गंगा नदी पर बड़ा फैसला: अलकनंदा-भगीरथी बेसिन में नए बिजली बांधों पर पूरी रोक, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का हलफनामा

पवित्र गंगा नदी की अविरल और निर्मल धारा को सदा अक्षुण्ण बनाए रखने तथा हिमालय क्षेत्र की अत्यधिक नाजुक व संवेदनशील पारिस्थितिकी (Ecology) की सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ा और दूरगामी फैसला सामने आया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक ऐफिडेविट (हलफनामा) दाखिल किया है। सरकार ने देश की शीर्ष अदालत को दो टूक शब्दों में बताया है कि उत्तराखंड में गंगा नदी के ऊपरी हिस्से यानी अलकनंदा-भगीरथी बेसिन (Alaknanda-Bhagirathi Basin) में अब भविष्य में किसी भी नए हाइड्रोइलेक्ट्रिक (जल विद्युत) प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी जाएगी।

सरकार का यह निर्णय इसलिए भी अभूतपूर्व माना जा रहा है क्योंकि उसने अदालत द्वारा ही गठित एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल की उन सिफारिशों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें 28 नए प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी देने की बात कही गई थी।

सरकार ने क्यों खारिज की विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण, जल शक्ति और बिजली मंत्रालयों की ओर से संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा पेश किया है। इसमें सरकार ने एक्सपर्ट बॉडी-II (EB-II) की उन सिफारिशों को पूरी तरह नामंजूर कर दिया जिसने 28 जलविद्युत परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई थी। इससे पहले इस लिस्ट की समीक्षा करते हुए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली एक समिति ने इन प्रोजेक्ट्स की संख्या को घटाकर केवल 5 कर दिया था, लेकिन अब मोदी सरकार ने पर्यावरण के हित में उन अंतिम 5 प्रोजेक्ट्स को भी पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

इस बेहद सख्त और ऐतिहासिक कदम के पीछे ऊपरी गंगा बेसिन की अत्यधिक भौगोलिक, भूगर्भीय और पर्यावरणीय संवेदनशीलता है:

  • सिसमिक जोन IV और V का खतरा: यह पूरा अलकनंदा-भगीरथी बेसिन भूकंप के लिहाज से देश के सबसे खतरनाक और सक्रिय ‘सिसमिक जोन IV और V’ के अंतर्गत आता है।

  • भूगोलीय संवेदनशीलता: यह पूरा इलाका अचानक भूस्खलन (Landslides), ग्लेशियर फटने से आने वाली प्रलयंकारी बाढ़, हिमस्खलन (Avalanche) और सुरंग ढहने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है।

  • पारिस्थितिक महत्व: यह क्षेत्र गंगा नदी का मुख्य जलस्रोत है, जो भारत की लगभग आधी आबादी की जीवनरेखा है। साथ ही, यह इलाका वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-I (Schedule-I) की कई लुप्तप्राय प्रजातियों का प्राकृतिक निवास स्थान है और देश के करोड़ों नागरिकों के लिए गहरी सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्ता रखता है।

नए बांधों पर पूरी पाबंदी, केवल इन 7 पुराने प्रोजेक्ट्स को मिली छूट

सरकार ने नए प्रोजेक्ट्स के निर्माण पर पूरी तरह पूर्णविराम लगा दिया है, लेकिन कोर्ट में स्पष्ट किया है कि केवल उन 7 विशिष्ट जलविद्युत परियोजनाओं को ही अपना काम जारी रखने की अनुमति दी जाएगी जो या तो पहले से ही ग्रिड से जुड़कर चालू हो चुकी हैं या फिर जिनका निर्माण कार्य काफी एडवांस स्टेज (उन्नत चरण) में पहुंच चुका है। हालांकि, इन सातों प्रोजेक्ट्स को भी कड़े पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और नियमों का हर हाल में पालन करना होगा।

इन सात परियोजनाओं की पूरी सूची इस प्रकार है:

