
आजकल की व्यस्त लाइफस्टाइल, धूल-मिट्टी और प्रदूषण के कारण बालों का रूखा और बेजान होना एक आम बात हो गई है। ऐसे में बालों को झटपट चमकदार, सीधा और मैनेज करने लायक बनाने के लिए सैलून में दो ट्रीटमेंट सबसे ज्यादा ट्रेंड में रहते हैं—हेयर स्मूदनिंग (Hair Smoothening) और हेयर स्ट्रेटनिंग (Hair Straightening)।
ट्रीटमेंट पूरा होने के बाद दोनों ही सूरतों में बाल बेहद खूबसूरत और शीशे जैसे चमकदार दिखाई देते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोग इन दोनों के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं और बिना सोचे-समझे कोई भी ट्रीटमेंट चुन लेते हैं। हालांकि, इन दोनों प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले केमिकल, बालों पर उनके काम करने के तरीके और उनके अंतिम परिणाम में जमीन-आसमान का अंतर होता है। आइए इन दोनों को बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं।
1. हेयर स्ट्रेटनिंग (Hair Straightening): बालों का परमानेंट मेकओवर
जैसा कि नाम से ही साफ है, इस ट्रीटमेंट का मुख्य उद्देश्य बालों को पूरी तरह से सीधा और स्लीक (Sleek) लुक देना होता है। अगर आपके बाल बहुत ज्यादा हैवी, कर्ली या बाउंसी हैं, तो स्ट्रेटनिंग उन्हें बिल्कुल सपाट और सीधा कर देती है। सीधा होने के कारण बालों की लंबाई भी थोड़ी ज्यादा नजर आने लगती है।
यह कैसे काम करता है?
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नेचुरल बॉन्ड को तोड़ना: हमारे बालों का एक प्राकृतिक ढांचा या बॉन्ड होता है। स्ट्रेटनिंग में बेहद हार्ड केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो बालों के इस नेचुरल बॉन्ड को हमेशा के लिए ब्रेक (तोड़) कर देते हैं।
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अवधि (Lifespan): यह एक परमानेंट ट्रीटमेंट है। इसका मतलब है कि जिन बालों पर यह केमिकल लग चुका है, वे तब तक सीधे रहेंगे जब तक कि वे कट न जाएं। आमतौर पर इसका असर 6 से 12 महीने तक दिखता है, जब तक कि जड़ों से नए प्राकृतिक बाल न उग आएं।
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रिस्क फैक्टर: चूंकि इसमें बहुत तेज केमिकल और हाई-हीट (प्रेसिंग मशीन) का इस्तेमाल होता है, इसलिए बालों के डैमेज होने, टूटने या रूखे होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
2. हेयर स्मूदनिंग (Hair Smoothening): पोषण और प्राकृतिक चमक का तालमेल
हेयर स्मूदनिंग को आप एक तरह का डीप कंडीशनिंग ट्रीटमेंट मान सकते हैं। इसका मुख्य काम बालों के रूखेपन (Frizz) को खत्म करना और उन्हें छूने में मुलायम बनाना है, न कि उन्हें पूरी तरह से सीधा करना।
यह कैसे काम करता है?
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प्रोटीन फॉर्मूला: इसमें केराटिन (Keratin) आधारित हल्के प्रोटीन फॉर्मूले का इस्तेमाल किया जाता है। यह केमिकल बालों के नेचुरल स्ट्रक्चर को तोड़ता नहीं है, बल्कि बालों की बाहरी परत (क्यूटिकल) को रिलैक्स करके उन्हें चिकना बना देता है। इससे बालों का प्राकृतिक बाउंस और वॉल्यूम बरकरार रहता है।
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अवधि (Lifespan): यह एक टेंपरेरी (अस्थायी) ट्रीटमेंट है। धीरे-धीरे शैंपू करने के साथ इसका असर कम होने लगता है। सामान्यतः यह 3 से 6 महीने तक ही टिक पाता है, जिसके बाद बालों को दोबारा टच-अप की जरूरत होती है।
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रिस्क फैक्टर: स्ट्रेटनिंग की तुलना में इसमें बालों के खराब होने का रिस्क बहुत कम होता है, क्योंकि यह बालों को अंदर से प्रोटीन से फिल (भरने) का काम करता है।
स्मूदनिंग और स्ट्रेटनिंग में मुख्य अंतर (Quick Comparison Table)
आपके लिए चीजों को और आसान बनाने के लिए, नीचे दोनों ट्रीटमेंट की तुलना दी गई है:
एक्सपर्ट प्रो-टिप: आपके बालों के लिए क्या सही है?
कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बालों के टाइप को समझना जरूरी है:
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स्ट्रेटनिंग कब चुनें: अगर आपके बाल बहुत ज्यादा घुंघराले (Extremely Curly) हैं, जिन्हें रोज संभालना या कंघी करना आपके लिए सिरदर्द बन चुका है, तो आप स्ट्रेटनिंग करा सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे, इसके लिए आपके बाल पहले से हेल्दी होने चाहिए ताकि वे इस हार्ड केमिकल प्रोसेस को झेल सकें।
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स्मूदनिंग कब चुनें: अगर आपके बाल थोड़े वेवी या सीधे हैं, लेकिन उनमें चमक नहीं है और वे बहुत उलझते या बेजान दिखते हैं, तो स्मूदनिंग आपके लिए सबसे बेस्ट है। इससे आपके बालों का नेचुरल लुक भी नहीं जाएगा और वे हमेशा सुलझे हुए दिखेंगे।
सैलून जाने से पहले हमेशा किसी अच्छे हेयर एक्सपर्ट से अपने बालों के स्कैल्प और टेक्सचर की जांच जरूर करवाएं, ताकि बाद में आपको बालों के झड़ने जैसी समस्याओं का सामना न करना पड़े।
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