
उत्तर प्रदेश में प्रीपेड स्मार्ट मीटरों (Prepaid Smart Meters) को लेकर लंबे समय से चल रहा घमासान और उपभोक्ताओं का भारी विरोध प्रदर्शन अब हमेशा के लिए शांत हो गया है। सड़क से लेकर बिजली विभाग के दफ्तरों तक प्रीपेड मीटरों के चक्कर में जमकर हंगामा और तोड़फोड़ तक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हालांकि, कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने इस व्यवस्था पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसके बावजूद आम जनता के मन में यह आशंका लगातार बनी हुई थी कि विवाद शांत होने के बाद सरकार इसे दोबारा पिछले दरवाजे से लागू कर सकती है। लेकिन अब यूपी के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं की यह बड़ी टेंशन हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गई है। विद्युत नियामक आयोग ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता को कानूनी तौर पर समाप्त कर दिया है। अब जब तक ‘विद्युत अधिनियम-2003’ की धारा 47(5) में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता, तब तक उत्तर प्रदेश में किसी भी उपभोक्ता पर प्रीपेड मीटर जबरन नहीं थोपा जा सकेगा।
नियामक आयोग का बड़ा आदेश: उपभोक्ताओं को मिलेंगे प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों विकल्प
राज्य विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने शुक्रवार को जारी अपने आधिकारिक आदेश में साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं को प्रीपेड या पोस्टपेड मीटर चुनने का पूरा अधिकार होगा। बिजली कंपनियों (पावर कॉरपोरेशन) को हर हाल में विद्युत अधिनियम के कड़े नियमों के मुताबिक ही काम करना होगा और वे अपनी मर्जी से किसी पर प्रीपेड व्यवस्था लागू नहीं कर सकतीं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह नियम पहले से चल रहे पुराने बिजली कनेक्शनों और भविष्य में लिए जाने वाले नए कनेक्शनों, दोनों पर समान रूप से लागू रहेगा। नियामक आयोग का यह ऐतिहासिक फैसला ‘राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद’ द्वारा 16 अप्रैल 2026 को दाखिल किए गए एक अर्जेंट लोक महत्व प्रस्ताव पर मैराथन सुनवाई के बाद आया है।
यूपी बना देश का पहला राज्य, जहां धारा 47(5) पर आया अलग से विशेष आदेश
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने इस फैसले को उपभोक्ताओं की एक बहुत बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश अब पूरे देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां नियामक आयोग ने विद्युत अधिनियम की धारा 47(5) की अनिवार्यता को समाप्त करने के लिए अलग से एक विशेष आदेश जारी किया है। इस आदेश के बाद अब राज्य सरकार, पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) या कोई भी बिजली कंपनी अपने स्तर पर कोई बदलाव या मनमानी नहीं कर सकेगी। आयोग के इस सख्त फैसले के बाद अब पावर कॉरपोरेशन को अपने बिलिंग सॉफ्टवेयर में भी बड़ा तकनीकी बदलाव करना होगा, ताकि उपभोक्ताओं को दोनों विकल्प आसानी से मिल सकें।
बहुमंजिला इमारतों में प्रीपेड मीटर की मनमानी के खिलाफ लोकमहत्व याचिका दायर
एक तरफ जहां सामान्य उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ लखनऊ, नोएडा और गाजियाबाद जैसे बड़े शहरों की बहुमंजिला इमारतों (High-Rise Buildings) में रहने वाले लोगों की दुश्वारियों को समाप्त करने के लिए भी कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने शुक्रवार को ही नियामक आयोग में एक और महत्वपूर्ण लोकमहत्व याचिका दायर की है। इस याचिका में आयोग द्वारा 10 अगस्त 2018 को जारी किए गए उस पुराने आदेश को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके तहत बहुमंजिला इमारतों में केवल प्रीपेड मीटर लगाना ही अनिवार्य किया गया था। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता खत्म किए जाने के बाद अब इस पुराने प्रांतीय नियम को भी हटाने की मांग पुरजोर तरीके से उठने लगी है।
बिल्डरों और RWA की गुंडागर्दी पर लगेगी रोक, सीधे बिजली कंपनियों से मिलेगा कनेक्शन
दायर याचिका में लखनऊ और नोएडा के कई बड़े बिल्डरों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की गंभीर शिकायतें भी दर्ज की गई हैं। आरोप है कि ये बिल्डर और आरडब्ल्यूए प्रीपेड मीटरों के जरिए उपभोक्ताओं से मनमानी बिजली दरों पर वसूली कर रहे हैं। इतना ही नहीं, सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोसाइटी के मेंटेनेंस शुल्क (Maintenance Charges) की कटौती भी जबरन बिजली वाले इसी प्रीपेड मीटर से कर ली जाती है, जिससे मेंटेनेंस का पैसा न देने पर उपभोक्ताओं की बिजली काट दी जाती है। इस याचिका में करीब 20 से 25 लाख बहुमंजिला इमारतों के उपभोक्ता प्रभावित हैं। उपभोक्ता परिषद ने मांग की है कि बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले फ्लैट मालिकों को भी सीधे विद्युत वितरण निगम से डायरेक्ट कनेक्शन लेने का कानूनी अधिकार दिया जाए और बिल्डरों द्वारा तय की जाने वाली अवैध बिजली दरों पर तुरंत पूरी तरह से रोक लगाई जाए।
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