
भारतीय आम आदमी की जेब पर एक बार फिर महंगाई की मार पड़ने वाली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगी आग ने घरेलू तेल कंपनियों की कमर तोड़ दी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियां वर्तमान में हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेल रही हैं। खाड़ी देशों में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने को बेताब हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कब तक कंपनियां और सरकार कीमतों को स्थिर रख पाएंगी?
तेल कंपनियों का ‘रक्तस्राव’: हर लीटर पर हो रहा है बड़ा नुकसान
सूत्रों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद भारत में लंबे समय से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। इसका सीधा असर इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी दिग्गज कंपनियों के बैलेंस शीट पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां लागत से कम दाम पर ईंधन बेच रही हैं, जिससे उनका घाटा (Under-recovery) हर महीने 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। अगर यही स्थिति जारी रही, तो कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
हॉर्मुज संकट और अमेरिका-ईरान तनाव ने बिगाड़ा खेल
कच्चे तेल की कीमतों में आए इस उछाल के पीछे सबसे बड़ा कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य तनातनी ने इस समुद्री मार्ग से होने वाली तेल सप्लाई को खतरे में डाल दिया है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में होने वाली मामूली हलचल भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डालती है। शिपिंग रूट असुरक्षित होने के कारण बीमा और माल ढुलाई की लागत (Freight Cost) भी बढ़ गई है, जिससे संकट और गहरा गया है।
कब और कितना महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल?
आर्थिक जानकारों का मानना है कि सरकार चुनाव और महंगाई दर को देखते हुए अब तक कीमतों को रोके हुए थी, लेकिन 30,000 करोड़ का मासिक घाटा अब बर्दाश्त से बाहर हो रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि कंपनियां किस्तों में तेल की कीमतें बढ़ाना शुरू कर सकती हैं। आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम में ₹5 से ₹10 तक की भारी वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, सरकार इस झटके को कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में कटौती का विकल्प भी तलाश सकती है, लेकिन राजकोषीय घाटा बढ़ने के डर से इसकी संभावना कम ही नजर आती है।
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