भाजपा के बढ़ते जनाधार के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए ममता ने अब वामदलों और यहां तक कि धुर-वामपंथियों (Extremists) से भी साथ आने की अपील की है।
कभी वामपंथ की धुर विरोधी थीं ममता, अब क्यों दिख रही है ‘दोस्ती’?
ममता बनर्जी की पूरी राजनीतिक यात्रा ही वामपंथ के कड़े विरोध पर टिकी है। 70 और 80 के दशक में जब बंगाल में लाल झंडे का बोलबाला था, तब ममता एक जुझारू युवा चेहरा बनकर उभरी थीं। 2011 में जब उन्होंने ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार को सत्ता से बाहर किया, तो उन्होंने प्रण लिया था कि वह बंगाल से वामपंथ का नामोनिशान मिटा देंगी। लेकिन आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि भाजपा को मात देने के लिए उन्हें वही ‘लाल किला’ याद आ रहा है जिसे उन्होंने खुद ढहाया था।
सिंगूर और नंदीग्राम से शुरू हुआ था संघर्ष का सफर
ममता बनर्जी ने अपनी पहचान सड़क पर संघर्ष करने वाली नेता के तौर पर बनाई थी। 2006-2008 के बीच सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण आंदोलन और नंदीग्राम की पुलिस फायरिंग ने ममता को जनमानस का मसीहा बना दिया था। उन्होंने वामपंथ के उस ‘सर्वहारा’ वोटर को अपनी ओर खींच लिया था जो माकपा का पारंपरिक आधार था। लेकिन पिछले एक दशक में बंगाल का सियासी समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। वामदल अब हाशिए पर हैं और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में मजबूती से खड़ी है।
रणनीति या मजबूरी: क्या ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ बनेगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी को इस बात का अहसास हो गया है कि मतों का बिखराव अंततः भाजपा के पक्ष में जाता है। हालिया संकेतों में ममता ने साफ कहा है कि यदि देश को बचाना है और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना है, तो सभी गैर-भाजपाई ताकतों को एक मंच पर आना होगा। इसमें ‘वाम’ और ‘धुर वामपंथी’ विचारधारा वाले समूहों का जिक्र करना यह दर्शाता है कि ममता भाजपा के खिलाफ एक विशाल गठबंधन तैयार करना चाहती हैं।
जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच कैसे होगा तालमेल?
भले ही शीर्ष नेतृत्व हाथ मिलाने की बात कर रहा हो, लेकिन बंगाल के गांवों में आज भी टीएमसी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास है। माकपा के कई नेता आज भी ममता बनर्जी पर ही भाजपा को बंगाल में एंट्री देने का आरोप लगाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या धुर विरोधी विचारधारा वाले कार्यकर्ता एक-दूसरे को स्वीकार कर पाएंगे? अगर 2026 की दहलीज पर ‘तृणमूल’ और ‘लाल सितारा’ एक ही झंडे के नीचे आते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे विरोधाभासी लेकिन दिलचस्प गठबंधन होगा।
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