ITR Filing 2026: फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर भी नजर रखता है इनकम टैक्स विभाग; निवेश करने से पहले समझ लें TDS और टैक्स का यह जरूरी नियम

भारत में जब भी सुरक्षित निवेश और गारंटीड रिटर्न की बात आती है, तो मध्यम वर्ग के परिवारों के दिमाग में सबसे पहला नाम फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी (FD) का ही आता है। चाहे नौकरीपेशा लोग हों, अपनी रिटायरमेंट की पूंजी संभालने वाले बुजुर्ग हों या फिर बहुत कम रिस्क लेने वाले नए निवेशक— हर कोई बैंक में एफडी कराना सबसे बेहतर समझता है। सुरक्षित होने के मामले में तो एफडी नंबर वन है, लेकिन एक बात जो बहुत से लोग भूल जाते हैं या नजरअंदाज कर देते हैं, वो यह है कि FD से मिलने वाला पूरा ब्याज टैक्स-फ्री नहीं होता है।

अक्सर सही जानकारी न होने की वजह से लोग अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरते समय बड़ी गलती कर बैठते हैं, जिसके कारण बाद में उन्हें इनकम टैक्स विभाग की तरफ से नोटिस, भारी टैक्स और पेनाल्टी (जुर्माना) दोनों का सामना करना पड़ता है। आइए बेहद सरल शब्दों में समझते हैं कि आपकी एफडी के ब्याज पर टैक्स कैसे लगता है और आप इसे कैसे बचा सकते हैं।

आपकी कमाई में कहां जुड़ता है FD का ब्याज?

टैक्स के नियमों के मुताबिक, बैंक या पोस्ट ऑफिस की एफडी से मिलने वाले ब्याज को आपकी नियमित सैलरी का हिस्सा नहीं माना जाता। बल्कि इसे ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज’ (Income from Other Sources – अन्य स्रोतों से आय) के तहत गिना जाता है।

इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि सालभर में आपकी एफडी से जो भी ब्याज बनेगा, वह आपकी कुल सालाना कमाई में जोड़ दिया जाएगा। इसके बाद आप जिस भी टैक्स स्लैब (जैसे 10%, 20% या 30%) में आते हैं, उसी हिसाब से आपको उस ब्याज पर भी टैक्स देना होगा।

एक छोटे से उदाहरण से समझिए:

मान लीजिए आप किसी कंपनी में काम करते हैं और आपकी सालाना सैलरी 9 लाख रुपये है। इसके अलावा आपने बैंक में जो एफडी कराई है, उससे आपको सालभर में 80 हजार रुपये का ब्याज मिला है। ऐसे में इनकम टैक्स विभाग आपकी कुल टैक्सेबल आय 9 लाख रुपये नहीं, बल्कि दोनों को जोड़कर 9.80 लाख रुपये मानेगा।

बैंक कब और कितना काटता है TDS?

बहुत से लोगों को लगता है कि जब तक वे अपनी एफडी को तोड़ेंगे नहीं या उसका पैसा हाथ में नहीं आएगा, तब तक टैक्स नहीं लगेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। बैंक हर साल आपके खाते में क्रेडिट होने वाले ब्याज पर नजर रखता है। यदि एक वित्त वर्ष में आपका कुल ब्याज एक तय सीमा को पार कर जाता है, तो बैंक खुद ही TDS (Tax Deducted at Source) काट लेता है।

नीचे दी गई तालिका से समझें कि आपके लिए टीडीएस की लिमिट क्या है:

ग्राहक की श्रेणी सालाना ब्याज की तय सीमा (TDS Limit) पैन (PAN) अपडेट होने पर TDS दर पैन (PAN) अपडेट न होने पर TDS दर
सामान्य ग्राहक (Regular Citizens) ₹50,000 10% 20% या उससे अधिक
वरिष्ठ नागरिक (Senior Citizens) ₹1,000,000 10% 20% या उससे अधिक

पैन कार्ड है सबसे जरूरी: अगर आपने अपने बैंक अकाउंट के साथ अपना पैन कार्ड (PAN) लिंक कर रखा है, तो बैंक केवल 10% की दर से टीडीएस काटेगा। लेकिन अगर बैंक के पास आपका पैन कार्ड अपडेट नहीं है, तो बैंक सीधे 20% या उससे भी ज्यादा का भारी-भरकम टीडीएस काट सकता है।

सबसे बड़ा भ्रम: “टीडीएस कट गया, तो अब टैक्स की कोई चिंता नहीं!”

