
पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट की धरती पर जारी भू-राजनीतिक संघर्ष और युद्ध जैसे हालातों के बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार से बेहद हैरान करने वाली खबर सामने आई है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल निर्यातक देश सऊदी अरब के प्रमुख ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों के बाद जहां पूरी दुनिया में ईंधन की भारी किल्लत और तेल के दाम 120 डॉलर प्रति बैरल पार जाने की आशंका जताई जा रही थी, वहीं बाजार ने एकदम उलट रुख दिखाया है। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों के भाव में नरमी दर्ज की गई है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना और कोलकाता समेत देश के सभी प्रमुख महानगरों के लिए यह खबर किसी बड़ी राहत से कम नहीं है, क्योंकि भारत अपनी कुल पेट्रोलियम खपत का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता की जेब के लिहाज से बेहद सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब सऊदी अरब की रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण ‘ईस्ट-वेस्ट क्रूड पाइपलाइन’ के दो प्रमुख पंपिंग स्टेशनों को निशाना बनाकर ड्रोन हमले किए गए। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों से रोजाना लगभग 40 लाख बैरल कच्चा तेल लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी पाइपलाइन के जरिए दुनिया के बाजारों में भेजा जाता है। इस हमले के तुरंत बाद एहतियातन पाइपलाइन के संचालन को रोक दिया गया, जिससे यानबू बंदरगाह पर तेल की लोडिंग पूरी तरह ठप हो गई। इस अप्रत्याशित संकट के चलते हफ्ते की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतें चार महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं और ब्रेंट क्रूड 107 से 109 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया था। दुनिया भर के शेयर बाजारों और कमोडिटी एक्सचेंजों में हड़कंप मच गया था कि अगर यह सप्लाई लंबे समय तक कटी रही, तो 1970 के दशक जैसा तेल संकट दोबारा पैदा हो सकता है।
गंभीर सैन्य तनाव और हमलों के बावजूद तेल के दामों में 1.2 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आने के पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आपूर्ति प्रबंधन से जुड़े ठोस कारण सामने आए हैं:
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ओमान के जरिए वैकल्पिक रूट का ऐलान: सऊदी अरब ने संकट को भांपते हुए तुरंत ‘प्लान-बी’ पर अमल शुरू कर दिया। रियाद ने ओमान के सोहार बंदरगाह के तट पर एशियाई खरीदारों को शिप-टू-शिप (STS) ट्रांसफर के जरिए अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की घोषणा कर दी। इस कदम ने तेल बाजारों में सप्लाई ठप होने के तात्कालिक डर को तुरंत खत्म कर दिया।
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होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी सुरक्षा कवच: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों की सक्रिय निगरानी बढ़ाई गई है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार इस रणनीतिक जलमार्ग से तेल टैंकरों का सुरक्षित पारगमन जारी रहने से वैश्विक सप्लाई चेन पर बना दबाव काफी हद तक कम हुआ है।
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पाइपलाइन की त्वरित बहाली का रोडमैप: तकनीकी विशेषज्ञों और सऊदी अरामको के इंजीनियरों ने आकलन किया है कि क्षतिग्रस्त पंपिंग स्टेशनों की आंशिक क्षमता को कुछ ही दिनों के भीतर चालू कर दिया जाएगा, जबकि अगले छह हफ्तों में पूरी पाइपलाइन पूरी क्षमता से काम करने लगेगी। बहाली की स्पष्ट समयसीमा मिलने से सट्टेबाजों की मुनाफावसूली पर ब्रेक लग गया।
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अमेरिका-चीन शिखर वार्ता की उम्मीदें: आने वाले दिनों में अमेरिका और चीन के बीच होने वाली उच्चस्तरीय कूटनीतिक वार्ता को लेकर भी वैश्विक बाजारों में यह उम्मीद जगी है कि प्रमुख महाशक्तियां मिडिल ईस्ट में तनाव को कम करने और वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखने पर सहमति बना सकती हैं।
सऊदी अरब द्वारा ओमान के तटवर्ती क्षेत्रों का इस्तेमाल करना एशियाई रिफाइनरियों के लिए सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित हुआ है। भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देशों की तेल शोधन कंपनियों को यह चिंता सता रही थी कि यदि लाल सागर और होर्मुज दोनों रास्ते असुरक्षित हो गए, तो माल ढुलाई और समुद्री बीमा (वार रिस्क प्रीमियम) की दरें आसमान छूने लगेंगी। ओमान के सोहार बंदरगाह के खुले समुद्र में बड़े टैंकरों से छोटे जहाजों में सीधे तेल ट्रांसफर करने की सुविधा से न केवल परिवहन लागत नियंत्रित हुई है, बल्कि यमन के हूती विद्रोहियों के संभावित हमलों के दायरे से बाहर सुरक्षित डिलीवरी भी सुनिश्चित हो गई है। इस व्यावहारिक कदम से वैश्विक बाजार को स्पष्ट संदेश गया कि दुनिया में कच्चे तेल की भौतिक उपलब्धता की कोई कमी नहीं है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सऊदी अरब, इराक, रूस और संयुक्त अरब अमीरात पर भारी निर्भरता रखता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो देश की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल के रिफाइनिंग मार्जिन पर भारी दबाव बन जाता है। कच्चे तेल में नरमी आने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और व्यापार घाटा नियंत्रित रहने में मदद मिलेगी। घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का जो खतरा मंडरा रहा था, वह फिलहाल टलता दिखाई दे रहा है। माल ढुलाई की लागत स्थिर रहने से दैनिक उपभोग की वस्तुओं, सब्जियों और खाद्यान्न के दामों में महंगाई का नया झटका लगने की आशंका भी कम हो गई है।
यद्यपि तेल की कीमतों में आई यह गिरावट तात्कालिक राहत लेकर आई है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के स्वतंत्र विश्लेषक अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनका मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित नहीं होती और लाल सागर व बाब-अल-मंदेब जैसे जलमार्गों पर जहाजों पर होने वाले हमलों पर पूर्ण विराम नहीं लगता, तब तक भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम बाजार में बना रहेगा। अमेरिकी तेल भंडारों में आई हालिया गिरावट और ओपेक प्लस देशों की उत्पादन नीतियों पर आने वाले दिनों में कड़ी नजर रहेगी। यदि सऊदी अरब अपनी पाइपलाइन को तय समय पर पूरी तरह दुरुस्त कर लेता है और वैकल्पिक रास्ते निर्बाध चलते रहते हैं, तो कच्चा तेल 100 डॉलर के नीचे स्थिर हो सकता है, जो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी संजीवनी साबित होगा।
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