यूपी पंचायत चुनाव से पहले नई मुसीबत, कार्ययोजना अपलोड न होने से विकास कार्य ठप

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से ठीक पहले ग्रामीण विकास कार्यों को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सूबे में ग्राम प्रधानों का पांच साल का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद, गांवों में विकास कार्य न रुकें, इसके लिए सरकार ने उन्हें ‘प्रशासक’ (Administrator) नियुक्त कर कामकाज संभालने का जिम्मा तो सौंप दिया है। लेकिन, तकनीकी और प्रशासनिक उलझनों के कारण धरातल पर काम शुरू नहीं हो पा रहा है।

सबसे बड़ी समस्या यह सामने आई है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बनाई गई नई विकास कार्ययोजना (Action Plan) अभी तक सरकारी पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पा रही है। बिना कार्ययोजना अपलोड हुए पंचायतों में किसी भी नए काम को मंजूरी और बजट मिलना नामुमकिन है। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर प्रशासक बने प्रधान जी गांवों का विकास कैसे करेंगे?

मार्च में ऑफलाइन तैयार हुई थी योजना, पोर्टल हुआ ‘ठप’

नियमों के मुताबिक, पंचायती राज विभाग की ओर से यह अनिवार्य किया गया है कि ग्राम पंचायतें अपनी कार्ययोजना तैयार करने के बाद उसे ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करेंगी, जिसके बाद ही प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिलती है। चालू वित्तीय वर्ष (2026-27) की कार्ययोजना को मार्च महीने में ही ऑफलाइन तरीके से बैठक करके तैयार कर लिया गया था।

लेकिन इसके बाद पोर्टल पर तकनीकी दिक्कतें आने या काम न होने के कारण इसे ऑनलाइन फीड नहीं किया जा सका। 26 मई को प्रधानों का मूल कार्यकाल समाप्त हुआ और वे प्रशासक बन गए, मगर अब बिना ऑनलाइन एंट्री के उनके हाथ पूरी तरह बंधे हुए हैं।

फिलहाल सिर्फ अधूरे और पुराने कामों के भरोसे पंचायतें

इस तकनीकी अड़चन के कारण वर्तमान में पंचायतों के सामने असमंजस की स्थिति बनी हुई है। जब तक शासन स्तर से नई कार्ययोजना को पोर्टल पर अपलोड करने की अनुमति या रास्ता नहीं खुलता, तब तक गांवों में कोई भी नया काम (जैसे नई नाली, खड़ंजा, या इंटरलॉकिंग) शुरू नहीं हो पाएगा।

ऐसी स्थिति में प्रशासक बने प्रधानों के पास केवल एक ही रास्ता बचा है कि वे पिछली कार्ययोजना के उन अधूरे कामों को ही पूरा करवाएं, जो किसी वजह से बीच में लटके हुए थे या जिनका बजट पहले से स्वीकृत था।

‘कामकाज रुकने न पाए, शासन जल्द निकाले हल’

ग्राम प्रधान संगठन के प्रदेश महामंत्री रवीन्द्र दीक्षित ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानों को प्रशासक बनाने का फैसला स्वागत योग्य है और वे जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं। लेकिन इसके लिए वर्तमान वित्तीय वर्ष की कार्ययोजना को अपलोड करने की सुचारू व्यवस्था तुरंत की जानी चाहिए। शासन को इस तकनीकी समस्या पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य पूरी तरह ठप न हो जाएं।

वहीं दूसरी तरफ, जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) रोहित कुमार ने भी पुष्टि की है कि कार्ययोजना अभी अपलोड नहीं हो सकी है। स्थानीय प्रशासन को अब इस मामले में शासन (लखनऊ) से आने वाले दिशा-निर्देशों का इंतजार है, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

10 जून को कानपुर मंडल के जनप्रतिनिधियों की बड़ी बैठक

इस गतिरोध और पंचायतों की माली हालत को सुधारने के लिए पंचायती राज विभाग ने एक और बड़ा कदम उठाया है। विभाग ने छठे वित्त आयोग (6th Finance Commission) के संबंध में जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत (BDC) और ग्राम प्रधानों जैसे पंचायत प्रतिनिधियों से सीधे वार्ता करने का निर्णय लिया है।

शासन द्वारा जारी आधिकारिक कार्यक्रम के तहत आगामी 10 जून को कानपुर मंडल के सभी जनप्रतिनिधियों को लखनऊ बुलाया गया है। पंचायती राज विभाग के निदेशक की ओर से जारी पत्र के मुताबिक, इस बैठक में कार्ययोजना की समस्याओं के साथ-साथ निम्नलिखित सुधारात्मक सुझावों पर मंथन किया जाएगा:

  • पंचायतों में आय बढ़ाने के लिए नए टैक्स (कर) और शुल्क लगाने पर सुझाव।

  • पुराने नियमों में जरूरी संशोधन और बदलावों पर विचार।

  • ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आय के नए स्रोतों की पहचान करना।