यह देश के करोड़ों टैक्सपेयर्स के बीच फैला सबसे बड़ा और खतरनाक भ्रम है। लोग सोचते हैं कि चूंकि बैंक ने पहले ही 10% टीडीएस काट लिया है, इसलिए अब उनकी जिम्मेदारी खत्म हो गई। लेकिन यह सच नहीं है।

अगर आपकी कुल सालाना आय इतनी ज्यादा है कि आप 20% या 30% वाले ऊंचे टैक्स स्लैब के दायरे में आते हैं, तो बैंक द्वारा काटा गया 10% टीडीएस नाकाफी है। बची हुई टैक्स की रकम (यानी अतिरिक्त 10% या 20%) आपको खुद अपनी जेब से आईटीआर (ITR) फाइल करते समय ‘Self Assessment Tax’ के रूप में चुकानी होगी।

टीडीएस कटने से कैसे बचाएं अपना पैसा?

अगर आपकी कुल सालाना आय (सैलरी, बिजनेस और ब्याज सब मिलाकर) इतनी कम है कि आप पर कोई इनकम टैक्स नहीं बनता, तो आप बैंक को टीडीएस काटने से रोक सकते हैं। इसके लिए आपको वित्त वर्ष की शुरुआत में ही बैंक में एक फॉर्म भरकर जमा करना होता है:

  • सामान्य नागरिकों के लिए: फॉर्म 15G (Form 15G)

  • वरिष्ठ नागरिकों के लिए: फॉर्म 15H (Form 15H)

    यह फॉर्म जमा करने के बाद बैंक आपकी ब्याज की कमाई पर कोई टीडीएस नहीं काटेगा।

एफडी पर टैक्स बचाने के कुछ स्मार्ट तरीके

अगर आप अपनी एफडी की कमाई को टैक्स की मार से बचाना चाहते हैं, तो इन दो बेहतरीन तरीकों को अपना सकते हैं:

  • 5 साल वाली Tax Saver FD: आप किसी भी सरकारी या प्राइवेट बैंक में 5 साल की अवधि वाली ‘टैक्स सेवर एफडी’ करा सकते हैं। इसमें आपको इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख तक की टैक्स छूट का लाभ मिलता है। हालांकि, ध्यान रहे कि इसमें 5 साल का लॉक-इन पीरियड होता है, यानी आप जरूरत पड़ने पर भी 5 साल से पहले इस पैसे को नहीं निकाल सकते।

  • अलग-अलग बैंकों में निवेश बांटना: कुछ समझदार निवेशक टीडीएस की ₹50,000 वाली सीमा को मैनेज करने के लिए अपनी पूरी रकम एक ही बैंक में रखने की बजाय उसे दो या तीन अलग-अलग बैंकों की एफडी में बांट देते हैं, ताकि किसी भी एक बैंक में उनका सालाना ब्याज तय सीमा से ऊपर न जाए।

चलते-चलते एक जरूरी सलाह: फिक्स्ड डिपॉजिट में पैसा लगाना सुरक्षित जरूर है, लेकिन जब आप इसमें से लगने वाले टैक्स और देश की महंगाई दर (Inflation) को घटाकर देखते हैं, तो आपका असली मुनाफा (Post-Tax Return) बहुत कम रह जाता है। विशेषकर उन लोगों के लिए जो ऊंचे टैक्स स्लैब में आते हैं, एफडी का वास्तविक रिटर्न कभी-कभी उम्मीद से बेहद कम होता है। इसलिए निवेश करने से पहले सिर्फ ब्याज की ऊंची दरें न देखें, बल्कि अपनी जेब पर पड़ने वाले टैक्स के असर को भी अच्छी तरह समझ लें।