
लखनऊ। जनगणना (Census) केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि देश के भविष्य की योजनाएं बनाने का आधार है। यही कारण है कि सरकार ने जनगणना की प्रक्रिया को अत्यंत गोपनीय और कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया है। जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 11 के तहत, यदि कोई नागरिक जनगणना के दौरान किसी तथ्य को जानबूझकर छिपाता है या गलत जानकारी देता है, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
उत्तरदाता और प्रगणक दोनों के लिए समान दंड
कानून के मुताबिक, जनगणना में पूछे गए सवालों का सही जवाब देना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि कोई उत्तरदाता जानकारी छिपाता है, तो उसे एक हजार रुपये का जुर्माना और तीन साल तक की जेल की सजा हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि यही दंड उस प्रगणक (Enumerator) पर भी लागू होता है, जो जानबूझकर गलत डेटा दर्ज करता है।
गोपनीयता भंग करने पर भी होगी कार्रवाई
जनगणना अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें व्यक्ति की निजता का पूरा ख्याल रखा गया है। यदि कोई प्रगणक जनगणना के दौरान प्राप्त व्यक्तिगत तथ्यों या जानकारियों को किसी बाहरी व्यक्ति के साथ साझा करता है, तो आरोप साबित होने पर उसे भी सख्त सजा और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा।
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