परियोजना का नाम क्षमता (मेगावाट) वर्तमान स्थिति (मई 2026)
टिहरी स्टेज-II 1000 MW सफलतापूर्वक चालू (Operational)
सिंगोली भटवारी 99 MW सफलतापूर्वक चालू (Operational)
मदमहेश्वर प्रोजेक्ट 15 MW सफलतापूर्वक चालू (Operational)
कालीगंगा-II 4.5 MW सफलतापूर्वक चालू (Operational)
तपोवन विष्णुगाड 520 MW निर्माण का उन्नत चरण (Under Construction)
विष्णुगाड पीपलकोटी 444 MW निर्माण का उन्नत चरण (Under Construction)
फाटा ब्यूंग प्रोजेक्ट 76 MW निर्माण का उन्नत चरण (Under Construction)

गौरतलब है कि गंगा बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ यह पूरी कानूनी और अदालती प्रक्रिया साल 2013 में उत्तराखंड में आई केदारनाथ की विनाशकारी बाढ़ और त्रासदी के बाद शुरू हुई थी।

चल रहे प्रोजेक्ट्स पर भी उठे गंभीर सवाल, फाटा ब्यूंग के दावों पर अविश्वास

सरकार के इस पाबंदी वाले कदम का स्वागत करने के साथ ही पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक सुर में मांग उठाई है कि जो 7 प्रोजेक्ट्स वर्तमान में चल रहे हैं, उनकी भी तुरंत स्वतंत्र समीक्षा की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के पूर्व अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) से बात करते हुए सरकार के कुछ दावों पर तकनीकी सवाल खड़े किए हैं।

उन्होंने विशेष रूप से 76 मेगावाट के ‘फाटा ब्यूंग प्रोजेक्ट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि इस प्रोजेक्ट का पिछला ढांचा तो केदारनाथ बाढ़ में पूरी तरह तबाह और बह गया था। इसके बाद दिसंबर 2025 में इस प्रोजेक्ट को भीलवाड़ा ग्रुप को बेच दिया गया था, जहां अभी तक मुख्य बांध का कंस्ट्रक्शन दोबारा ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया है। उन्होंने आगाह किया कि ये सभी निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट जोन’ (Main Central Thrift Zone) में आते हैं, जो सक्रिय भूकंपीय फॉल्ट्स और ग्लेशियर के खतरों के मुहाने पर हैं। यहाँ तक कि ‘विष्णुगाड पीपलकोटी प्रोजेक्ट’ तो इस संवेदनशील क्षेत्र की बिल्कुल फॉल्ट-लाइन की सीमा पर स्थित है।

जलवायु परिवर्तन और पूर्व हादसों से सबक लेने की चेतावनी

प्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन’ के दिग्गज नेता और प्रतिष्ठित गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट ने भी नए बांधों पर पाबंदी लगाने के सरकार के फैसले की सराहना की है, लेकिन निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स को लेकर चिंता जाहिर की है। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनटीपीसी (NTPC) के 525 मेगावाट वाले ‘तपोवन विष्णुगाड प्रोजेक्ट’ की लेटलतीफी पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह संरचनात्मक देरी का सबसे बड़ा और चिंताजनक प्रमाण है, जो पिछले दो दशकों (20 साल) से काम चलने के बावजूद आज तक अधूरा पड़ा है।

चंडी प्रसाद भट्ट ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हिमालय के इस नाजुक भूगोल और संवेदनशीलता की अनदेखी करने का भयानक नतीजा हम बार-बार आपदाओं के रूप में भुगतते आए हैं। उन्होंने फरवरी 2021 में इसी तपोवन प्रोजेक्ट साइट पर हुए उस दिल दहला देने वाले भयानक हादसे की याद दिलाई, जिसमें ऋषिगंगा की बाढ़ के कारण सुरंग में फंसे 200 से अधिक बेकसूर मजदूरों और लोगों की जान चली गई थी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण पहाड़ों में पानी के मुख्य स्रोत लगातार सिकुड़ रहे हैं, इसलिए जल प्रवाह में आ रही इस भारी कमी का भविष्य में बिजली उत्पादन पर क्या असर पड़ेगा, इसका भी नए सिरे से वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना बेहद जरूरी है।