
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा इस साल बिना पूरी तैयारी के लागू की गई नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली अब बोर्ड के लिए गले की हड्डी बन चुकी है। कॉपियों के डिजिटल मूल्यांकन में आई गंभीर गड़बड़ियों और विसंगतियों के सामने आने के बाद देश भर के 4 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने अपनी स्कैन की हुई उत्तर-पुस्तिकाओं (Answer Sheets) की मांग की है।
चूंकि 12वीं कक्षा के मार्क्स देश-विदेश के प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाखिले और स्कॉलरशिप पाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, ऐसे में लाखों होनहार छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, सीबीएसई ने यह विवादित ओएसएम सिस्टम अपनी ही एक शीर्ष गवर्निंग बॉडी (Governing Body) के सदस्यों के अहम सुझावों और चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज करके देश भर में लागू किया था।
सलाहकारों ने दी थी पायलट प्रोजेक्ट चलाने की सलाह, बोर्ड ने की अनदेखी
जून 2025 में हुई सीबीएसई की गवर्निंग बॉडी की एक महत्वपूर्ण बैठक के मिनट्स से यह खुलासा हुआ है कि सदस्यों ने बोर्ड को स्पष्ट तौर पर सुझाव दिया था कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) को सभी विषयों में एक साथ थोपने के बजाय, बोर्ड के विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में कुछ चुनिंदा विषयों पर पहले ‘पायलट प्रोजेक्ट’ के रूप में चलाया जाना चाहिए। बोर्ड के पास 22 क्षेत्रीय कार्यालय हैं, लेकिन इस साल इस जटिल प्रणाली को बड़े पैमाने पर शुरू करने से पहले कोई भी पायलट प्रोजेक्ट नहीं चलाया गया।
बोर्ड ने इस बहुमूल्य सलाह के उलट, जनवरी में दिल्ली के महज 5 स्कूलों के केवल 100 शिक्षकों के साथ एक नाममात्र का परीक्षण (Dry Run) किया। इस ड्राई रन में शामिल शिक्षकों ने सॉफ्टवेयर की कमियों को पकड़ लिया था और बोर्ड को लिखित चेतावनी दी थी कि इसे पूरे देश में लागू करने से पहले शिक्षकों को कम से कम एक या दो साल की उचित और गहन ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
नाममात्र की ट्रेनिंग और जल्दी कॉपियां जांचने का भारी दबाव
शिक्षकों की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए सीबीएसई ने 9 फरवरी को अचानक ओएसएम लागू करने का एलान कर दिया। इसके बाद 13 फरवरी को एक देशव्यापी वेबिनार और 15 फरवरी को एक ट्रेनिंग पोर्टल खोला गया, जिसे मूल्यांकन में शामिल शिक्षकों ने महज एक “औपचारिकता” करार दिया। 7 मार्च से वास्तविक मूल्यांकन कार्य शुरू हो गया।
मूल्यांकन केंद्रों पर मौजूद शिक्षकों ने बताया कि वे इस नए सॉफ्टवेयर से बिल्कुल भी परिचित नहीं थे और बच्चों की वास्तविक (लाइव) उत्तर-पुस्तिकाओं को जांचते-जांचते ही वे इस सिस्टम को चलाना सीख रहे थे। इसके अलावा, नतीजों को जल्दी घोषित करने और ‘डिजिटल रोलआउट’ को जबरन सफल दिखाने के चक्कर में बोर्ड की ओर से शिक्षकों पर कॉपियां जल्दी जांचने का भारी दबाव था। एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल के मुताबिक, शिक्षकों के लिए रोजाना कॉपियां जांचने का एक कड़ा टारगेट (लक्ष्य) तय था, जिसके चलते ध्यान से पढ़ने के बजाय केवल स्पीड (गति) पर जोर दिया गया।
स्क्रीन बेस्ड कॉपियां जांचने से लगा ‘स्टेप मार्किंग’ को झटका
कॉपियां जांचने वाले शिक्षकों (Evaluators) का कहना है कि स्क्रीन पर लगातार कई घंटों तक कॉपियां देखने से होने वाली थकान का सबसे बुरा असर गणित और भौतिक विज्ञान (Physics) जैसे विषयों की स्टेप-मार्किंग पर पड़ा।
शिक्षकों के अनुसार, फिजिकल कॉपी जांचते समय पन्ने पलटना, जवाबों को दोबारा देखना और कोनों में लिखे या छूटे हुए स्टेप्स को पकड़ना बेहद आसान होता है। इसके विपरीत, कंप्यूटर स्क्रीन पर धुंधले और अधूरे स्कैन के कारण असाधारण लिखावट या कोनों में लिखे गए जवाब आसानी से नजरअंदाज हो गए, जिससे छात्रों के नंबर कट गए।
