
भारत सरकार द्वारा देश में कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की महत्वाकांक्षी योजना चलाई जा रही है, जिसके तहत देश भर के पेट्रोल पंपों पर धीरे-धीरे E20 (यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण) ईंधन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन हाल ही में आई एक चौंकाने वाली और सनसनीखेज रिपोर्ट ने देश भर के वाहन चालकों और ऑटोमोबाइल सेक्टर में हड़कंप मचा दिया है। आधिकारिक और स्वतंत्र जांच के दौरान यह खुलासा हुआ है कि कई जगहों पर तयशुदा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए उपभोक्ताओं को E20 के स्थान पर सीधे E31 यानी 31 प्रतिशत तक इथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल थमाया जा रहा है। इस खतरनाक गड़बड़झाले के सामने आने के बाद से सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं और आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, क्योंकि बिना किसी पूर्व सूचना या तकनीकी तैयारी के इस हद तक केमिकल मिलावट सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई और उनके वाहनों के साथ खिलवाड़ साबित हो रही है।
विशेषज्ञों और ऑटोमोबाइल इंजीनियरों का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल एक निश्चित मात्रा तक ही सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इसकी रासायनिक प्रकृति पारंपरिक पेट्रोल के मुकाबले अधिक संक्षारक (Corrosive) होती है। सामान्य और पुरानी गाड़ियों के इंजन, फ्यूल इंजेक्टर, रबर पाइपलाइन और फ्यूल पंप केवल E10 या अधिकतम सीमा तक के E20 मिश्रण को ही सहन करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। जब अनजाने में वाहनों की टंकियों में E31 स्तर का अत्यधिक इथेनॉल वाला ईंधन भरा जा रहा है, तो गाड़ियों के इंजन के अंदरूनी हिस्से जंग लगने के कारण तेजी से खराब हो रहे हैं। इसके अलावा वाहनों की माइलेज में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, पिकअप कमजोर हो रहा है और अचानक से गाड़ी रास्ते में बंद होने की शिकायतें आम हो चुकी हैं। वाहन मालिकों को अपनी कारों और बाइकों की मरम्मत के लिए सर्विस सेंटर के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और हजारों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसकी भरपाई करने वाला कोई नहीं है।
इस पूरे गड़बड़झाले के उजागर होने के बाद देश भर के वाहन चालकों, किसान संगठनों और उपभोक्ता संरक्षण मंचों ने सरकारी तेल कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि यदि ईंधन के कंपोजिशन में इस तरह के बड़े बदलाव किए जा रहे थे, तो पेट्रोल पंपों पर इसकी स्पष्ट चेतावनी या डिस्प्ले क्यों नहीं लगाया गया? बिना वाहन निर्माताओं (OEMs) को भरोसे में लिए और बिना पब्लिक अवेयरनेस के इस तरह का अत्यधिक मिश्रण बाजार में उतारना सीधे तौर पर ग्राहकों के अधिकारों का हनन है। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो देश की सड़कों पर दौड़ने वाले करोड़ों वाहन समय से पहले ही कबाड़ में तब्दील हो जाएंगे। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस मामले का संज्ञान लेते हुए दोषी तेल कंपनियों और अधिकारियों पर कोई कड़ी कार्रवाई करती है या फिर आम जनता को इसी तरह चुपचाप इस वित्तीय और तकनीकी नुकसान को झेलना पड़ेगा।
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