
दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्र मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जो अगर हकीकत में बदली तो दुनिया का भूगोल और इतिहास दोनों बदल जाएंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद चौंकाने वाला दावा करते हुए संकेत दिया है कि इजरायल का सबसे बड़ा और कट्टर दुश्मन ईरान जल्द ही ‘अब्राहम अकॉर्ड’ (Abraham Accords) में शामिल हो सकता है। ट्रंप के इस बयान के बाद वैश्विक कूटनीति के गलियारों में सनसनी फैल गई है, क्योंकि यह वही समझौता है जिसका मूल मकसद इजरायल और अरब देशों को करीब लाना है।
खाड़ी देशों का शुक्रिया अदा करते हुए ट्रंप ने दिया बड़ा हिंट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बैकचैनल (पर्दे के पीछे) चल रही कूटनीतिक बातचीत में मदद करने के लिए खाड़ी देशों (Gulf Countries) की खुलकर तारीफ की है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ (Truth Social) पर एक बेहद रहस्यमयी और बड़ा पोस्ट लिखा। ट्रंप ने लिखा, “मैं मिडिल ईस्ट के सभी देशों को उनके जबरदस्त समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा। ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल होने से यह सहयोग और भी मजबूत होगा। और कौन जानता है, शायद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान भी बहुत जल्द इसमें जुड़ जाए!”
ट्रंप पहले भी कर चुके हैं दावा, ईरान ने तब किया था खारिज
यह पहली बार नहीं है जब डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा कोई दावा किया हो। इससे पहले साल 2025 में जब इजरायल और हमास के बीच संघर्ष-विराम (Ceasefire) समझौते की ऐतिहासिक घोषणा हुई थी, तब भी ट्रंप ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि उन्हें भरोसा है कि एक दिन ईरान भी इस शांति समझौते की टेबल पर बैठेगा। हालांकि, उस समय ईरान ने अमेरिकी दावों को सिरे से खारिज कर दिया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दो टूक कहा था कि तेहरान (ईरान) किसी भी कीमत पर यहूदी राष्ट्र इजरायल को कभी भी मान्यता नहीं देगा।
आखिर क्या है ‘अब्राहम अकॉर्ड’, जिससे दुनिया में मची है हलचल?
अब्राहम अकॉर्ड अमेरिका की मध्यस्थता में साल 2020 में तैयार किया गया एक ऐतिहासिक और रणनीतिक समझौता है। इसका मुख्य उद्देश्य सदियों से चली आ रही अरब देशों और इजरायल के बीच की दुश्मनी को खत्म कर कूटनीतिक, आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों को बहाल करना है। कोरोना काल के दौरान इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने दस्तखत किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस शांति गुट का हिस्सा बने। दिलचस्प बात यह है कि इस समझौते का एक गुप्त मकसद इजरायल और अरब देशों को एक साथ लाकर मिडिल ईस्ट में ईरान के बढ़ते सैन्य प्रभाव को रोकना (Counter) था, लेकिन अब ट्रंप खुद ईरान को ही इस ग्रुप में शामिल करने की बात कह रहे हैं।
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं इजरायल-ईरान
इतिहास पर नजर डालें तो साल 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान और इजरायल के बीच बेहद दोस्ताना और मजबूत संबंध थे। लेकिन जैसे ही ईरान में अयातुल्लाओं (धार्मिक नेताओं) का शासन आया, ‘इजरायल की तबाही’ ईरान की विदेश नीति का मुख्य एजेंडा बन गई। ईरान ने इजरायल को चारों तरफ से घेरने के लिए हमास, हिजबुल्लाह और यमन के हूती विद्रोहियों का एक खतरनाक नेटवर्क ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (Axis of Resistance) खड़ा कर दिया। हालिया समय में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान और उसके सहयोगियों पर कई घातक हमले किए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। ऐसे में ईरान का इस समझौते से जुड़ना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।
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