आंकड़ों में झलका छात्रों का दर्द: खराब स्कैनिंग की खुली पोल
सीबीएसई ने खुद स्वीकार किया है कि शुरुआत में लॉग-इन, सिस्टम ओवरलोड और स्कैनिंग में बड़ी तकनीकी दिक्कतें आईं। बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार:
-
इस साल जांची गई कुल 9,866,622 उत्तर पुस्तिकाओं में से 68,018 कॉपियों को खराब और धुंधली इमेज क्वालिटी के कारण दोबारा स्कैन करना पड़ा।
-
13,583 कॉपियों को अंततः मैन्युअल (हाथ से) जांचना पड़ा, क्योंकि बार-बार स्कैन करने के बाद भी कंप्यूटर स्क्रीन पर साफ कॉपियां नहीं दिख रही थीं।
-
26 मई तक, सीबीएसई को 1,131,961 कॉपियों की स्कैन प्रति मांगने वाले 404,319 आवेदन मिल चुके थे, जो पिछले साल की तुलना में आवेदनों में 208% और उत्तर पुस्तिकाओं की मांग में 301% की ऐतिहासिक बढ़ोतरी है।
हालांकि, बोर्ड इस भारी बढ़ोतरी के पीछे 17 मई को फीस में की गई कटौती (₹700 से घटाकर ₹100 प्रति विषय) को वजह बता रहा है, लेकिन प्रिंसिपलों और अभिभावकों का कहना है कि यह बढ़ोतरी छात्रों के बीच पैदा हुई गंभीर चिंता को दर्शाती है। इस साल 12वीं के कुल पास प्रतिशत में 3.19 प्रतिशत अंकों की भारी गिरावट आई है, जो 2019 के बाद से सबसे कम है।
आंसर-शीट देखकर छात्र और अभिभावक हैरान, उठाए ये 8 गंभीर सवाल
स्कैन कॉपियां हाथ में आने के बाद छात्रों और अभिभावकों के होश उड़ गए हैं। वे पोर्टल और सीबीएसई की कार्यप्रणाली पर निम्नलिखित गंभीर आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं:
-
धुंधली कॉपियों का मूल्यांकन: सीबीएसई ने इतनी ब्लर (धुंधली) स्कैन कॉपियों को कैसे चेक किया और इसके आधार पर मार्किंग कैसे कर दी?
-
बिना चेक हुए उत्तर: धुंधलेपन के कारण शिक्षकों से कई महत्वपूर्ण उत्तर बिना चेक हुए (Unchecked) ही छूट गए।
-
MCQ में भी गड़बड़ी: बहुविकल्पीय प्रश्नों (Multiple Choice Questions) में भी सही जवाब होने के बावजूद अंक काट लिए गए।
-
कॉपियों की अदला-बदली: कई छात्रों की कॉपियां आपस में बदल गई हैं और किसी दूसरे छात्र की उत्तर-पुस्तिका उनके रोल नंबर पर अपलोड होकर आ गई है।
-
पन्ने और एक्स्ट्रा शीट गायब: कई आंसरशीट में से मुख्य पन्ने और छात्रों द्वारा अलग से लगाई गई सप्लीमेंट्री (एक्स्ट्रा) शीट ही गायब हैं।
-
सही उत्तरों पर कटौती: बिल्कुल सही और सटीक उत्तरों के लिए भी बेवजह मार्क्स काटे गए हैं।
-
लेट डिलीवरी: आवेदन और भुगतान करने के हफ्तों बाद भी कई छात्रों को उनकी आंसर-शीट अब तक डाउनलोड के लिए नहीं मिली है।
-
अधूरी कॉपियां: जितने विषयों की आंसरशीट के लिए फीस भरी गई थी, छात्रों को उतनी कॉपियां पोर्टल पर नहीं दिखाई दे रही हैं।
साल 2014 में भी फेल हो चुका है यह सिस्टम, पर अगले साल भी रहेगा जारी
यह पहली बार नहीं है जब सीबीएसई ने डिजिटल मूल्यांकन का प्रयास किया हो। इससे पहले साल 2014 में भी बोर्ड ने कक्षा 10 और 12 के कुछ विषयों के लिए ओएसएम का पायलट प्रोजेक्ट चलाया था, लेकिन तब भी स्कैनिंग और इंटरनेट कनेक्टिविटी की भारी समस्याओं के कारण इसे तुरंत वापस ले लिया गया था।
इतने बड़े देशव्यापी विवाद और विरोध के बावजूद, सीबीएसई के आला अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले साल की बोर्ड परीक्षाओं में भी ओएसएम (OSM) प्रणाली जारी रहेगी। सीबीएसई के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली ने इसे आधुनिकता की दिशा में एक अच्छी पहल तो बताया है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा है कि इस व्यवस्था की विश्वसनीयता को बचाने के लिए हाई-क्वालिटी स्कैनिंग, शिक्षकों की लंबी ट्रेनिंग और बेहतर तैयारियों की सख्त जरूरत है, अन्यथा छात्रों का भरोसा बोर्ड से पूरी तरह उठ जाएगा।
girls globe