नेपाल में छिड़ा ‘बॉर्डर’ विवाद: पीएम बालेन शाह पर विपक्ष का दबाव, लिपुलेख-कालापानी को लेकर भारत से सीधी बात की मांग

नेपाल की राजनीति में एक बार फिर सीमा विवाद का जिन्न बाहर निकल आया है। भारत द्वारा लिपुलेख दर्रे से ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ (Kailash Mansarovar Yatra 2026) शुरू करने की घोषणा के बाद काठमांडू के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। नेपाल के विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री बालेन शाह (Balen Shah) की घेराबंदी शुरू कर दी है। विपक्ष का स्पष्ट कहना है कि सरकार को लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों पर भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर अपना कड़ा रुख स्पष्ट करना चाहिए।

विपक्ष ने सरकार को घेरा, बोले- सुगौली संधि का दें हवाला

नेपाल की विपक्षी पार्टियों ने संसद में बालेन शाह सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि भारत और चीन द्वारा लिपुलेख के जरिए व्यापार और तीर्थयात्रा की योजना बनाना नेपाल की संप्रभुता का उल्लंघन है। विपक्ष ने मांग की है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह तुरंत भारतीय नेतृत्व से बात करें और 1816 की सुगौली संधि (Treaty of Sugauli) का हवाला देते हुए इन क्षेत्रों पर अपना दावा मजबूत करें। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा नरम रुख अपना रही है।

लिपुलेख पर नेपाल की आपत्ति और भारत का दोटूक जवाब

विवाद की ताजा जड़ भारत और चीन के बीच हुआ वह समझौता है, जिसमें लिपुलेख दर्रे को व्यापार और तीर्थयात्रा के लिए फिर से खोलने की बात कही गई है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक नोट भेजकर आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने नेपाल के इन दावों को ‘अपुष्ट’ और ‘ऐतिहासिक तथ्यों से परे’ बताकर खारिज कर दिया है। भारत का स्टैंड स्पष्ट है कि लिपुलेख सदियों से कैलाश मानसरोवर का पारंपरिक मार्ग रहा है और यह पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में आता है।

पीएम बालेन शाह के लिए अग्निपरीक्षा बना सीमा विवाद

हाल ही में सत्ता संभालने वाले युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह के लिए यह मुद्दा एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। एक तरफ जहां उन पर घरेलू राजनीति और विपक्ष का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ वे भारत के साथ मधुर संबंधों को भी बनाए रखना चाहते हैं। बालेन शाह ने संकेत दिए हैं कि वे इस मामले को शांतिपूर्ण और कूटनीतिक बातचीत के जरिए सुलझाना चाहते हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि अगर बालेन शाह इस पर कड़ा रुख नहीं अपनाते, तो नेपाल के भीतर राष्ट्रवाद की लहर उनकी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।